असाधारण होने का मौका
04-May-2020 12:00 AM 469

 

योगी आदित्यनाथ की सरकार भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार की ही तरह 'सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ की बातें करती है। लेकिन एक बड़े वर्ग को ऐसा लगता है कि इस पर अक्सर उनका भगवा एजेंडा भारी पड़ जाता है। लखनऊ में 19-20 दिसंबर को हुए दंगे से निपटने का योगी सरकार का तरीका इसका एक उदाहरण माना जा सकता है। योगी आदित्यनाथ ने दिसंबर के दंगों के बाद जो बयान दिया उसमें 'बदला लेने’ की बात कही गई थी। वे शायद उस वक्त यह भूल गए थे कि किसी भी अपराध के लिए सिर्फ कानूनी कार्रवाई ही की जा सकती है, बदले की कार्रवाई नहीं। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार का काम अपने नागरिकों से बदला लेने का नहीं बल्कि उनकी रक्षा करने का होता है। फिर भले ही उनमें से कुछ लोगों ने उसे वोट दिया हो या नहीं। लेकिन योगी सरकार ने दंगों की आरंभिक जांच के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी शुरू कर दी और फिर उन्हें वसूली के नोटिस भिजवाने भी शुरू कर दिए।

फिर इसके लगभग ढाई महीने के बाद दंगों की शुरूआती जांच में दोषी ठहराए गए 57 आरोपियों के पोस्टर राजधानी लखनऊ के प्रमुख चौराहों पर चस्पा कर दिए गए। पोस्टरों में इन लोगों से 88.6 लाख रुपए के नुकसान की भरपाई करवाने की बात कही गई थी। इस तरह के पोस्टर गोरखपुर, कानपुर आदि शहरों में भी लगाए गए। सरकार के इस भड़काऊ कदम पर बुद्धिजीवियों और समाज के जागरूक नागरिकों की कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। निजता का सम्मान करते हुए सरकार से पोस्टर हटाने की गुहार भी लगाई गई। मगर योगी सरकार को दया नहीं आई। इस बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने योगी सरकार के पोस्टरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई और दो दिन के भीतर सभी पोस्टरों को हटवाकर इस बारे में अदालत को सूचित करने का निर्देश भी दिया।

इस हालत में अगर चाहती तो योगी सरकार सड़कों से पोस्टरों को हटवाकर नुकसान की भरपाई की कार्रवाई जारी रख सकती थी। इससे न केवल इस मामले में कड़वाहट थोड़ी कम हो सकती थी बल्कि अदालत के आदेश का सम्मान भी हो जाता। लेकिन सरकार ने इसे 'प्रतिष्ठा का प्रश्न’ बनाकर फिर से अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा दी। वह पोस्टर हटाने के बजाय मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले गई। साथ ही साथ योगी सरकार ने अपने कदम को जायज ठहराने और भविष्य में भी ऐसा ही कर सकने के लिए एक अध्यादेश भी जारी कर दिया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इंकार कर राज्य सरकार को एक बड़ा झटका दे चुका था। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की थी कि उसने इस अध्यादेश के जरिए सुप्रीम कोर्ट के 2011 के उस आदेश का ही अनुपालन करने की कोशिश की है। जिसमें कहा गया था कि यदि किसी प्रदर्शन के दौरान सरकारी या निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है तो इसे रोकने के लिए कड़े नियम बनाए जाने चाहिए। हालांकि अदालत इस दलील से संतुष्ट नहीं हुई और अब मामला बड़ी बेंच को सौंप दिया गया है।

योगी सरकार के लिए 'सबका विश्वास’ हासिल करने का यह सुनहरा अवसर था। अगर वह सरकार के तीन साल पूरे होने पर सीएए विरोधी हिंसा के सामान्य आरोपियों को कड़ी चेतावनी और पाबंदियों के साथ आम माफी दे देती तो इससे प्रदेश में एक सकारात्मक माहौल बन सकता था। लेकिन सरकार यहां पर चूक गई। दंगों या विरोध प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा, तोड़फोड़ व आगजनी आदि से निपटने तथा उसकी क्षतिपूर्ति के लिए कड़े कदम उठाने का स्वागत होना चाहिए लेकिन इसके लिए सत्ता को बदले की भावना के बजाय निष्पक्ष कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए था। मगर योगी सरकार इसके लिए तैयार होती नहीं दिखी।

अब कोरोना संकट ने योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार को एक नया मौका दिया है। बदली हुई परिस्थितियों में अगर वे बिना किसी भेदभाव के कुछ अच्छा कर देते हैं तो वह उनके बीते तीन सालों पर भारी पड़ सकता है। इस दिशा में बीते कुछ दिनों से वे काफी कुछ करते भी दिख रहे हैं। उदाहरण के लिए वे कोरोना के संकट से निपटने के लिए तुंरत और कठोर निर्णय ले रहे हैं। और राज्य की पुलिस प्रशासन तब्लीगी जमात के हवाले से पूरे मुस्लिम समुदाय को ही खलनायक बनाने के कुछ प्रयासों पर भी उचित कदम उठा रही है। उदाहरण के तौर पर हाल ही में एक समाचार चैनल ने यह खबर चलाई थी कि प्रदेश के फिरोजाबाद जिले में तब्लीगी जमात के चार लोग कोरोना से संक्रमित पाए गए हैं और उन्हें लेने जब पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची तो उस पर पथराव किया गया। फिरोजाबाद पुलिस ने न्यूज चैनल की इस खबर का तुरंत खंडन किया और इससे जुड़े ट्वीट को हटाने का निर्देश भी दिया। ऐसा ही कुछ दूसरे ऐसे कुछ मामलों में भी देखा गया है।

भरोसे पर खरा उतरने का समय

कोरोना संकट से निपटने में योगी सरकार तो कठोर निर्णय लेती दिख रही है लेकिन इनके क्रियान्वयन के मामले में प्रशासन उतना चुस्त अब तक नहीं दिख पा रहा है। इस मामले में राज्य सरकार के स्तर पर कभी-कभी अस्पष्टता का अभाव भी देखा जा रहा है। इसी के चलते जब उसने 8 अप्रैल को राज्य के 15 जिलों के कुछ इलाकों को पूरी तरह से सील करने की घोषणा की तो नोएडा जैसे राज्य के सबसे विकसित और व्यवस्थित शहरों में अफरा-तफरी का आलम बना रहा। अगर योगी सरकार संकट की इस घड़ी में राज्य के हर समुदाय को दूसरे के बराबर न्याय और सभी को जरूरी चीजें उपलब्ध कराने का भरोसा दिला दे तो न केवल कोरोना को हराने में यह बड़ी भूमिका निभा सकता है बल्कि आदित्यनाथ को भी एक नई तरह से स्थापित करने का काम कर सकते हैं। नहीं तो वे कितने ही उत्सव मना लें सबके विश्वास का दावा नहीं कर सकते।

- लखनऊ से मधु आलोक निगम

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