बाबरी से सब बरी
07-Oct-2020 12:00 AM 3823

 

अयोध्या विवाद एक राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक-धार्मिक विवाद था, जो 90 के दशक में सबसे ज्यादा उभार पर था। इस विवाद का मूल मुद्दा राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद को लेकर था। इन दोनों मुद्दों का 2020 में पटाक्षेप हो गया है। इसके साथ ही राजनीति का एक ऐसा मंच समाप्त हो गया, जिसको लेकर बार-बार राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही थीं। लेकिन ऐसा नहीं है कि इसके बाद धर्म की राजनीति पर विराम लग जाएगा। अब काशी और मथुरा के विवादों को हवा दी जा रही है।

आज से करीब 35 साल पहले बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि विवाद राजनीतिक युद्ध का ऐसा मैदान बना कि इस मुद्दे पर शह और मात का खेल होता रहा। लेकिन 2020 स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया है, क्योंकि इस साल राम जन्मभूमि और बाबरी विध्वंस मामले पर पटाक्षेप हो गया है। बाबरी विध्वंस मामले में सीबीआई की अदालत ने मामले में दोषी बनाए गए सभी 32 लोगों को बाइज्जत बरी कर दिया है। सीबीआई इस मामले पर मुंह के बल जा गिरी। पूरा मामला पत्रकारों और अखबार की कटिंग पर आधारित था। संघ परिवार, भाजपा व अन्य हिंदू संगठनों से जुड़े नेताओं को बाबरी मस्जिद गिराने का साजिशकर्ता बताया गया, लेकिन उनकी साजिश को पूरा किसने किया इसका कहीं अता-पता नहीं। दरअसल, बाबरी का विध्वंस उन्मादकारी तत्वों के हाथों हुआ था। देर से ही सही अब इस मामले का पटाक्षेप हो गया है। यह देश के लिए शांति की ओर एक कदम है।

वास्तव में 6 दिसंबर 1992 को लगभग 9:30 बजे कारसेवकों का एक जत्था तेजी से विवादित ढांचे की ओर बढ़ा और फावड़े, गैंती, बड़े-बड़े हथौड़े से विवादित ढांचे को गिराना शुरू किया। इस प्रयास में लगभग आधा दर्जन से अधिक लोग मारे गए और बड़ी संख्या में कारसेवक घायल भी हुए। घायलों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए कुछ पत्रकारों सहित कई लोगों की गाड़ियों पर कब्जा कर लिया गया। सीबीआई के सामने ही पूरा रिकॉर्ड था कि उस ढांचे को गिराने वाले कौन लोग थे और इसके लिए क्या-क्या तैयारियां की गई थीं। लेकिन इस पक्ष की ओर सीबीआई ने ध्यान नहीं दिया। वास्तव में मंदिर आंदोलन से जुड़े तमाम नेताओं को यह पता ही नहीं था कि इस तरह की कोई घटना होने जा रही है। संघ परिवार के एक बड़े नेता ने कहा कि उन्हें जरा भी जानकारी होती कि इस तरह की तैयारी कारसेवकों के एक वर्ग द्वारा की गई है तो भाजपा के तमाम बड़े नेताओं को अयोध्या बुलाते ही नहीं। यह उनकी सबसे बड़ी चूक थी। लेकिन तत्कालीन केंद्र सरकार जो इस मामले पर घिरी हुई थी वह लक्ष्य बनाकर तीर चला रही थी। वह उन भाजपा नेताओं को किनारे लगा कर एक वर्ग का गुस्सा शांत कर देना चाहती थी जो मंदिर आंदोलन के अगुआ थे। इसीलिए 120-बी यानी आपराधिक षड्यंत्र के सहारे ही सारा मामला आगे बढ़ा और नेताओं पर निशाना साधा गया। यह अलग बात है कि सारा केस अखबारों की कटिंग व वीडियो पर आधारित था।

विध्वंस सुनियोजित नहीं था

फैसला सुनाते हुए सीबीआई अदालत के विशेष जज एसके यादव ने कहा कि विध्वंस सुनियोजित नहीं था। उल्लेखनीय है कि 6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया था और देश में व्यापक अशांति फैल गई थी। फैसला सुनाते वक्त जज ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ ठोस व पर्याप्त सबूत उपलब्ध नहीं हुए। सीबीआई द्वारा प्रस्तुत ऑडियो-वीडियो टेप की प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हुई। यह भी कि विवादित ढांचे को गिराने वाले असामाजिक तत्व थे। साथ ही आरोपी नेताओं के भाषणों की ऑडियो क्लिप स्पष्ट नहीं थी।

अदालत के फैसले के वक्त जहां शेष सभी आरोपी अदालत में मौजूद थे, वहीं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत से जुड़े थे। जाहिर तौर पर भाजपा, संघ व विहिप के नेताओं ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया। वहीं मुस्लिम संगठनों ने न्याय की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए ऊंची अदालत का दरवाजा खटखटाने की बात कही। उनका दावा है कि घटनाक्रम के साक्ष्यों के आधार पर जब इन नेताओं पर आपराधिक साजिश रचने और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप थे तो उन्हें बरी कैसे किया गया। विभिन्न राजनीतिक दलों की तल्ख प्रतिक्रियाएं इस फैसले को लेकर आई हैं। उनकी दलील है कि 28 साल बाद 2300 पन्नों के फैसले में न्याय कहां है? उल्लेखनीय है कि इस विध्वंस मामले में 49 लोगों को आरोपी बनाया गया था, सुनवाई के दौरान 17 आरोपियों की मौत हो गई और बचे 32 आरोपी बरी कर दिए गए। पिछली 16 सितंबर को सीबीआई अदालत ने सुनवाई पूरी करके फैसला 30 सितंबर तक के लिए सुरक्षित कर लिया था।

बहरहाल, इस फैसले को लेकर देश की शीर्ष जांच एजेंसी का सवालों के घेरे में आना स्वाभाविक ही है कि वह 28 साल में ठोस प्रमाण क्यों नहीं जुटा पाई। हालांकि, एजेंसी अब कह रही है कि ऊंची अदालत में अपील हेतु वह न्यायिक सलाह लेगी। इसके अतिरिक्त प्रश्न यह भी है कि यदि बरी किए लोग दोषी नहीं थे तो अराजक तत्व कौन थे, उन्हें किसने प्रेरित किया, जिसके चलते उन्होंने सुनियोजित तरीके से विवादित ढांचे को नेस्तनाबूत कर दिया। यह भी कि यदि यह साजिश नहीं थी तो पूरे देश से इतने लोग कैसे जुटे थे? उन्हें उद्वेलित करने वाले भाषण किसके थे? इस फैसले के खिलाफ बाबरी एक्शन कमेटी ने हाईकोर्ट में अपील करने की घोषणा कर दी है। बहरहाल, इस प्रकरण में खूब राजनीति हुई। मगर राजनीति से इतर जो स्वाभाविक प्रश्न है कि यदि उस दिन अयोध्या में कोई अपराध हुआ था तो दोषियों को दंडित किया जाना चाहिए था। वहीं इस मामले में शिवसेना की दलील है कि राम जन्मभूमि मामले में शीर्ष अदालत के फैसले के बाद विवादित ढांचे के ध्वंस विवाद की प्रासंगिकता खत्म हो गई। वहीं कुछ कानून के जानकार कहते हैं कि जब 6 दिसंबर 1992 को कोई कानून तोड़ा गया था और यदि किसी को दंडित नहीं किया जाता तो यह फैसला कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लगाता है। यह भी कि सीबीआई ने अपना काम ठीक से नहीं किया। यही वजह है कि तमाम साक्ष्यों व 350 प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बावजूद मुकदमा तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचा। तर्क दिया जा रहा है कि जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष अलग और स्वायत्त होने चाहिए। सीबीआई के 'पिंजरे का तोताÓ होने के शीर्ष अदालत के आरोप फिर हकीकत बनते नजर आते हैं। विपक्षी नेता आरोप लगा रहे हैं कि घटना के बाद शीर्ष अदालत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने इसे कानून का भयावह उल्लंघन बताया था तो उल्लंघन के दोषियों को दंडित क्यों नहीं किया गया। वहीं राम जन्मभूमि मामले में पक्षकार रहे हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल अंसारी ने फैसले का स्वागत किया है।

अयोध्या के दोनों विवाद निपट गए

अयोध्या में वर्षों से खड़े दो विवाद एक के बाद एक निपट गए हैं। पहले शांतिपूर्ण ढंग से राममंदिर पर फैसला आया और सौहार्द्धपूर्ण माहौल में भूमिपूजन हो गया। 30 सितंबर को  यह भी अदालत से ही स्पष्ट हो गया कि विवादित ढांचे को गिराने में कोई साजिश नहीं थी। लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी समेत 32 आरोपियों को बरी कर दिया गया। लेकिन जिस तरह विवादित ढांचे के नीचे रामजन्मभूमि मंदिर होने के पुख्ता सबूत के आधार पर दिया गया सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ लोगों का रास नहीं आया था, उसी तरह सबूतों के अभाव में भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के नेताओं का रिहा होना भी कईयों को पसंद नहीं आ रहा है। कुछ लोग इसे काला दिवस बता रहे हैं, कुछ सीबीआई पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि देश में ऐसे लोग हैं जिन्हें केवल अपनी मर्जी के फैसले चाहिए होते हैं। फैसला अलग हुआ नहीं कि सवाल खड़े।

कांग्रेस, वाम जैसे कुछ दलों की ओर से तत्काल विशेष अदालत के फैसले पर सवाल उठाए गए। कांग्रेस ने कहा कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस अवलोकन के खिलाफ है जिसमें कोर्ट ने ध्वंस को गैरकानूनी कहा था। तो विशेष अदालत ने कब कहा कि जो हुआ वह कानूनी था। कोर्ट ने भी तो यही कहा है कि अराजक तत्व ध्वंस के लिए जिम्मेदार थे।

साजिश के तहत फंसाया गया

सीबीआई को एक बार फिर से सरकार का 'तोताÓ कहा जाने लगा है। लेकिन सच्चाई का एक दूसरा पहलू भी है। बाबरी मस्जिद के गिरने के बाद सीबीआई को इसकी जांच सौंपी गई और सीबीआई ने अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच भी शुरू कर दी। लेकिन उसके बाद राजनीतिक स्तर पर एक और साजिश शुरू हुई थी, जिसका पर्दाफाश अदालत के फैसले में हुआ है। यह साजिश थी भाजपा और विश्व हिंदू परिषद के वरिष्ठ नेताओं को इस मामले में फंसाने की। आडवाणी समेत कई नेताओं को तो बहुत पहले ही कोर्ट ने बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को नहीं बदला तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी हो गई। वर्ष 2010 में सीबीआई को एक और एफआईआर दर्ज करने पर मजबूर किया गया, जिसमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, अशोक सिंघल समेत भाजपा व विहिप के 48 वरिष्ठ नेताओं को आरोपी बनाया गया।

एक सवाल जरूर उठता है कि आखिर इतने हाईप्रोफाइल केस का फैसला आने में इतना अधिक समय क्यों लग गया। तो इसका जवाब भी भाजपा और वरिष्ठ नेताओं को फंसाने के लिए की गई साजिश में ही छुपा है। सीबीआई से दो एफआईआर दर्ज कराई गई थी। इस क्रम में यह ध्यान में रखा गया कि एक विवादित ढांचे को गिराने की साजिश के दोनों के केस का अदालती कार्रवाई का दायरा भी अलग-अलग हो गया है। एक लखनऊ में तो दूसरा रायबरेली में। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दशकों तक एक पूरी कानूनी जंग इस अदालती कार्रवाई के दायरे को तय करने को लेकर होती रही। कानूनी पेंच इस बात पर भी फंसता रहा कि दो एफआईआर की चार्जशीट भी दो होगी या एक। यदि दो चार्जशीट होती है तो उसकी सुनवाई रायबरेली और लखनऊ की अलग-अलग अदालत में होगी या फिर एक ही अदालत में। यदि एक ही अदालत में सुनवाई होगी तो फिर रायबरेली या लखनऊ की अदालत में किसमें सुनवाई की जाएगी। आखिरकार 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि दोनों केस एक साथ रायबरेली की अदालत में ही सुने जाएंगे। अदालत के फैसले से विवादित ढांचे के गिरने के बाद भाजपा व विहिप के वरिष्ठ नेताओं को फंसाने की गई राजनीतिक साजिश का पर्दाफाश हो गया।

सुनवाई में देर कहां हुई?

इस मामले में 4 साल तक कुछ नहीं हुआ। हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर की वजह से कागज तक नहीं हिला। 12 फरवरी 2001 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आडवाणी, जोशी, उमा, कल्याण सिंह और अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश की धारा हटाने का आदेश दिया। तीन महीने के भीतर 4 मई 2001 को लखनऊ की स्पेशल कोर्ट ने एफआईआर 197/92 और 198/92 को अलग-अलग सुनवाई के लिए लिया। यह भी कहा कि 21 आरोपियों के खिलाफ रायबरेली की कोर्ट में सुनवाई होगी। वहीं, 27 आरोपियों के खिलाफ सुनवाई लखनऊ में होगी। सीबीआई ने तब इलाहाबाद हाईकोर्ट में आपराधिक साजिश का आरोप हटाने के आदेश का रिव्यू करने के लिए याचिका लगाई, लेकिन यह याचिका खारिज हो गई। 16 जून को सीबीआई ने उप्र सरकार को पत्र लिखकर कहा कि ट्रायल दोबारा शुरू करने के लिए नोटिफिकेशन जारी करें। जुलाई 2003 में सीबीआई ने आडवाणी के खिलाफ आपराधिक साजिश का आरोप वापस ले लिया और रायबरेली कोर्ट में नए सिरे से चार्जशीट दाखिल की। लेकिन, जुलाई 2005 में हाईकोर्ट ने आडवाणी के खिलाफ 'नफरत फैलानेÓ का आरोप तय किया। 2010 तक दोनों केस अलग-अलग अदालतों में चलते रहे। 2011 में सीबीआई आखिर सुप्रीम कोर्ट पहुंची और वहां यह तय हुआ कि रायबरेली की सुनवाई भी लखनऊ ट्रांसफर की जाए। अगले 7 साल तक अदालतों में आरोप तय होने को लेकर रिव्यू याचिकाएं दाखिल होती रहीं। 19 अप्रैल 2017 को आडवाणी और अन्य आरोपियों पर फिर से आपराधिक साजिश का आरोप तय हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को त्रुटिपूर्ण करार देते हुए सीबीआई की भी इस बात को लेकर खिंचाई की कि उस आदेश को पहले चुनौती क्यों नहीं दी गई? तकनीकी तौर पर 2010 में ही ट्रायल शुरू हो सका। आरोप तय होने के स्टेज पर सुनवाई अटकी रही क्योंकि अधिकांश आरोपी हाईकोर्ट में थे।

बाबरी ढांचे के विध्वंस से जुड़े मामले में 30-40 हजार गवाह थे। ट्रायल में मौखिक गवाही महत्वपूर्ण रही। मौखिक सबूतों में गवाहों के पुलिस को दिए बयानों को लिया गया। सीबीआई ने जांच के दौरान 1,026 गवाहों की सूची बनाई। इसमें ज्यादातर पुलिसकर्मी और पत्रकार थे। 8 भाजपा और विहिप नेताओं के खिलाफ आपराधिक साजिश का आरोप साबित करने के लिए मौखिक आरोप ही हैं। इस वजह से सीबीआई ने अतिरिक्त प्रयास किए ताकि ज्यादा से ज्यादा गवाहों को जुटाया जा सके। 2010 से सीबीआई की कई टीमों ने देशभर का दौरा किया और लोगों को कोर्ट में पेश होने के लिए समन दिए। कुछ को तो इंग्लैंड और म्यांमार में भी ट्रेस किया है। हजारों में से सिर्फ 351 गवाह ही कोर्ट में बयान देने पहुंच सके।  मौखिक सबूतों में इन नेताओं की ओर से दिए गए भाषण शामिल हैं। खासकर 1990 में अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर के लिए जब लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा शुरू की, उस दौरान दिए गए बयानों को सबूत माना गया। यह बताता है कि ढांचे को गिराने का विचार 1990 में ही आया, जो बताता है कि यह साजिश थी।

आखिर किसने ढहाया था ढांचा?

फैसला सुनाते हुए विशेष सीबीआई जज एसके यादव ने कहा- 'हमारी कानून व्यवस्था का इससे अधिक मखौल नहीं उड़ाया जा सकता है। यह तो सभी को पता था कि किसी बड़े नेता को सजा नहीं होगी लेकिन सभी को बरी कर देना सिर्फ और सिर्फ यह दिखाने की कोशिश है कि हम जो चाहेंगे वह करेंगे। यह एक नए आंदोलन को बढ़ावा देगा, जिसकी शुरुआत मथुरा से हो चुकी है।Ó गौरतलब है कि बीते 25 सितंबर को उप्र के मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मस्थान परिसर के पास स्थित शाही ईदगाह मस्जिद को वहां से हटाने के लिए अदालत में एक याचिका दायर की गई है। बाबरी विध्वंस मामले में कई सालों से सुनवाई चल रही थी, जिसे 2017 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पूरे होने की दिशा मिली थी।

प्रधान कहते हैं, 'अप्रैल 2017 में जब सुप्रीम कोर्ट ने रोजाना सुनवाई करने और रायबरेली व लखनऊ की अदालतों में चल रहे मामलों को एक कर सुनवाई करने का आदेश दिया था तब ही अदालत ने साफतौर पर यह कहा था कि यह साजिश है और सभी के खिलाफ साजिश का मामला चलाया जाए।Ó बाबरी मस्जिद विध्वंस को साजिश न मानने के विशेष सीबीआई जज के फैसले पर सवाल उठाते हुए प्रधान कहते हैं कि यह तो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के ही विरोधाभासी है। उन्होंने कहा, 'इससे पहले हाईकोर्ट ने सभी को बरी करते हुए कहा था कि साजिश नहीं है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा साजिश का मामला शुरू कराया था। उस साजिश को विशेष अदालत ने नकार दिया है। वहीं दूसरी तरफ जब सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर बनाने का फैसला दिया था, तब उसने एक जुमला इस्तेमाल किया था कि विध्वंस एक कैलकुलेटेड एक्ट था। कैलकुलेटेड एक्ट का मतलब होता है साजिश। यह पूरी तरह से उसके विपरीत है।Ó

सबूत पर्याप्त नहीं

विशेष सीबीआई अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि सीबीआई ने इस मामले में सबूत के तौर पर जो वीडियो फुटेज की कैसेट पेश कीं, उनके दृश्य स्पष्ट नहीं थे और न ही उन कैसेट्स को सील किया गया। घटना की तस्वीरों के नेगेटिव भी अदालत में पेश नहीं किए गए। अदालत के इन तर्कों पर प्रधान कहते हैं, 'यह बड़ा साफ है कि जिस तरह का निर्णय दिया गया है वह सही नहीं है। यह मान लेना कि सारे सबूत बकवास हैं, सीबीआई का मखौल उड़ाना है। अब यही दिखा रहे हैं कि देखिए सीबीआई ने तो केस बनाया लेकिन जो है, सब बकवास है।Ó

अदालतों में पेश वीडियो फुटेज के मसले पर उन्होंने आगे कहा कि इस देश में जब-जब नेता किसी मामले में शामिल रहे हैं तब-तब वीडियो रिकॉर्डिंग को नकारा गया है, चाहे वह वीडियो अभिषेक मनु सिंघवी का हो, मुलायम सिंह यादव का, वरुण गांधी का, या चाहे अमर सिंह का। ये सब बरी हो गए। जो भी गलत काम या गलत बात करते हुए पकड़े गए उन सभी का फैसला यही आया कि वीडियो से छेड़छाड़ हुई या उसे बनाया गया था। उन्होंने कहा, 'यह एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस हो गई है क्योंकि यह मानकर चला जाता है कि नेता कोई गलत काम नहीं करता है। आम आदमी तो जेल में बंद भी हो जाएगा और सजा भी हो जाएगी। इस मामले में तो और भी बड़े-बड़े नेता शामिल हैं। यह दिखाता है कि किस तरह से हमारी न्यायिक प्रणाली को तोड़ा-मरोड़ा जाता है। कानून के शासन की जगह अब जिसकी लाठी उसकी भैंस वाला मसला हो गया है।Ó फैसले में यह भी कहा गया कि सीबीआई पर्याप्त सबूत नहीं दे सकी। आरोपियों के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत नहीं मिले, बल्कि आरोपियों द्वारा उन्मादी भीड़ को रोकने का प्रयास किया गया था।

कोर्ट में नहीं टिक पाए सीबीआई के सबूत

अयोध्या विवादित ढांचे के विध्वंस मामले में फैसला 2300 पन्नों का था। सीबीआई ने कोर्ट के सामने कई सबूत पेश किए, लेकिन वह सभी नाकाफी साबित हुए। सभी सबूत पर्याप्त नहीं थे। वहीं सीबीआई कोर्ट ने माना कि यह घटना अचानक हुई थी। यह कोई पूर्व सुनियोजित साजिश नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि केवल फोटो के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता है। फोटो, वीडियो, फोटोकॉपी को जिस तरह से साबित किया गया वह साक्ष्य में ग्राह्य नहीं है। कोर्ट में टेंपर्ड सबूत पेश किए गए थे। ढांचा गिराने की घटना अचानक हुई थी, इसमें कोई साजिशन नहीं थी। ढांचा गिराने में किसी भी तरह की साजिश के सबूत नहीं मिले है। अज्ञात लोगों ने विवादित ढांचा गिराया था। जिन्हें आरोपी बनाया गया है, उनका इस घटना से लेना-देना नहीं। सीबीआई 32 आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत पेश करने में नाकाम रही है। गवाहों के बयान कहते हैं कि कारसेवा के लिए जुटी भीड़ की नीयत बाबरी ढांचा गिराने की नहीं थी। अशोक सिंघल ढांचे को सुरक्षित रखना चाहते थे क्योंकि अंदर मूर्तियां थीं। विवादित जगह पर रामलला की मूर्ति मौजूद थी, इसलिए कारसेवक उस ढांचे को गिराते तो मूर्ति को भी नुकसान पहुंचता। कारसेवकों के दोनों हाथ व्यस्त रखने के लिए जल और फूल लाने को कहा गया था। अखबारों में लिखी खबरों को सबूत नहीं माना जा सकता। सबूत के रूप में कोर्ट में सिर्फ फोटो और वीडियो पेश किए गए। जो की टेंपर्ड थे। उनके बीच-बीच में खबरें थीं, इसलिए इन्हें भरोसा करने लायक सबूत नहीं मान सकते। चार्टशीट में तस्वीरें पेश की गईं, लेकिन इनमें से ज्यादातर के निगेटिव कोर्ट को मुहैया नहीं कराए गए। इसलिए फोटो भी प्रमाणिक सबूत नहीं हैं।

इन 49 लोगों पर था बाबरी विध्वंस का आरोप

28 साल पहले हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस में 49 लोगों को आरोपी बनाया गया था। इनमें से 32 लोग जीवित हैं। जिन्हें अदालत ने इस मामले से बरी कर दिया है। इनमें लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, महंत नृत्य गोपालदास, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी रितंभरा, रामविलास वेदांती, धरम दास, सतीश प्रधान, चंपत राय, पवन कुमार पांडेय, ब्रजभूषण सिंह, जय भगवान गोयल, महाराज स्वामी साक्षी, रामचंद्र खत्री, अमननाथ गोयल, संतोष दुबे, प्रकाश शर्मा, जयभान सिंह पवैया, विनय कुमार राय, लल्लू सिंह, ओमप्रकाश पांडेय, कमलेश त्रिपाठी उर्फ सती दुबे, गांधी यादव, धर्मेंद्र सिंह गुर्जर, रामजी गुप्ता, विजय बहादुर सिंह, नवीन भाई शुक्ला, आचार्य धर्मेंद्र देव, सुधीर कक्कड़, रविंद्रनाथ श्रीवास्तव आदि शामिल हैं। वहीं 18 लोग वे हैं, जिनका ट्रायल के दौरान निधन हो गया। इनमें अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, बालासाहेब ठाकरे, विष्णु हरि डालमिया, मोरेश्वर सावे, महंत अवैद्यनाथ, विनोद कुमार वत्स, राम नारायण दास, लक्ष्मी नारायण दास महात्यागी, हरगोविंद सिंह, रमेश प्रताप सिंह, देवेंद्र बहादुर राय, महामंडलेश्वर जगदीश मुनि महाराज, बैकुंठ लाल शर्मा, विजयराजे सिंधिया, परमहंस रामचंद्र दास, डॉ. सतीश कुमार नागर आदि शामिल हैं।

6 दिसंबर 1992 को ढांचा ढहाया

अयोध्या में बाबरी मस्जिद विवाद लगभग कई दशकों पुराना है। इसकी शुरुआत सन् 1528 में हुई थी। 6 दिसंबर, 1992 को  हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद को ढहा दिया। जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया।

16 दिसंबर, 1992: मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एमएस लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।

अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं।

सितंबर 2003: एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

जुलाई 2005: संदिग्ध इस्लामी आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी एक जीप का इस्तेमाल करते हुए विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षा बलों ने पांच आतंकवादियों को मार गिराया।

जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

30 सितंबर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

21 मार्च 2017: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता की पेशकश की। चीफ जस्टिस जे एस खेहर ने कहा है कि अगर दोनों पक्ष राजी हो तो वो कोर्ट के बाहर मध्यस्थता करने को तैयार हैं।

19 अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट ने 1992 बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले की रोज सुनवाई का आदेश देते हुए दो साल में सुनवाई पूरी करने का आदेश दिया था।

15 जुलाई 2019: अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने के मामले की सुनवाई करने वाले स्पेशल जज ने सुप्रीम कोर्ट से छह माह का और समय मांगा है।

24 जुलाई 2020: सीबीआई ने भाजपा के वयोवृद्ध नेता लालकृष्ण आडवाणी का बयान दर्ज किया। पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने लगाए गए आरोपों से इंकार किया और कहा कि उन पर जो भी आरोप लगाए गए हैं, वह राजनीतिक कारणों से थे।

30 सितंबर 2020: सीबीआई की अदालत ने सभी आरोपियों को बरी किया।

काशी और मथुरा पर नजर

अयोध्या में 'सफल मनोरथÓ होने के बाद से ही शुभचिंतकों ने 'काशी विवादÓ को नए सिरे से उद्गारना आरंभ कर रखा है और अब वे मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान परिसर के पास स्थित मस्जिद को वहां से हटाने की मांग कर कह रहे हैं कि कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान एवं शाही ईदगाह प्रबंध समिति के बीच पांच दशक पुराने समझौते को निरस्त कर मस्जिद की पूरी जमीन मंदिर ट्रस्ट को सौंप दी जाए। दरअसल, काशी में विश्वनाथ मंदिर से सटी हुई ज्ञानवापी मस्जिद स्थित है, जिसे कुछ लोग अकबर के शासनकाल में तो कुछ अन्य औरंगजेब के राज में निर्मित बताते हैं। इसी तरह मथुरा का शाही ईदगाह, कृष्ण जन्मभूमि के नजदीक बना हुआ है। हिंदू 'सम्प्रदायवादीÓ मानते हैं कि अयोध्या में रामजन्मभूमि की ही तरह बाबा विश्वनाथ यानी भगवान शंकर व कृष्ण में उनकी आस्था के इन दो केंद्रों को मुक्त कराना भी आवश्यक है। और हां, वे तभी उन्हें मुक्त मानेंगे, जब उनके निकट से ज्ञानवापी मस्जिद और ईदगाह हट जाएं। यों, उनके द्वारा यह भी प्रचारित किया जाता है कि दिल्ली व अहमदाबाद की जामा मस्जिदें भी हिंदुओं के पूजास्थलों को तोड़कर ही बनाई गईं हैं। वे जानते हैं कि इनकी आड़ में उनकी स्वार्थ या कि सत्ता साधना तभी तक सफल हो सकती है, जब तक देशवासी इतिहास के इस सच से वंचित रहें कि अतीत में धर्मस्थलों के, वे किसी भी धर्म के क्यों न हों, तोड़े जाने का प्रमुख आधार साम्प्रदायिक या धार्मिक वैमनस्य न होकर राजे-महाराजाओं, सम्राटों व बादशाहों वगैरह के बीच अपनी सत्ता का सिक्का जमाने और संपत्ति हड़पने की प्रतिद्वंदिता हुआ करती थी। अन्यथा कई बार वे धर्मस्थलों को जागीरें और भूमि वगैरह दान भी दिया करते थे।

- राजेंद्र आगाल

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