अपने ही जाल में चीन
21-Jul-2020 12:00 AM 4034

 

भारत और चीन की सीमा रेखा करीब 3500 किलोमीटर लंबी है। यह लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली है। इसे तीन भागों में बांटा गया है। पश्चिम जिसमें लद्दाख है, मध्य जिसमें हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड है एवं पूर्व जिसमें सिक्किम से लेकर अरुणाचल प्रदेश की सीमाएं हैं। मौजूदा तनाव मई 2020 के पहले सप्ताह से वैसे तो सिक्किम में शुरू हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे यह लद्दाख तक पहुंच गया। 15 जून की रात्रि में गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच बगैर घातक हथियारों के हिंसक संघर्ष हुआ जिसमें भारतीय सेना के 20 और चीनी सेना के 40 से ज्यादा सैनिक मारे गए।

1975 के बाद से भारत और चीनी सेना के बीच यह पहला हिंसक सीमाई संघर्ष था। 2017 में 73 दिनों तक डोकलाम में भारतीय और चीनी सेना आमने-सामने खड़ी रही थी। तब चीनी सेना को पीछे हटना पड़ा था। अप्रैल 2018 में प्रधानमंत्री मोदी चीन के आमंत्रण पर वहां के शहर वुहान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से शिखर वार्ता के लिए गए थे। उसमें कई दौर की वार्ता हुई थी जिसमें मूलत: आपसी विश्वास को मजबूत करने पर जोर दिया गया। इसके बाद अक्टूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति दूसरे शिखर वार्ता के लिए चेन्नई के पास महाबलीपुरम आए। इसमें भी आपसी विश्वास बढ़ाने पर जोर दिया गया। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति जिनपिंग पिछले छह वर्षों में ब्रिक्स, एससीओ सहित कई मंचों पर 18 बार मिल चुके हैं। 1988 में दशकों बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की बीजिंग यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने चीन से आपसी संबंध बढ़ाने के लिए अब तक सबसे ज्यादा गंभीर प्रयास किए।

दिसंबर 2019 में चीन के वुहान में कारोनावायरस का संक्रमण बढ़ना शुरू हुआ जो धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल गया। इसके चलते विश्वभर में अब तक पांच लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह संख्या बढ़ती ही जा रही है। आखिर इस पृष्ठभूमि में सीमा पर तनातनी पैदा करने के पीछे आखिर चीन के क्या उद्देश्य हो सकते हैं? इसके कई कारण नजर आते हैं। एक तो यह साफ है कि 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद जिस निर्बाध गति से सीमा पर सड़क, पुल, वायुपट्टी का निर्माण करना प्रारंभ किया गया उससे चीन सशंकित हो गया। 2014 से पहले भारत ने सीमा पर आधारभूत संरचनाओं का निर्माण नाम मात्र का किया था। संप्रग सरकार के समय रक्षा मंत्री एके एंटनी इस तथ्य को लोकसभा में स्वीकार कर चुके हैं।

कश्मीर का मामला और पाकिस्तान-चीन संबंध भी तनातनी का एक और कारण लगता है। अगस्त 2019 में मोदी सरकार ने अनुच्छेद-370 को हटा दिया। पाकिस्तान दुनिया के तमाम मंचों पर इसके खिलाफ अपनी छाती पीटता रहा, लेकिन कोई सहयोग नहीं मिला। यहां तक कि इस्लामिक देशों ने भी पाकिस्तान से मुंह फेर लिया। हालांकि चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कश्मीर को लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की दाल नहीं गली। 1999 में करगिल युद्ध हुआ था। उसमें पाकिस्तान ने आतंकी घुसपैठ कराई थी और पाकिस्तानी सेना सीधे तौर पर आतंकियों की मदद कर रही थी। हालांकि कारगिल संघर्ष के दौरान प्रारंभ में चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया, लेकिन बाद में पीछे हट गया। इसके बावजूद पाक-चीन गठजोड़ मजबूत होता गया। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी के मुताबिक पाकिस्तान-चीन संबंध हिमालय से ऊंचे, शहद से मीठे और सागर से गहरे हैं। हैरत नहीं कि कश्मीर पर पाकिस्तान की बेबसी को समाप्त करने के लिए भी चीन ने लद्दाख में आक्रामक रुख अपनाया हो।

चीन-पाकिस्तान का आर्थिक गलियारा लद्दाख के करीब से ही गुजरता है। चीन ने 2013 से अपने पश्चिमी शहर काश्गर को पाकिस्तान के पश्चिमी शहर ग्वादर से जोड़ने का काम शुरू किया है। इसमें दूसरी गंभीर व्यावहारिक अड़चनें आ रही हैं, ऊपर से कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाकर भारत ने उस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत बना ली है। अब लद्दाख और जम्मू-कश्मीर अलग-अलग संघ शासित प्रदेश हो गए हैं। अनुच्छेद-370 को हटाते वक्त हुए संसदीय बहस में गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा था कि भारत अक्साई चिन समेत संयुक्त कश्मीर की एक-एक इंच जमीन वापस लेगा। चीन-पाकिस्तान गलियारा संयुक्त कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरता है। गिलगित-बाल्टिस्तान भारत की वैध भूमि है। अब भारत इसे भी वापस लेने की बात लगातार दोहरा रहा है। दरअसल चीन ने लद्दाख में जो आक्रामकता दिखाई उसके जरिए वह पाकिस्तान की सुरक्षा को आश्वस्त करना चाहता था। गिलगित का क्षेत्र सामरिक तौर पर काफी महत्वपूर्ण है। अगर यह भारत के कब्जे में आ जाता है तो मध्य एशिया के देशों अफगानिस्तान और यूरोप तक भारत भूमि मार्ग से भी जुड़ जाएगा, लेकिन इससे चीन की सारी महत्वाकांक्षाएं ध्वस्त हो जाएंगी।

चीन की आक्रामकता का कूटनीतिक तौर पर मुकाबला

मोदी सरकार ने चीन की आक्रामकता का सामरिक और कूटनीतिक तौर पर जोरदार मुकाबला किया। शायद चीन को इसकी उम्मीद नहीं थी। अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और कई महत्वपूर्ण देशों ने इस संकट की घड़ी में चट्टान की तरह भारत का साथ दिया। एक तरह से चीन अपने ही बुने जाल में फंस गया और वह भी उस समय जब कोरोना के कारण वह सारी दुनिया में बदनाम है। वैश्विक जनमानस ने स्पष्ट तौर पर देखा कि चीन किस तरह विस्तारवाद में विश्वास करता है। प्रधानमंत्री मोदी ने चीन की एशिया पर प्रभुत्व स्थापित करने की महत्वाकांक्षा पर कुठाराघात किया है। अब यह साफ है कि भारत को उन सब देशों का कहीं अधिक समर्थन मिलेगा जो चीन के विस्तारवादी रवैए से त्रस्त हैं। इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकते कि चीन के प्रति अमेरिका का हमलावर रुख बढ़ता जा रहा है।

- ऋतेन्द्र माथुर

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