अमेरिका में महक रही एक तुलसी
21-Jul-2020 12:00 AM 3897

 

इस अस्त-व्यस्त दौर से मुकाबले की ऊर्जा श्रीमद्भगवद्गीता में है। इससे ही व्यक्ति को निश्चितता, शक्ति और शांति मिल सकती है। यह हम भगवान श्रीकृष्ण के सिखाए कर्मयोग व भक्तियोग के मार्ग के जरिए हासिल कर सकते हैं। ये उद्गार अमेरिकी कांग्रेस की हिंदू सदस्य तुलसी गेबार्ड ने हाल ही में एक ऑनलाइन संबोधन में कहे, जबकि अमेरिका एक अफ्रीकी अमेरिकी फ्लॉयड की हत्या से उपजे आंदोलन से जूझ रहा है।

तुलसी गेबार्ड अमेरिकी कांग्रेस में एकमात्र हिंदू सांसद हैं। वे तब सुर्खियों में आई थीं जब उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में अपने पद की शपथ गीता को हाथ में रखकर ली थी। वह न भारतीय मूल की हैं और न ही जन्म से हिंदू हैं। मां से मिले संस्कारों के बाद उन्होंने हिंदू धर्म अपनाया। उनके पिता कैथोलिक धर्म को मानने वाले हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुलसी इस साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए दावेदारी जता रही हैं। हालांकि, उन्होंने कहा कि यदि पार्टी उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार नहीं बनाती तो वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव नहीं लड़ेंगी। बहरहाल, अमेरिका में यहूदियों के बाद दूसरे नंबर पर समृद्ध भारतीयों में वे खासी लोकप्रिय हैं। उन्हें हिंदू समाज की आवाज के रूप में देखा जाता है।

तुलसी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुखर विरोधी रही हैं। यहां तक कि जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी डोनाल्ड ट्रम्प के साथ आयोजित 'हाउडी मोदी’ कार्यक्रम में भाग लेने आए, तो वह उस कार्यक्रम में शामिल नहीं हुईं। हालांकि, तुलसी प्रधानमंत्री मोदी की मुखर समर्थक रही हैं। बाद में सॉरी कहते हुए उन्होंने राष्ट्रपति पद की दावेदारी से जुड़े कार्यक्रम में अपनी व्यस्तता का हवाला दिया। हवाई राज्य से लगातार रिकॉर्ड मतों से जीतने वाली तुलसी राजनीति में आने से पहले सेना में रही हैं और मेजर के पद पर कार्य किया है। वे बारह महीने के लिए इराक में भी तैनात रह चुकी हैं। वह वर्ष 2013 से लगातार अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक सांसद हैं।

तुलसी के भारतीय मूल के होने के कयास लगाए जाते रहे हैं, लेकिन वह अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय हैं। वह नरेंद्र मोदी की बड़ी समर्थक हैं। वर्ष 2014 में उन्होंने खुले तौर पर कई मंचों से मोदी का समर्थन किया। उन्हें अपनी एक गीता भी भेंट की। उन्होंने वर्ष 2002 में नरेंद्र मोदी को अमेरिका का वीजा न दिए जाने का विरोध किया था। साथ ही भारतीय देवयानी खोबरागड़ की गिरफ्तारी का भी मुखर विरोध किया। यहां तक कि उड़ी हमलों के बाद अमेरिकी संसद में पाकिस्तान के साथ संंबंधों पर पुनर्विचार करने पर जोर दिया था।

हिंदू मान्यताओं से गहरी जुड़ी तुलसी पूर्णत: शाकाहारी हैं। वह चैतन्य महाप्रभु के आध्यात्मिक आंदोलन गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय का अनुकरण करती हैं। यहां तक कि उनके भाई-बहन भी हिंदू हैं, जिनके नाम भक्ति, जय, नारायण और वृदांवन हैं। उनका मानना है कि श्रीमद्भगवद्गीता उनका आध्यात्मिक मार्गदर्शन करती है। वह कर्मयोग में गहरी आस्था रखती हैं। तुलसी भारत आने को लेकर उत्साहित हैं और खासकर वृंदावन जाना चाहती है। तुलसी ने वर्ष 2015 में अब्राहम विलियम से वैदिक रीति-रिवाज से विवाह किया था। अमेरिका के समाओ द्वीप समूह के लेलोआ लोआ में एक संभ्रांत राजनीतिक परिवार में 12 अप्रैल, 1981 में जन्मी तुलसी गेबार्ड के पिता माइक गेबार्ड हवाई द्वीप समूह की राजनीति में अपनी खास पहचान रखते हैं। कालांतर तुलसी की मां कैरोल पोर्टर ने हिंदू धर्म अपना लिया। जब तुलसी एक साल की थीं तो उनका परिवार अमेरिका आकर बस गया।

तुलसी की परवरिश मिले-जुले धार्मिक परिवेश में हुई क्योंकि जहां पिता कैथोलिक धर्म के अनुयायी थे, वहीं माता हिंदू धर्म को मानने वाली। लेकिन उनके पिता ने हिंदू पूजा-पद्धति का विरोध नहीं किया। तुलसी ने किशोर अवस्था में हिंदू धर्म स्वीकार कर लिया। तुलसी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने घर पर ही की। कालांतर वर्ष 2009 में उन्होंने हवाई पैसिफिक यूनिवर्सिटी से बिजनेस प्रबंधन में स्नातक की डिग्री हासिल की। बाद में 16 साल तक सेना में सेवाएं दी। वर्ष 2006 में अशांत इराक में तैनात रहीं।

विदेशों में कई भारतीय महिलाओं का जलवा

अमेरिका, इंग्लैंड सहित कई ऐसे देश हैं जहां की राजनीति या सेना में भारतीय महिलाएं छाई हुई हैं। तुलसी 6 नवंबर, 2012 में अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के लिए डेमोक्रेट सांसद के रूप में चुनी गईं। वे अपने इलाके में रिकॉर्ड मतों से जीतती रही हैं। तुलसी भारत के साथ मजबूत अमेरिकी संबंधों की पक्षधर रही हैं। लेकिन आजकल राष्ट्रपति चुनाव में उनकी दावेदारी के खिलाफ अमेरिका में अभियान चलाया जा रहा है। उन्हें हिंदू राष्ट्रवादी बताया जा रहा है, लेकिन वे बेबाक होकर इसका विरोध कर रही हैं। उन्होंने कहा कि गैर-हिंदू नेताओं से कुछ न पूछना और अमेरिका के लिए उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाना दोहरे मापदंडों का परिचायक है। उन्होंने उनके समर्थकों व दानदाताओं के खिलाफ अभियान चलाने की आलोचना की। वह कहती हैं अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए पहली हिंदू अमेरिकी दावेदार होने पर मुझे गर्व है। गौरतलब है कि भारत में महिलाओं के लिए संसद से लेकर शासकीय कार्यालयों तक में आरक्षण की व्यवस्था है, लेकिन न तो सरकारें और न ही प्रशासन महिलाओं के उत्थान के प्रति जागरूक है। इसका परिणाम यह होता है कि भारत में सशक्त होने के बाद भी महिलाएं उच्च स्थान पाने में असफल रहती हैं। जबकि इसी मिट्टी में जन्मीं कोई भारतीय महिला विदेश जाती है तो वहां अपनी योग्यता और साहस से अपनी सफलता के झंडे गाड़ देती है।

- ज्योत्सना अनूप यादव

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