आरोप पत्र में अटकी अफसरों की पेंशन
01-Sep-2022 12:00 AM 5279

 

मप्र में सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति के बावजूद प्रदेश में भ्रष्टाचार रुकने का नाम नहीं ले रहा है। आलम यह है कि एक अदने से कर्मचारी से लेकर बड़े-बड़े अफसर भ्रष्टाचार में फंसे हुए हैं। प्रदेश में ऐसे ही कुछ आईपीएस अधिकारी हैं जिनके खिलाफ आरोप पत्र जारी किए गए हैं, जिससे उनको आधी पेंशन मिल रही है। वहीं कुछ ऐसे आईपीएस भी हैं, जिनके खिलाफ नौकरी में रहते आरोप पत्र दिया गया है। सबसे हैरानी की बात तो यह है कि वरिष्ठ अफसरों की बाबूगिरी और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण कुछ अफसरों के आरोप में निर्णय नहीं हो पा रहा है। इन अफसरों में कोई खरीदी, कोई सीबीडीटी जांच, तो कोई अव्यवहारिक लेन-देन के मामले में दोषी पाया गया है। हैरानी की बात यह है कि सरकार वर्षों से चल रहे इन मामलों में अभी तक कोई निर्णय नहीं ले पाई है।

इन अफसरों में 1985 बैच के आईपीएस अधिकारी महान भारत का नाम भी शामिल है। महान भारत पर होमगार्ड में रहते हुए नीली कैप खरीदी में भ्रष्टाचार का आरोप है। सूत्रों के अनुसार इन पर 10 से 15 लाख रुपए के भ्रष्टाचार करने का आरोप लगा है। इस आरोप के कारण जब ये 30 सितंबर 2020 को रिटायर हुए तो रिटायरमेंट के बाद इनको आधी पेंशन ही दी जा रही है। इसी तरह सीएस मालवीय को भी आरोप पत्र भेजकर आधी पेंशन दी जा रही है। इन पर आरोप है कि कमांडेंट रहते इन्होंने अपनी डेयरी में जवानों से काम करवाया था। वहीं कमांडेंट रहते अनियमितता के मामले में रघुवीर सिंह मीना को भी आधी पेंशन दी जा रही है। मीना 31 दिसंबर 2021 को रिटायर हुए थे। वहीं 2003 बैच के प्रमोटी आईपीएस अधिकारी अखिलेश झा जुलाई 2020 में रिटायर हो गए, लेकिन उनके खिलाफ बिना परमिशन अलीराजपुर में एसपी रहते हुए गुंडा स्क्वाड संचालित करने का जो मामला था, उसको लेकर उन्हें भी आधी पेंशन दी जा रही है। इस मामले में एडीजी विपिन माहेश्वरी ने कार्यवाही की थी। रिटायर्ड आईपीएस अफसर अखिलेश झा कुछ सालों पहले इंदौर पुलिस जोन के अलीराजपुर जिले में पुलिस अधीक्षक थे। इस दौरान इंदौर आईजी ने गुंडा स्क्वाड भंग करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी अलीराजपुर जिले में गुंडा स्क्वाड चलता रहा। गुंडा स्क्वाड ने पूछताछ के लिए एक व्यक्ति को हिरासत में लिया। पूछताछ के दौरान उस व्यक्ति की मौत हो गई। इस मामले में पुलिस मुख्यालय ने उस दौरान जांच की थी। जिसमें अखिलेश झा को आरोप पत्र दिया गया था।

1996 बैच के आईपीएस अधिकारी पीके माथुर भी 2016 में रिटायर हो गए हैं। लेकिन अभी भी उनको आधी पेंशन ही दी जा रही है।  दरअसल, जब गृह विभाग ने इस साल रिटायर होने वाले आईपीएस अफसरों की सूची जारी की तो उसमें पीके माथुर का नाम नहीं था। दस्तावेज खंगालने पर गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय के सर्विस रिकॉर्ड के दस्तावेजों में माथुर की जन्मतिथि में हेराफेरी होना पाई गई थी। दस्तावेजों में पाया गया कि पीके माथुर ने ज्वाइनिंग के समय सरकारी दस्तावेजों में अपनी जन्मतिथि 4 जुलाई 1956 बताई थी, जिसे बाद में उन्होंने 4 जुलाई 1959 करवा ली। खुलासा होने के बाद मामले में विभागीय जांच के आदेश दिए, जिसमें माथुर पर लगे आरोप की पुष्टि हो गई।

मप्र की शिवराज सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस का दावा करती है, लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। सचिवालय से लेकर प्रदेश के अधिकांश मलाईदार पदों पर, ऐसे आईएएस अधिकारी काबिज हैं, जिनके खिलाफ लोकायुक्त से लेकर ईओडब्ल्यू तक में भ्रष्टाचार की जांच चल रही है। खास बात यह है कि यही वे अफसर हैं, जो न केवन नीति नियंता हैं, बल्कि उनके जिम्मे ही कानून का पालन कराना होता है। सरकार द्वारा दी गई अधिकृत जानकारी के अनुसार मप्र के कई दर्जनों आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों में जांच चल रही है। जांच के दायरे में आए अफसरों में सबसे ज्यादा संख्या आईएएस अफसरों की है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि अफसर रिटायर हो जाते हैं और उनके खिलाफ चल रही जांच पूरी नहीं हो पाती है।

वी मधुकुमार, संजय माने, सुशोभन बनर्जी अधर में

मप्र में लोकसभा चुनाव के दौरान हुए काले धन के लेन-देन मामले में फंसे तीन आईपीएस अधिकारियों वी मधुकुमार, संजय माने और सुशोभन बनर्जी को भी सरकार ने आरोप पत्र देकर उनकी पेंशन और तनख्वाह आधी कर दी है। पोल कैश मामले में तीनों आईपीएस अधिकारियों पर मप्र में हुए साल 2019 में लोकसभा चुनाव के दौरान अपने निजी वाहनों से भोपाल से दिल्ली करोड़ों रुपए लेकर जाने के आरोप हैं। आयकर विभाग की जो रिपोर्ट सामने आई है, उसमें साफ तौर पर आईपीएस अधिकारी सुशोभन बनर्जी के नाम के आगे 25 लाख रुपए की राशि लिखी हुई है। इसी तरह आईपीएस अधिकारी संजय माने के नाम के आगे 30 लाख रुपए की राशि लिखी हुई है। तो वहीं आईपीएस अफसर वी मधुकुमार के नाम के सामने 12.50 करोड़ और राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी अरुण मिश्रा के नाम के आगे 7.5 करोड़ रुपए की राशि लिखी हुई है। आयकर विभाग की रिपोर्ट के मुताबिक इन सभी अधिकारियों ने भोपाल से दिल्ली यह रुपए पहुंचाए हैं। जब आयकर विभाग की शीर्ष संस्था ने इन पूरे दस्तावेजों की जांच की तो काले धन के लेन-देन के पुख्ता सबूत आयकर विभाग के हाथ लगे, जिसके बाद आयकर विभाग ने एक विस्तृत रिपोर्ट केंद्रीय चुनाव आयोग को सौंपी, जिस पर चुनाव आयोग ने ईओडब्ल्यू को इस मामले में प्राथमिक जांच दर्ज करने के आदेश दिए। चुनाव आयोग के आदेशों पर अब इस मामले में ईओडब्ल्यू ने प्राथमिक जांच दर्ज कर एसआईटी का गठन कर दिया है। लेकिन अभी तक जांच पूरी नहीं हो पाई है।

- सुनील सिंह

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