20-Oct-2020 12:00 AM
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मप्र में राजघरानों से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों को संभाल रहे ट्रस्टों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं। कई राजघरानों की संपत्ति की देखरेख का जिम्मा लंबे समय से ट्रस्ट संभाल रहे हैं। यह चौंकाने वाली बात है कि ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता पिछले दरवाजे से उन संपत्तियों को बेच भी रहे हैं। महारानी देवी अहिल्या बाई होल्कर एवं समूचे होल्कर राजघराने की धरोहरों के संरक्षण के लिए बनाए गए खासगी ट्रस्ट की कारस्तानी भी सामने आई है।
खासगी संपत्तियों के स्वामित्व का प्रकरण जीतने के बाद राज्य शासन वैसे तो बेहद उत्साहित है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी तत्काल अधिकारियों को संपत्ति का कब्जा लेने और खरीदी-बिक्री के मामलों पर त्वरित कार्रवाई के निर्देश दे दिए, लेकिन हकीकत यह है कि खासगी संपत्तियों में जितनी भी जमीनें हैं उन पर न केवल बाहुबलियों का कब्जा है, बल्कि उन्होंने ट्रस्ट को औने-पौने दाम देकर लीज के दस्तावेज भी बनवा लिए हैं।
खासगी ट्रस्ट की संपत्तियों को औने-पौने दाम पर बेचे जाने और कब्जे के मामलों की जांच ईओडब्ल्यू ने तेज कर दी है। खासगी ट्रस्ट के बारे में सरकार द्वारा कराई गई जांच में राजफाश हो चुका है कि उससे जुड़े व्यक्तियों ने प्रयागराज, हरिद्वार, पुष्कर सहित ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थानों पर होल्कर राज परिवार की कई संपत्तियों को औने-पौने दाम पर बेच दिया। विक्रय के लिए वर्ष 1972 की उस डीड को आधार बनाया गया, जिसकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में है। बात सिर्फ संपत्ति को बेचने की नहीं है, बल्कि विरासत से छेड़छाड़ की भी है। जिन लोगों को संपत्तियों के रखरखाव का जिम्मा सौंपा गया था, उन्होंने तो विश्वासघात किया ही, प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही ने भी उन्हें मौका दिया। बरसों से ट्रस्ट की संपत्ति को किनारे लगाने की शिकायतें हो रही थीं, पर प्रशासन आंख मूंदकर बैठा रहा।
वर्ष 2012 में मामला तब सामने आया जब शिकायत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संज्ञान में आई। मुख्यमंत्री ने इसकी जांच का जिम्मा तत्कालीन प्रमुख सचिव और राजस्व के मामलों के जानकार मनोज कुमार श्रीवास्तव को सौंपा था। उन्होंने विस्तृत जांच करके रिपोर्ट दो नवंबर 2012 को मुख्य सचिव को सौंपी थी, लेकिन इस पर उस तेजी से काम नहीं हुआ, जिसकी मंशा मुख्यमंत्री ने जताई थी। मामला कोर्ट-कचहरी में उलझ गया। इसमें इंदौर के तत्कालीन कमिश्नर की लापरवाही भी सामने आ रही है, क्योंकि वह आंख मूंदे रहे। जांच रिपोर्ट के मुताबिक ट्रस्ट की मनमानी उजागर होने के बाद करीब 8 साल पहले इंदौर के तत्कालीन कलेक्टर ने एक आदेश जारी कर ट्रस्ट की संपत्तियों का नामांतरण राज्य शासन के नाम करने का आदेश दिया था। खासगी ट्रस्ट ने इस आदेश को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने कलेक्टर के आदेश को निरस्त करते हुए याचिका स्वीकार कर ली। शासन ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की।
इस बीच एक नागरिक विपिन धनोतकर ने भी जनहित याचिका उच्च न्यायालय में दायर कर दी। लंबी सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में खासगी ट्रस्ट के नियंत्रण वाली संपत्तियों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दी। ऐसे में ट्रस्ट द्वारा संपत्तियों की बिक्री अवैध है। हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह संपत्तियों को बेचने के मामले की जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ से कराए। दरअसल, खासगी ट्रस्ट में शामिल संपत्तियों को गुपचुप ढंग से बेचने का सिलसिला 37 साल पहले शुरू हो गया था। इसमें पुष्कर, रामेश्वरम, नासिक और हरिद्वार की संपत्तियां शामिल हैं। सबसे पहले राजस्थान के पुष्कर में ट्रस्ट का बाड़ा और दुकानें बेच दी गईं। यह बिक्री 1983-84 से 1998-99 के बीच हुई।
इसके बाद रामेश्वरम में वर्ष 2006 से 2008 के बीच ट्रस्ट की संपत्ति बेची गई। हरिद्वार में वर्ष 2009-10 में होल्कर बाड़ा, मंदिर और कुशावर्त घाट की संपत्तियों को बेचा गया। इस बीच हाईकोर्ट ने पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि यह सारी संपत्ति सरकारी है। होल्कर की संपत्तियों की देखभाल और उसके व्यय पर नियंत्रण के लिए 27 जून 1962 को खासगी ट्रस्ट बनाया गया था। संपत्तियों के राज्य शासन में विलय के बारे में 10 अगस्त 1971 तक किसी भी प्रकार का कोई भ्रम नहीं था। इस मामले में गड़बड़ी एक मार्च 1972 को पूरक (सप्लीमेंट्री) ट्रस्ट डीड से शुरू हुई। इसके माध्यम से ट्रस्टियों ने खुद को राज्य शासन के नियंत्रण से मुक्त कर लिया। इसी सप्लीमेंट डीड के बाद संपत्तियों के खुर्द-बुर्द होने का खेल शुरू हुआ, जबकि ट्रस्ट को केवल संपत्तियों की देखभाल करने के अधिकार थे, न कि उन पर स्वामित्व के। ट्रस्ट अधिनियम के प्रविधानों के अनुसार ट्रस्टियों को संपत्ति के अंतरण का अधिकार ही नहीं था। हाईकोर्ट के स्पष्ट निर्देश के बाद माना जा रहा है खासगी ट्रस्ट से जुड़े लोग आगे का कानूनी रास्ता तलाश रहे हैं। इस प्रकरण के सामने आने के बाद सरकार की जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वह ऐतिहासिक धरोहरों की देखरेख करने वाले ट्रस्टों को स्पष्ट कानूनी दायरे में लाने का उपाय करे।
खासगी ट्रस्ट में संपत्तियों की बिक्री और लीज पर देने के मामलों का खुलासा होने के बाद अब प्रशासन ने 246 संपत्तियों से जुड़ी जमीनों का हिसाब-किताब भी ट्रस्ट से मांगा है। बेची गई संपत्तियों की जांच में सामने आया, यह संपत्तियां धर्मस्थलों के रखरखाव के लिए थी। इसकी जानकारी ट्रस्ट की संपत्ति की सूची के साथ मिलान नहीं हो रही है। जैसे वाराणसी स्थित नागवा बगीचे की 2.56 एकड़ जमीन खासगी संपत्ति थी, इसकी आय का उपयोग वहां के धर्मस्थलों के लिए होता था। इससे बेचने की अनुमति के लिए लिखे पत्र से खासगी संपत्तियों को बेचने और सरकार के नुमाइंदों की मूक सहमति का खुलासा हुआ है। इस मामले में इंदौर में 2012 के पहले पदस्थ संभागायुक्तों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। 1969 के पत्र का अनुसरण आंख बंदकर क्यों किया?
दरअसल 1948 से पहले देश में 28 स्थानों पर होलकर रानियों ने 246 स्थानों का निर्माण किया। इनमें कई मंदिर हैं। जिस तरह से बेचने और लीज पर देने के प्रकरण सामने आए हैं, इनमें मंदिरों से जुड़ी जमीनें और अतिरिक्त संपत्तियां हैं। प्रारंभिक जांच में एक तथ्य सामने आया, ट्रस्ट की ओर से बनाए मंदिरों के साथ रखरखाव के लिए जमीनें या बगीचे रखे गए थे। इसका पहला प्रमाण 1969 में ट्रस्ट के सचिव एमएम जगदाले की ओर से लिखे पत्र से मिल रहा है। ट्रस्ट ने वाराणसी स्थित नागवा बगीचे को बेचने के लिए सरकार से अनुमति मांगी थी। 2.56 एकड़ जमीन बेचने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव एमपी श्रीवास्तव ने यह कहते हुए मना कर दिया, सरकार ट्रस्ट से जुड़ी संपत्तियों और जमीनों को बेचने के मामले में पिक्चर में नहीं आना चाहती है, इसलिए ट्रस्ट की संपत्ति को बेचने के लिए किसी तरह की अनुमति का सवाल ही नहीं उठता है। आगे इसी पत्र ने ट्रस्टियों का हौंसला बढ़ाया और जमीनों के सौदे के रास्ते निकाले जाने लगे। हालांकि कोर्ट ने इस पत्राचार को वैधानिक नहीं माना। ट्रस्टियों ने एक सप्लीमेंट्री डीड बनाकर संपत्तियों को बेचने और लीज पर देने का सिलसिला शुरू कर दिया। सरकार इस बात की भी जांच करेगी।
इंदौर के खासगी ट्रस्ट द्वारा देशभर में हजारों करोड़ की संपत्तियां बेचने के मामले में मप्र सरकार के कई रिटायर्ड अफसरों की भूमिका सवालों के घेरे में है। क्योंकि ट्रस्ट के बोर्ड में शामिल रहे अफसरों की सहमति से दी ट्रस्ट ने देश के कई राज्यों में संपत्तियों को कौढ़ियों के मोल बेचा है। ऐसे में दो पूर्व मुख्य सचिव एमपी श्रीवास्तव एवं बीपी सिंह ने भी संपत्ति बेचने की मंजूरी के लिए हस्ताक्षर किए थे। तब बीपी सिंह इंदौर के संभागायुक्त थे। वे अब मप्र राज्य निर्वाचन आयोग के आयुक्त हैं। निष्पक्ष जांच के लिए बीपी को इस जिम्मेदारी से हटाया जा सकता है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देवी रानी अहिल्याबाई होल्कर के देशभर में संपत्तियों को बेचने पर नाराजगी जताई है। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेश के बाद तत्काल लोक संपत्तियों के प्रबंधन के लिए अलग विभाग बना दिया है और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में वरिष्ठ अफसरों की साधिकार समिति का गठन भी कर दिया है। मुख्यमंत्री ने हाईकोर्ट के निर्देश के परिपालन में संपत्तियां बेचने का मामला ईओडब्ल्यू को सौंप दिया है। संपत्तियां बेचने के मामले में कई रिटायर्ड अफसरों की भूमिका सामने आ रही है, ऐसे में जांच एजेंसी उनसे पूछताछ भी कर सकती है। बीपी सिंह 8 जून 2007 से 23 मई 2011 तक इंदौर संभाग के आयुक्त रहे हैं। खासगी ट्रस्ट ने इस दौरान प्रदेश एवं दूसरे राज्यों में संपत्तियों का सौदा किया था। खबर है कि खासगी ट्रस्ट मामले में बीपी सिंह की राज्य निर्वाचन आयोग से विदाई हो सकती है।
यदि खासगी ट्रस्ट की संपत्तियां बेचने के मामले में बीपी सिंह को राज्य निर्वाचन आयोग से हटाया जाता है तो वे तीसरे पूर्व मुख्य सचिव होंगे, जिनका मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पुनर्वास खत्म किया है। इससे पहले पूर्व मुख्य सचिव आर परशुराम को सुशासन संस्थान एवं अंटोनी डिसा को रेरा के अध्यक्ष पद से हटाया जा चुका है।
26 राज्यों में 246 संपत्तियां
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि खासगी ट्रस्ट किसी की जागीर नहीं है। इसमें गड़बड़ी करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होगी। इसके बाद मुख्य सचिव इकबाल सिंह बैस ने संपत्तियों पर कब्जा लेने के निर्देश दिए। इधर, खासगी ट्रस्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी है। दूसरी तरफ, ट्रस्ट की संपत्तियों को लेकर नए खुलासे हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार 26 राज्यों में 246 संपत्तियों की जानकारी मिली है। सरकार के पास मौजूद रिकॉर्ड के अनुसार, रामेश्वरम की तीन, जिसमें ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास की कीमती जमीन भी है, के अलावा खंडवा की दो, पुष्कर की दो, हरिद्वार की एक और जेजुरी महाराष्ट्र स्थित 10 संपत्तियों के सौदे हो चुके हैं। यही नहीं, कुशावर्त घाट को बेचने का सौदा निजी ट्रस्ट बताकर कर दिया। शेष संपत्तियों को लेकर इलाहाबाद से लेकर हरिद्वार, वृंदावन, अयोध्या में 42 केस चल रहे हैं। खासगी ट्रस्ट की संपत्तियों को बेचने के लिए ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने अलग-अलग तरह के खेल किए। साल 1962 में गठित ट्रस्ट को पहले सरकारी ट्रस्ट बताकर रजिस्ट्रार पब्लिक ट्रस्ट से संपत्ति बेचने के लिए छूट ले ली गई और तत्कालीन मुख्य सचिव एमपी श्रीवास्तव ने भी जून 1969 में संपत्ति बेचने की मंजूरी का पत्र जारी कर दिया। लेकिन इसके बाद 1972 में नई ट्रस्ट डीड बनाकर संपत्ति बेचने का प्रावधान कर दिया गया, जबकि मूल ट्रस्ट गठन में केवल संपत्ति के प्रबंधन की ही जिम्मेदारी थी।
महाराजा और महारानी ने अपना सबकुछ इंदौर को समर्पित किया
ट्रस्ट के सचिव राठौर का कहना है कि महारानी के परिवार पर 100-200 करोड़ की संपत्तियों को औने-पौने दामों में बेचे जाने का आरोप लगाया जा रहा है। उन्हीं महारानी के परिवार ने इंदौर की जनता के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर दिया। उन्होंने बताया कि विभाजन के बाद भारत सरकार के कोविनेंट के जरिए इंदौर शहर की असीम संपदा महारानी के नाम पर की गई थी, जिसमें कलेक्टोरेट से लेकर भंवरकुआं, फलबाग और राजेन्द्र नगर तक की पूरी भूमियों के अलावा राजबाड़ा, लालबाग पैलेस से लेकर शहर की कई संपत्तियां शामिल थीं। लेकिन महारानी ने महाराजा यशवंतराव होलकर के रहते जहां एमवाय हास्पिटल सरकार को सौंपा, वहीं उनके अवसान के बाद वारिस के तौर पर मिली सारी संपत्तियां अपने निजी ट्रस्ट में शामिल कर शहर के लिए समर्पित करना शुरू की। इंदौर में यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए उन्होंने आरएनटी मार्ग स्थित अपनी भूमि जहां शासन को सौंप दी, वहीं लालबाग पैलेस भी शासन को सौंप दिया। इंदौर में जब कैट जैसे वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र का शुभारंभ करने की बात शुरू हुई तो जिला प्रशासन ने महारानी के स्वामित्व की 300 एकड़ जमीन मांगी।
- अरविंद नारद