अग्निपथ पर देश
05-Apr-2021 12:00 AM 3684

 

पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल में सत्ता किसके हाथ लगेगी यह 2 मई को ही स्पष्ट होगा, लेकिन कोरोना महामारी के बीच हो रहे चुनाव राजनीतिक पार्टियों के साथ ही जनता के लिए भी अग्निपथ से कम नहीं हैं। एक तरफ जहां देशभर में कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक रूप ले चुकी है, वहीं दूसरी तरफ चुनावी राज्यों में कोरोना गाइडलाइन पूरी तरह दरकिनार है। लोग सवाल करने लगे हैं कि क्या कोरोना चुनावी नारों से डर रहा है?

चुनाव गणित का खेल है मगर इसमें 'केमिस्ट्रीÓ गणित पर हावी हो जाती है। इसका ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल में हो रहे विधानसभा चुनाव में देखा जा सकता है। चुनावी गणित के अनुसार इन पांचों राज्यों में चुनाव के दौरान बेतहाशा भीड़ उमड़ रही है, जो कोविड-19 की गाइडलाइन का उल्लंघन है। लेकिन चुनावी केमिस्ट्री उस गणित पर हावी है। यानी कोरोना महामारी के बावजूद यहां चुनाव कराया जा रहा है। एक तरफ पूरे देश में लोगों से कोविड-19 की गाइडलाइन का पालन कराया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ चुनावी राज्यों में गाइडलाइन पूरी तरह दरकिनार है। ऐसे में पूरा देश अग्निपथ बना हुआ है। इस अग्निपथ पर चलकर देश कितना सुरक्षित रहेगा यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन इसके संकेत अच्छे नहीं हैं। आज भारत कोरोना संक्रमण के मामले में विश्व में तीसरे नंबर पर आ गया है। फिर भी देश अग्निपथ पर चल रहा है।

दरअसल, चुनावी गणित में केमिस्ट्री का प्रयोग आधुनिक भारत के निर्विवाद 'चुनाव गुरुÓ नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने भरपूर किया है। पिछले 7 वर्षों से इधर-उधर मिले एक-दो झटकों को छोड़ चुनावों में भाजपा का पलड़ा जिस तरह भारी रहा है उसके चलते यह एक तरह से स्वयंसिद्ध सत्य बन गया है। मोदी और शाह का कहना यह है कि कुछ सामाजिक या जातीय समूहों और उनके संख्याबल पर विपक्ष की निर्भरता बेमानी है। काम तो करती है भाजपा (यानी मोदी) और मतदाताओं के बीच की 'केमिस्ट्रीÓ, जो जनहित योजनाओं, व्यक्तिपूजा आदि से बनती है और जातीय समीकरणों से ऊपर होती है। आज अपनी इसी केमिस्ट्री के दम पर भाजपा ने पश्चिम बंगाल में टीएमसी के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। जो भी हो, अमित शाह आज जबकि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए बारूदी सुरंगें बिछाने में व्यस्त हैं, उन्हें असम में अपनी कमजोरियों का जरूर एहसास होगा। दोनों राज्यों में पहले फेज की वोटिंग में रिकार्ड मतदान ने पार्टियों को असमंजस में डाल दिया है। जहां पश्चिम बंगाल में 80 फीसदी मतदान हुआ है, वहीं असम में 72 फीसदी।

बंगाल पर सबका फोकस

2021 विधानसभा चुनाव असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल में भी हो रहे हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि चुनाव केवल बंगाल में ही हो रहे हैं। इसकी खास वजह यह है कि भाजपा ने अपनी सारी ताकत बंगाल में झोंक दी है। इसी के चलते बंगाल की चुनावी लड़ाई दिलचस्प और कांटेदार हो चुकी है। बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परेड ग्राउंड में चुनावी रैली के बाद बंगाल में चुनाव प्रचार ने और तेजी पकड़ी है। भाजपा ने बंगाल में कई कद्दावर नेताओं से लेकर केंद्रीय मंत्रियों को ममता के खिलाफ उतारकर मुकाबले को कांटे का बना दिया है। भाजपा समेत तृणमूल, कांग्रेस, लेफ्ट और आईएसएफ गठबंधन ने भी अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। लेकिन सबसे दिलचस्प मुकाबला नंदीग्राम में होने जा रहा है। नंदीग्राम से तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए शुभेंदु अधिकारी को टिकट दिया गया है। खास बात यह है कि ममता अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर को छोड़कर नंदीग्राम से चुनाव लड़ने जा रही हैं। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों और मीडिया की निगाहें नंदीग्राम सीट पर टिक गई हैं। वास्तव में नंदीग्राम ने ही ममता बनर्जी को बंगाल की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंचाया था। इस वजह से यह उनके लिए काफी भाग्यशाली रहा है। लेकिन नंदीग्राम के जरिए ममता को सत्ता दिलाने में अधिकारी की अहम भूमिका थी।

वहीं बॉलीवुड स्टार मिथुन चक्रवर्ती के भाजपा में आने से पार्टी को मजबूती मिलना तय माना जा रहा है। भाजपा ने उन्हें क्या सोचकर अपनी नाव में सवार किया ये तो उसके रणनीतिकार ही जानते होंगे, लेकिन उनको प्रधानमंत्री के साथ मंच देकर पार्टी ने ये संकेत तो दे ही दिया कि उनमें उसे तुरुप का इक्का दिखाई दे रहा है। बंगाल की सियासत और समाज दोनों पर फिल्मों व साहित्य का जबर्दस्त असर रहा है, शायद इसलिए भाजपा ने मिथुन दादा को अपने साथ जोड़ा है। पूरी तस्वीर देखें तो अब मुकाबला त्रिकोणीय होता दिख रहा है। तृणमूल, भाजपा और लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन के बीच। ऐसा नहीं कि लेफ्ट और कांग्रेस बंगाल में पहली बार साथ आए हों। इससे पहले 2016 का विधानसभा चुनाव भी दोनों पार्टियों ने साथ मिलकर लड़ा था। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में वो अलग हो गए थे। अब 2021 के विधानसभा चुनाव में वो एक बार फिर से साथ आ रहे हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि ममता सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही हैं। अगर उनके साथ मिलकर गठबंधन करते तो शायद कांग्रेस और लेफ्ट का राजनीतिक अस्तित्व खत्म हो जाता। यही वजह है कि दोनों पार्टियों ने तृणमूल को चुनौती देने के लिए एक होना सही समझा। वैसे लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन के लिए भाजपा सबसे बड़ी चुनौती है। फिलहाल गठबंधन दोनों पार्टियों से ही समान दूरी बनाकर चलने की रणनीति पर काम कर रहा है। लेकिन उनकी इस रणनीति से तृणमूल को नुकसान होगा या फिर भाजपा को ये अभी कह पाना मुश्किल है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा का हिंदू वोट है और कांग्रेस का भी है। उसी तरह से तृणमूल के पास भी मुस्लिम वोट हैं तो लेफ्ट के पास भी मुस्लिम वोटर हैं। ये गठबंधन दूसरी पार्टी के वोट काटेंगे या फिर अपने अस्तित्व को बचाने में कामयाब हो पाएंगे? ये बड़ा सवाल है। बंगाल में भाजपा की बढ़त ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।

चुनाव कई मायनों में अलग

इस बार बंगाल के विधानसभा चुनाव पिछले चुनावों से कई मायनों में अलग हैं। अलग इसलिए, क्योंकि इस चुनाव में सत्ताधारी दल के सामने एक ऐसा दल चुनौती बनकर उभरा है, जिसे 2016 के चुनाव में सिर्फ 10.3 फीसदी वोट और केवल 3 सीटों पर जीत मिली थी। इसके ठीक 3 साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को 18 सीटों पर जीत मिली। बंगाल के लिहाज से यह चुनाव इसलिए भी अहम है, क्योंकि 2016 के जनादेश में वाम-कांग्रेस गठबंधन प्रमुख विपक्षी दल के रूप में थे, जो इस बार के चुनाव में भी असरहीन नजर आ रहे हैं। भाजपा की बड़ी कामयाबी यह है कि उसने बहुत कम समय में प्रमुख विपक्षी दलों, वाम-कांग्रेस गठजोड़, को हाशिए पर धकेलकर स्वयं को सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के बरक्स प्रभावी विकल्प के तौर पर स्थापित किया है। अब सवाल यह है कि क्या इस चुनाव में बंगाल में बदलाव का विकल्प बनने की भाजपा की कोशिश सफल होगी? पिछले दो-तीन वर्षों में यहां की राजनीति में हुए बदलावों तथा इस चुनाव में भाजपा के लिए जीत की संभावनाओं का आधार समझने के लिए कुछ तथ्यों पर गौर करना होगा। चुनावी राजनीति के इतिहास का विश्लेषण करने पर बंगाल में सत्ता परिवर्तन का एक पैटर्न नजर आएगा। इसका मूल यह है कि वहां के मतदाताओं के मन में बदलाव की अकुलाहट होना पर्याप्त नहीं होती। विकल्प का आत्मविश्वास पैदा होना भी जरूरी कारक है।

विपक्ष का मजबूत गणित

मोदी-शाह का 'केमिस्ट्री बनाम गणितÓ वाला जो चुनावी सिद्धांत है उसकी कड़ी परीक्षा पश्चिम बंगाल के साथ ही उत्तर-पूर्वी राज्य असम में होने जा रही है। इस परीक्षा को व्यापक, राष्ट्रीय संदर्भ इस तथ्य से मिलता है कि भाजपा अपने सहयोगियों का जिस तरह इस्तेमाल करके खारिज करती रही है उसके कारण असम में विपक्ष का गणित मजबूत हुआ है। असम में राजनीतिक समीकरण के उलटफेर के कारण बोडोलैंड पीपुल्स फं्रट (बीपीएफ) कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में वापस शामिल हो गया है, जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के विधानसभा चुनाव में उसने कांग्रेस से अलग होकर भाजपा से हाथ मिला लिया था। इसकी जगह, बीपीएफ की प्रतिद्वंद्वी यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल), जो 2016 में कांग्रेस के साथ थी, अब भाजपा के साथ हो गई है। बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट (एआईयूडीएफ) भी कांग्रेस के नेतृत्व वाले उस गठबंधन के साथ है, जिसमें 3 वाम दल और 4 छोटी पार्टियां शामिल हैं। जैसी कि स्थिति है, एनडीए के सहयोगियों, भाजपा, बीपीएफ, और असम गण परिषद ने मिलकर 41.59 प्रतिशत वोट बटोरे थे, अब कांग्रेस की साथ आ गई बीपीएफ ने तब 3.94 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। 2016 में वोटों के बंटवारे में बीपीएफ के वोटों को अगर एनडीए के वोटों में से घटा दिया जाए तो 2016 में उसका वोट 38 प्रतिशत रह जाता है। यूपीए के जो आज घटक हैं (कांग्रेस, एआईयूडीएफ, बीपीएफ, वाम दल और अन्य) उन्होंने 2016 में 49 फीसदी वोट हासिल किए। इस तरह दोनों बड़े गठबंधनों के वोटों में 11 प्रतिशत का अंतर भाजपा की नींद जरूर खराब कर रहा होगा। उधर, कांग्रेस का परचम लहराने के लिए राहुल गांधी के साथ ही प्रियंका गांधी ने भी मोर्चा संभाला है। खासकर प्रियंका गांधी के कारण वहां कांग्रेस में अजब का उत्साह दिख रहा है। वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी टीम के साथ मोर्चे पर डटे हुए हैं।

जनहित योजनाओं के जरिए एनडीए की केमिस्ट्री

भाजपा के नेता कांग्रेस पर एआईयूडीएफ के बदरुद्दीन अजमल से हाथ मिलाने के लिए हमले करके मतदाताओं को हिंदू-मुस्लिम आधार पर ध्रुवीकृत करने की कोशिश में जुटे होंगे, मगर लोगों को भाजपा सरकार की जनहित वाली योजनाएं आकर्षित कर रही हैं। असम के कई जिलों में लोगों से यही उजागर हुआ कि लोग सर्बानंद सोनोवाल की सरकार से संतुष्ट हैं। 'ओरुणोदोईÓ योजना (जिसके तहत हर चुनाव क्षेत्र में 15 से 17 हजार के बीच महिलाओं को हर महीने बैंक खाते में सीधे 830 रुपए जमा हो रहे हैं) से लेकर छात्राओं के लिए स्कूटर और साइकिल देने के अलावा समाज के विभिन्न वर्गों के लिए तमाम तरह की योजनाओं की बहार है। इन सबके ऊपर से केंद्रीय योजनाएं भी हैं।

असम में कड़ी टक्कर के दांव

इस बार विधानसभा चुनावों में एक पार्टी छोड़कर बिल्कुल विपरीत विचारधारा वाली दूसरी पार्टी में जाने वाले नेताओं की कतार लगी हुई है। लेकिन असम के गोलाघाट विधानसभा क्षेत्र में एक अनोखी बात हुई है। इस सीट पर विधायक अजंता नियोग भाजपा की उम्मीदवार हैं। उनके सामने चिर प्रतिद्वंद्वी बिटोपन सैकिया हैं, जिन्हें कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है। मजे की बात यह है कि 2016 के चुनाव में नियोग कांग्रेस की प्रत्याशी थीं और सैकिया भाजपा से लड़े थे। नियोग कुछ ही दिनों पहले भाजपा में चली गईं। नाराज सैकिया कांग्रेस में चले गए और अब उसके टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं। गोलाघाट की यह घटना बताती है कि इस बार असम विधानसभा चुनावों में किस तरह राजनीतिक उलटफेर हो रहे हैं। भाजपा जीतने योग्य नेताओं को आकर्षित करने का प्रयास कर रही है तो विपक्षी दल उन नेताओं पर दांव आजमा रहे हैं, जिन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला। असम पारंपरिक रूप से कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है, लेकिन पिछले चुनावों में यहां भाजपा को जीत हासिल हुई थी। 5 साल बाद भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती है। भले ही वह इसे स्वीकार न करे। कांग्रेस के नेतृत्व वाले 8 दलों के गठबंधन, जिसमें ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट भी शामिल है, को लगता है कि 2 मई को आने वाले नतीजों में उसे बहुमत मिल सकता है।

प्रदेश की सर्बानंद सोनोवाल सरकार के पीछे असली ताकत कहे जाने वाले मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि असम गण परिषद और यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के साथ मिलकर भाजपा को 100 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। सरमा का गणित शायद ही कभी गलत होता हो, तब भी जब वे 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश की कांग्रेस सरकार में मंत्री थे। इसलिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने सरमा में एक बार फिर से भरोसा जताया है। इसी कड़ी में उसने पुराने साथी बोडो पीपुल्स फं्रट को छोड़कर यूपीपीएल को नया साथी बनाया है।

भाजपा ने अभी तक सोनोवाल को अगले मुख्यमंत्री के तौर पर स्पष्ट रूप से पेश नहीं किया है। पार्टी प्रवक्ता रितु बरन सरमा कहते हैं, जब हमारे पास एक मुख्यमंत्री है तो मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम की घोषणा की जरूरत नहीं रह जाती है। उनका यह बयान जवाब से कहीं ज्यादा सवाल खड़े करता है। एक सवाल सीधे हेमंत बिस्वा सरमा से जुड़ा है। पहले कई मौकों पर चुनाव नहीं लड़ने की बात वे कह चुके हैं। फिर भी भाजपा ने जुलुकबाड़ी सीट से 52 साल के सरमा को उम्मीदवार बनाया है। उनकी मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश किसी से छिपी नहीं है। उनके कांग्रेस छोड़ने की बड़ी वजह यही थी। तब पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई अपने बेटे गौरव गोगोई को उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने लगे थे।

सरमा समर्थकों को उनके मुख्यमंत्री बनने की ख्वाहिश में कुछ भी गलत नहीं लगता। प्रदेश में अनेक लोगों को लगता है कि विपक्ष का मुकाबला करने और उनके किले ध्वस्त करने में मुख्य भूमिका सरमा की ही है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के बाद 2020 की शुरुआत में असम में भाजपा के खिलाफ माहौल बनने लगा था। अनेक जगह विरोध प्रदर्शन और हिंसा भी हुई। तब भाजपा विरोधी माहौल को बदलने में सरमा ने ही मुख्य भूमिका निभाई। रितु बरन कहते हैं, यह चुनाव इस बात को लेकर लड़ा जाएगा कि हमने राज्य के लिए क्या किया है। सीएए ठंडे बस्ते में चला गया है। अब यह कोई मुद्दा नहीं है।

तमिलनाडु में बीज बोने की कोशिश

कई साल पहले तक तमिलनाडु में भाजपा का निकटतम प्रतिद्वंद्वी नोटा हुआ करता था। 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 3 फीसदी वोट मिले थे और तब भाजपा पहचान के संकट से गुजर रही थी। आज वही भाजपा शशिकला फैक्टर की वजह से उत्पन्न हुए संकट को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। पहले तो उसने ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक (एआईएडीएमके) के दोनों धड़ों के बीच दूरी पाटने की कोशिश की। जब वह संभव न हो सका तो पार्टी ने वह कर दिखाया जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी। भाजपा ने शशिकला को राजनीतिक परिदृश्य से हटने के लिए राजी कर लिया, इस संदेश के साथ कि एआईएडीएमके के सभी कार्यकर्ता डीएमके को हराने के लिए मिलकर लड़ेंगे। यह मास्टरस्ट्रोक तमिलनाडु में भाजपा के बढ़ते राजनीतिक कद को भी दिखाता है। विधानसभा में 234 सीटें हैं और पार्टी 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। अगर वह कुछ प्रत्याशियों को जिताने में कामयाब रही तो दो राजनीतिक ध्रुवों वाले प्रदेश में उसका महत्व और बढ़ जाएगा। देखा जाए तो पड़ोसी राज्य केरल की तुलना में तमिलनाडु में भाजपा का चुनावी रिकॉर्ड बेहतर रहा है। 1988, 1989 और 2014 में उसने गठबंधन में चुनाव लड़ा और उसके सांसद चुने गए थे। डीएमके की अगुवाई में 2001 के विधानसभा चुनाव में इसके कुछ विधायक भी चुने गए। उसके बाद डीएमके ने 2004 में कांग्रेस से हाथ मिला लिया। उसके बाद भी लोकसभा चुनावों में भाजपा को सहयोगी मिले। 2004 में उसने एआईएडीएमके के साथ चुनाव लड़ा। 2014 में पीएमके, डीएमडीके और एमडीएमके जैसी छोटी पार्टियों के साथ मिलकर यह चुनावी मैदान में उतरी। लेकिन विधानसभा चुनाव में उसे कोई सफलता नहीं मिली। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता हकीकत को स्वीकार करते हुए कहते हैं कि हमारी मौजूदगी से विधानसभा चुनावों में हमारे सहयोगी दलों को अतिरिक्त वोट नहीं मिले। जब जयललिता थीं तब भाजपा समर्थक भी उनकी एआईएडीएमके को वोट देते थे ताकि डीएमके को हराया जा सके। जयललिता की मौत के बाद 2017 में भाजपा ने जिस तरह ईके पलानीस्वामी और ओ पन्नीरसेल्वम के बीच समझौता करा एआईएडीएमके सरकार को स्थिरता दी, उसने प्रदेश की राजनीतिक दिशा तय करने में केसरिया पार्टी की भूमिका बढ़ा दी। हालांकि इस समीकरण का 2019 के लोकसभा चुनाव में कोई फल नहीं दिखा। इसके बावजूद पार्टी ने प्रदेश में अपना आधार मजबूत करने का सिलसिला जारी रखा। उसने दलित को प्रदेश का अध्यक्ष बनाया और फिर दूसरे दलों के जाने-माने चेहरों को शामिल करने लगी। उनमें फिल्म सेलेब्रिटी से लेकर मजबूत आधार वाले नेता भी थे। अब यहां स्थिति बदल गई है। भाजपा अपना आधार मजबूत कर रही है। इसमें उसको कितनी सफलता मिलती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

उधर, अब देखना यह है कि चुनावी अग्निपथ पर चल रहे इस देश में कोरोना महामारी का यह दौर क्या गुल खिलाता है। देश में कोरोना का संक्रमण गत वर्ष की अपेक्षा दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। इस रफ्तार के बीच चुनावी राज्यों में लोगों की भीड़ उमड़ रही है। इन राज्यों में मतदान के बाद यहां के लोग अन्य राज्यों में जाएंगे। इससे कोरोना का संक्रमण और बढ़ने का डर बना हुआ है। 

 बंगाल में नए रंग और मोड़

भयंकर खेला होबे, एई माटी ते खेला होबे (भयंकर खेल होगा, इसी मिट्टी में खेल होगा)। हाल की एक रैली में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता के इस बयान के बाद भाजपा के प्रवक्ता शमिक भट्टाचार्य का जवाब था कि जो भयंकर खेल की चेतावनी दे रहे हैं, उन्हें चुनाव के बाद अपने ड्राइंग रूम में बैठकर लुडो खेलने का ढेर सारा समय मिलेगा। ये आरोप-प्रत्यारोप साफ संकेत हैं कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में जो गरमी ऊपर यानी बड़े नेताओं से नीचे कार्यकर्ताओं तक उतर रही है, उसमें कितनी आंच है। यह आंच कई रूपों में प्रकट हो रही है, जिसके अक्स नारों, तुकबंदियों, गीतों के जरिए हर जुबान पर खिलने लगे हैं। यूं तो हर कहीं, हर बार चुनाव नए रंग और लय के दर्शन कराते हैं, लेकिन बंगाल में नारों, तुकबंदियों, दीवाल लेखन के रंग तो लाजवाब हैं। इन चुनावों में तृणमूल कांग्रेस की युवा शाखा के महासचिव देबांग्शु भट्टाचार्य ने कविगुरु रवींद्रनाथ टैगोर के गीत 'मोदेर जेमोन खेला, तेमनी जे काजÓ (हमारा जैसा खेल, वैसा ही काम) की तर्ज पर 'खेला होबेÓ गीत बनाया, जो अब इन चुनावों का सबसे चमकदार नारा बन गया है। जवाब में भाजपा ने 'खेलार माठे लड़ाई होबेÓ (खेल के मैदान में लड़ाई होगी) और 'पीशी जाओÓ (बुआ जाओ) की तुकबंदी आगे बढ़ाई। उधर, वाम मोर्चे तथा माकपा ने 'टुम्पा, तोके निए ब्रिगेड जाबोÓ (टुम्पा, तुझे लेकर ब्रिगेड जाऊंगा) और 'लाल फेराओ, हाल फेराओÓ (लाल लौटाओ, स्थिरता लाओ)। जाहिर है, इन नारों या तुकबंदियों में कौन सबसे अधिक जुबान पर चढ़ता है, शायद उससे भी संकेत मिलता है कि हवा का रुख क्या है। हवा का यह रुख किधर जोरदार है या आगे होता जाएगा, यह तो 2 मई को नतीजे के दिन पता चलेगा लेकिन अभी तक रिकार्ड मतदान ने सभी को असमंजस में डाल दिया है। इस कारण चुनावी पैंतरेबाजी और तेज हो गई है।

पुडुचेरी में भाजपा का रिहर्सल

तमिलनाडु की राजनीति का उसके पड़ोसी, छोटे से केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में बहुत कम असर होता है। 20 लाख मतदाताओं वाले इस पूर्व फ्रांसीसी उपनिवेश में कांग्रेस या उससे निकली एनआर कांग्रेस का दबदबा रहा है। इससे अधिक मतदाता तो तमिलनाडु के कई नगर निगमों में हैं। यहां भाजपा की पहली राजनीतिक चाल किरण बेदी को लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त करना था, जिनकी कांग्रेस मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी के साथ लगातार लड़ाई चली। आखिरकार कुछ दिनों पहले भाजपा ने आखिरी प्रहार किया। कांग्रेस के कई विधायकों के इस्तीफा देने के बाद नारायणसामी सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और यहां राष्ट्रपति शासन लगाया गया। भाजपा को उम्मीद थी कि पूर्व पीडब्लूडी मंत्री ई. नामसिवयम को वह मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश कर सकती है। लेकिन उसे यह उम्मीद नहीं थी कि उसकी सहयोगी एनआर कांग्रेस इसका विरोध करेगी। एनआर कांग्रेस के प्रमुख एन. रंगास्वामी दो बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। जब रंगास्वामी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया तब जाकर भाजपा ने सुर बदला, और वह उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाने पर राजी हुई। कांग्रेस के कमजोर पड़ने और रंगास्वामी की लोकप्रियता को देखते हुए भाजपा को लगता है कि यहां एनडीए की सरकार बन जाएगी। भाजपा पहली बार सरकार का हिस्सा बनेगी। हालांकि यहां अपना मुख्यमंत्री बनाने के लिए उसे अभी इंतजार करना पड़ेगा। तमिलनाडु के एक भाजपा नेता कहते हैं कि तमिलनाडु में बड़ा कदम रखने से पहले पुडुचेरी हमारे लिए रिहर्सल की तरह हो सकता है।

चुनावी राज्यों में कोरोना पर केंद्र सरकार की चुप्पी क्यों?

कोरोना संक्रमण के मामलों में भारत दुनिया में तीसरे नंबर पर आ गया है। ये एक बड़े खतरे की ओर इशारा है। ब्राजील और अमेरिका के बाद भारत वर्तमान में तीसरे नंबर पर है। अमेरिका में कोरोना के 3 करोड़ मामले हो चुके हैं और साढ़े 5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। जबकि ब्राजील में 1 करोड़ 20 लाख संक्रमण के मामले अब तक सामने आए हैं और 2 लाख 93 हजार मौतें हुई हैं। भारत में 1 करोड़ 16 लाख संक्रमण के मामले आए हैं और 1 लाख 60 हजार मौतें हुई हैं। चिंता की बात यह है कि चुनाव वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल से कोरोना मामलों का लगातार ताजा अपडेट नहीं मिल रहा है। हाल में आई खबरों में कहा गया था कि पश्चिम बंगाल में कोरोना तेजी से पांव पसार रहा है। जिसमें 500 से अधिक कोरोना के नए मामले आने की बात कही गई थी। ममता सरकार पर कोरोना के मामले छिपाने का आरोप भी लगता रहा है। बावजूद इसके इस चुनावी राज्य में कोरोना को लेकर संवेदनशील तरीके से नहीं निपटा जा रहा है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल लोगों की ट्रेसिंग जांच की व्यवस्था भी कारगर ढंग से नहीं हो रही है और केंद्र सरकार के निर्देशों पर भी अमल नहीं किया जा रहा है। ममता सरकार की यह लापरवाही अन्य राज्यों में कोरोना फैलने का कारण भी बन सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही चिंता का इजहार करते हुए कह चुके हैं कि अगर गांवों में कोरोना फैलता है तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। केरल में कोरोना 1239 ताजा मामले सामने आए हैं। राज्य के कई जिलों जैसे कन्नूर, कोझिकोड, कोल्लम, एरनाकुलम और वायनाड में सबसे अधिक मामले सामने आए हैं। चुनाव के दौरान लोगों को संक्रमण फैलने से बचाना राज्य सरकार की बड़ी चुनौती होगी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 5 राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान मास्क न पहनने वाले उम्मीदवारों और नेताओं को लेकर सुनवाई की। कोर्ट ने इन नेताओं को चुनाव-प्रचार से प्रतिबंधित करने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी किया है। याचिका विक्रम सिंह ने दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से वकील विराग गुप्ता ने कहा कि 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान कोरोना के दिशा-निर्देशों पर अमल नहीं किया जा रहा है। सुनवाई के दौरान निर्वाचन आयोग ने नोटिस जारी करने का विरोध किया है। निर्वाचन आयोग की ओर से वकील पंकज चोपड़ा ने कहा कि दिल्ली में चुनाव नहीं हो रहे हैं। मास्क संबंधी दिशा-निर्देश जारी करना राज्यों के जिला स्तर के अधिकारियों का काम है। सिर्फ चुनाव आयोग का दफ्तर दिल्ली में होने की वजह से दिल्ली हाईकोर्ट को इस याचिका पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए।

ममता बनर्जी की कोर वोटर पर मोदी का फोकस

65 वर्षीय गीता पाल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के गृह क्षेत्र दक्षिण कोलकाता, जिसे छोड़कर वह इस विधानसभा चुनाव में पूर्वी मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम से मैदान में उतरी हैं, के भवानीपुर (पहले भोवानीपोरा कहा जाता था) में रहती हैं। गीता कुम्हार जाति की है और गणेशजी-लक्ष्मीजी की मूर्तियां बनाया करती थीं। हालांकि, बढ़ती उम्र के साथ आई बीमारियों के कारण उसका काम धीमा पड़ गया है। लेकिन उसे अब तक स्वास्थ्य साथी कार्ड नहीं मिला है जिसे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 2016 में लॉन्च किया था। इसकी वजह से ही बंगाल ने नरेंद्र मोदी सरकार की आयुष्मान भारत बीमा योजना को लागू नहीं किया है। वह दावा करती है कि 'दीदीÓ की तरफ से 10 साल के शासनकाल के दौरान महिलाओं के लिए घोषित की गई तमाम योजनाओं का उसे कोई लाभ नहीं मिला है। गीता की ही रिश्तेदार सोनिका पाल ने बताया कि राज्य सरकार की एक योजना के तहत आवास अनुदान के लिए उसने कागजात जमा किए थे लेकिन अभी तक कुछ नहीं मिला है। भवानीपुर में ही रहने वाली सुनीता पाल ने कहा कि वादे के तहत 10 किलो राशन की जगह उसे 5 किलो राशन ही मिल रहा है। भवानीपुर बाजार में मछली बेचने वाली 45 वर्षीय संगीता कहती हैं, '35 साल हमने वामपंथियों को देखा। हमने ममता के 10 साल का शासन देखा। मोदी को 5 साल देने में बुरा क्या है? लॉकडाउन के दौरान मैं राशन कार्ड के लिए एक से दूसरे कार्यालय भटकती रही लेकिन मुझे यह नहीं मिला।Ó

- राजेंद्र आगाल

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