08-Jan-2022 12:00 AM
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मप्र के पंचायत चुनाव के लिए 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर शह-मात का ऐसा खेल खेला गया जो पहले कभी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में भी देखने को नहीं मिला। पार्टियों के दफ्तर से लेकर वकीलों के घर, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रालय, विधानसभा, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक दांवपेंच चलता रहा, लेकिन लगभग 7 वर्षों के बाद प्रदेश में होने जा रहे त्रिस्तरीय पंचायती राज के चुनाव आखिर निरस्त हो ही गए। अब ये चुनाव कब होंगे, इस पर असमंजस बरकरार है।
मप्र में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भले ही गैरदलीय आधार पर होते हैं, लेकिन इस बार घोषित फिर निरस्त किए गए चुनाव में राजनीति चरम पर दिखी। पंचायत चुनाव में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को लेकर शह-मात का ऐसा खेल खेला गया जो पहले कभी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में भी देखने को नहीं मिला। पार्टियों के दफ्तर से लेकर वकीलों के घर, मुख्यमंत्री निवास, मंत्रालय, विधानसभा, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक दांवपेंच चलता रहा, लेकिन लगभग 7 वर्षों के बाद प्रदेश में होने जा रहे त्रिस्तरीय पंचायती राज के चुनाव आखिर निरस्त हो ही गए। इन चुनाव में परिसीमन रोटेशन और आरक्षण को लेकर तरह-तरह के दावे-आपत्तियां पेश की गईं। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई हुई। जिस अध्यादेश के तहत यह चुनाव हो रहे थे वह अध्यादेश भी सरकार ने वापस लिया और अंतत: लीगल ओपिनियन लेने के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायती राज के चुनाव निरस्त कर दिए।
अब पंचायत चुनाव कब और कैसे होंगे इसको लेकर सवाल तो खड़े हो रहे हैं, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है। यानी 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण के पेंच में पंचायत चुनाव इस कदर फंस गया है कि इससे निकालने का रास्ता फिलहाल सरकार के पास भी नहीं है। दरअसल प्रदेश में पंचायती राज के चुनाव की घोषणा के साथ ही दावे-आपत्तियों का दौर शुरू हो गया था खासकर परिसीमन रोटेशन और आरक्षण संबंधी मामले इतने ऊलझा दिए गए की बीच में स्थिति यह हो गई थी कि आधे गांव में चुनाव होंगे और आधे गांव में नहीं। खासकर पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर चुनाव नहीं हो रहे थे, जबकि प्रदेश के दोनों ही प्रमुख दल भाजपा और कांग्रेस पिछड़े वर्ग को ना केवल आरक्षण दिए जाने बल्कि एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में दिखाई दिए और इसी के चलते विधानसभा में एक अशासकीय संकल्प पारित किया गया और फिर सरकार ने वह अध्यादेश भी वापस ले लिया जिसके तहत चुनाव हो रहे थे और इसी आधार पर राज्य निर्वाचन आयोग ने विधि विशेषज्ञ से सलाह लेकर आखिरकार पंचायती राज के चुनाव स्थगित कर दिए। इसी के साथ ही गांव-गांव में जहां सन्नाटा पसर गया, आवभगत का अभूतपूर्व दौर निकल गया। वहीं अब राजधानी भोपाल से लेकर दिल्ली तक पंचायती चुनाव को लेकर पंचायतें होती रहेंगी, क्योंकि दोनों ही दल एक-दूसरे को इस परिस्थिति के लिए दोषी ठहराते रहेंगे।
कब होंगे चुनाव?
बहरहाल लंबे अरसे बाद होने जा रहे पंचायती राज के चुनाव निरस्त होने के बाद अब कब हो पाएंगे कहना मुश्किल है। इतना रायता फैल गया है जो आसानी से सिमटने वाला नहीं है, क्योंकि रोटेशन तय करना परिसीमन करने और आरक्षण में इतने कानूनी दांवपेंच आसानी से नहीं सुलझने वाले। इनको सुलझाते-सुलझाते प्रदेश में 2023 के विधानसभा के आम चुनाव आ जाएंगे और फिर 2024 के लोकसभा के चुनाव और उसके बाद ही चुनाव के होने की संभावना बनेगी। फिलहाल पिछले 1 महीने से गांव-गांव में इन चुनावों को लेकर सरगर्मी थी और जहां पर पहले चरण का मतदान 6 जनवरी को था वहां नामांकन पत्र वापस लेने का समय भी निकल गया था और चुनावी रंग जोर पकड़ने लगा था लेकिन अब गांव-गांव में असमंजस की स्थिति बन गई है। राजनीति की नर्सरी हरियाली आने के पहले उजड़ गई। गांव की पंचायतें पंचपरमेश्चर के लिए कब तक इंतजार करेंगी कहा नहीं जा सकता।
सवा 2 लाख की मेहनत बेकार
उल्लेखनीय है कि ओबीसी आरक्षित पदों को छोड़कर जिन अन्य सवा तीन लाख पदों के लिए चुनाव प्रक्रिया जारी रखी थी, वहां पहले और दूसरे चरण के नामांकन पर्चे भरने, नाम वापसी तक की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इन पदों के लिए 2,15,035 लोगों ने चुनाव लड़ने के लिए नामांकन पर्चे भरे थे। इनमें से जिला पंचायत सदस्य के लिए 3541, जनपद पंचायत सदस्य के लिए 14 हजार 814, सरपंच पद के लिए 60 हजार 415 और पंच पद के लिए 1 लाख 36 हजार 265 अभ्यर्थियों ने नाम निर्देशन-पत्र प्रस्तुत किया है। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या में लोगों ने नाम वापसी भी की थी और करीब सवा लाख से ज्यादा प्रत्याशी चुनाव में बचे थे। इनमें से औसत रूप से प्रत्याशियों ने करीब पांच से दस हजार रुपए चुनाव प्रचार व अन्य खर्चों में कर दिया था।
मप्र में पंचायत चुनाव निरस्त होने के बाद अब नामांकन पत्र दाखिल करके चुनाव प्रचार शुरू करने वाले लोगों का गुस्सा भी सामने आने लगा है। रतलाम जिले में एक जनपद प्रत्याशी ने सीएम हेल्पलाइन में आत्महत्या की चेतावनी दे डाली है। वहीं, भाजपा और कांग्रेस के नेताओं के बीच जुबानी जंग जारी है। कांग्रेस ने पंचायत चुनाव को भाजपा का राजनीतिक स्वार्थ करार दिया है तो भाजपा पंचायत चुनाव निरस्त होने पर कांग्रेस को दोषी बता रही है। राज्य निर्वाचन आयोग के पंचायत चुनाव निरस्त कर दिए जाने के बाद 24 दिन चली चुनाव प्रक्रिया पर करोड़ों रुपए का खर्च बेकार साबित हुआ है। वहीं, नामांकन प्रक्रिया, नाम वापसी के बाद जो प्रत्याशी चुनाव मैदान में थे, उन्होंने चुनाव प्रचार सामग्री, दीवार लेखन आदि शुरू कर दिया था। अचानक चुनाव निरस्त होने से उनका हजारों रुपए का खर्च बेकार हो गया है। इससे लोगों की नाराजगी दिखाई दे रही है। हालांकि राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रत्याशियों को नामांकन फार्म के साथ भरी गई राशि वापस करने के आदेश किए हैं लेकिन प्रचार सामग्री और अन्य खर्चों से प्रत्याशियों की नाराजगी बढ़ी है। गौरतलब है कि एक ग्राम पंचायत में तो 44 लाख रुपए में सरपंची की कुर्सी आपसी समझौते में एक प्रत्याशी ने बोली में खरीद भी ली थी।
रतलाम जिले के एक जनपद प्रत्याशी भूपेंद्र सिंह ने सीएम हेल्पलाइन में धमकी दी है। उन्होंने पंचायत चुनाव निरस्त होने से उनके हजारों रुपए खर्च होने की शिकायत दर्ज कराना चाही थी। मगर सीएम हेल्पलाइन से जब उन्हें राज्य निर्वाचन आयोग में शिकायत दर्ज कराने का आग्रह किया गया तो वे नाराज हो गए। उन्होंने चुनाव खर्च के बेकार जाने पर आत्महत्या की चेतावनी दी है। कांग्रेस नेता सैयद जाफर ने मंत्री भूपेंद्र सिंह पर विधानसभा में गलत जानकारी देने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा है कि वे उनके स्तर के नेता नहीं हैं लेकिन इतने बड़े नेता ने विधानसभा में भ्रामक व गलत जानकारी दी कि मेरे और जया ठाकुर द्वारा ओबीसी आरक्षण खत्म करने की मांग अदालत में रखी गई। इस गलत बयानी के लिए उन्हें माफी मांगना चाहिए। वहीं, भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ. हितेष बाजपेयी ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि उसकी वजह से ही पंचायत चुनाव निरस्त हुए हैं जिससे पंचायतों में प्रतिनिधित्व करने वाले लाखों लोगों की उम्मीद पर पानी फेर दिया है।
शुरू से बैकफुट पर सरकार
पंचायत चुनाव पर शिवराज सरकार बैकफुट पर आ गई है। इसकी शुरुआत एक माह पहले हो गई थी, जब शिवराज सरकार ने पूर्ववर्ती कमलनाथ सरकार में हुए परिसीमन को रद्द करने और नए रोटेशन के बिना 2014 के आरक्षण से चुनाव कराने का अध्यादेश जारी किया था। कांग्रेस इसे कोर्ट में चुनौती देगी? सरकार को पता था कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन यह उम्मीद नहीं थी कि सुप्रीम कोर्ट में ओबीसी आरक्षण को लेकर नई मुसीबत खड़ी हो जाएगी। नतीजा, पंचायत चुनाव टालने का निर्णय लेना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने 17 दिसंबर को ओबीसी के लिए रिजर्व सीटों को सामान्य घोषित करने का आदेश दिया था। तब सरकार को फटकार भी लगाई थी। कोर्ट ने कहा था- आग से मत खेलिए। कानून के दायरे में रहकर चुनाव करवाइए। सरकार और भाजपा ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के लिए सीधे तौर पर कांग्रेस पर आरोप लगा दिया था। इसके बाद मामला न्यायालयीन और सरकारी होने के साथ ही राजनीतिक हो गया था। नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने कांग्रेस से राज्यसभा सांसद विवेक तन्खा पर हमला भी किया था। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने के खिलाफ है।
राज्य निर्वाचन आयोग के फैसले के बाद सरकार ने कांग्रेस पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया। भाजपा की तरफ से कहा जाने लगा कि कांग्रेस नहीं चाहती है कि ओबीसी को आरक्षण मिले। कांग्रेस की वजह से ही ओबीसी का हक मारा गया है। इसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि हमने रोटेशन प्रणाली पर सवाल उठाया था। ओबीसी आरक्षण के पक्ष में राज्य सरकार अपना पक्ष सही से नहीं रख पाई है। राज्य निर्वाचन आयोग ने बीते दिनों तीन चरणों में चुनाव कराने का फैसला किया था। पहले और दूसरे चरण के लिए नामांकन भी हो गए थे। इसी बीच, ओबीसी आरक्षण में रोटेशन प्रणाली को लेकर पेंच फंस गया था। कई लोगों ने कोर्ट में याचिका लगाकर चुनाव रद्द करने की मांग की थी। कांग्रेस नेता विवेक तन्खा कोर्ट में पैरवी कर रहे थे। मप्र हाईकोर्ट ने चुनाव पर रोक लगाने से इनकार किए जाने के बाद याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने फिर से याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट जाने को कहा था। हाईकोर्ट ने अर्जेंट हियरिंग (सुनवाई) से इनकार कर दिया था। इसके बाद अगले दिन सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। 17 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को फटकार के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने ओबीसी के लिए रिजर्व सीटों को सामान्य कर दिया। अगले दिन इन सीटों पर चुनाव स्थगित करने का फैसला किया। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी अर्जेंट हियरिंग नहीं होने से सरकार को झटका लगा।
विधानसभा में भी बवाल
विधानसभा का शीतकालीन सत्र 20 दिसंबर से शुरू हुआ। सत्र के दौरान ओबीसी आरक्षण को लेकर हंगामा हुआ। विपक्ष लगातार सरकार से जवाब मांग रहा था। कांग्रेस विधायकों ने कहा कि पंचायत चुनाव को लेकर सरकार कुछ नहीं कर रही है। एक तरफ चुनाव की प्रक्रिया चल रही है। दूसरी ओर कोर्ट में जाने की बात कही जा रही है। नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ ने कहा कि हम चाहते हैं चुनाव को तत्काल रोका जाए। मामला बढ़ता देख शिवराज सिंह चौहान ने सदन में सफाई दी। सदन में शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कांग्रेस की वजह से ओबीसी को आरक्षण का लाभ नहीं मिला है। कांग्रेस सिर्फ दिखावा कर रही है। हमारी सरकार लगातार ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए प्रयास कर रही है। हम चाहते हैं कि बिना ओबीसी आरक्षण के पंचायत चुनाव ना कराए जाएं। सभी सदस्यों ने हाथ उठाकर इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि प्रदेश में ओबीसी आरक्षण के बिना चुनाव को लेकर आक्रोश है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह सदन सर्वसम्मति से संकल्प पारित करके यह ऐतिहासिक फैसला करे कि पंचायत चुनाव ओबीसी आरक्षण के साथ ही हों। इस पर नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ ने कहा कि हम तो यही कह रहे थे कि सदन से संकल्प पारित किया जाए। अगले दिन फिर इसे लेकर सदन में बवाल हुआ तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साफ कर दिया कि अब राज्य में पंचायत चुनाव ओबीसी आरक्षण के बिना नहीं होंगे। वहीं, कांग्रेस ने भी कहा कि ओबीसी को आरक्षण दिलाने के लिए कोर्ट में हम भी सरकार के साथ लड़ाई लड़ेंगे। 3 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर सुनवाई भी है।
अपनों के निशाने पर सरकार
ओबीसी आरक्षण विवाद को लेकर शिवराज सरकार असहज हो गई थी। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने इसे लेकर केंद्रीय राज्यमंत्री प्रहलाद पटेल तक ने इशारों-इशारों में निशाना साधा है। पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने सोशल मीडिया पर लिखा था- बिना ओबीसी आरक्षण के पंचायत चुनाव नहीं होना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने शिवराज सिंह से बात की थी। इसके बाद प्रहलाद पटेल ने कहा कि पिछड़ों को आग में ना झोंकें तो अच्छा होगा। साथ ही, जरूरी कदम नहीं उठाए जाने को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे में शिवराज सरकार की मुश्किलें बढ़ती जा रही थीं। प्रदेश में सबसे ज्यादा ओबीसी की आबादी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद इसी वर्ग से आते हैं। आरक्षण के मुद्दे पर शिवराज सरकार किसी भी कीमत पर इस वर्ग को नाराज नहीं करना चाहता है। अंत में सरकार ने कैबिनेट की बैठक में पंचायत चुनाव को टालने का फैसला किया है। इतना ही नहीं, सरकार ने कैबिनेट के फैसले की फाइल एक घंटे बाद ही राजभवन भेज दी थी। उसके बाद इसकी अधिसूचना जारी हो गई।
चुनौती है ओबीसी आरक्षण
शिवराज सिंह चौहान के लिए ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत बरकरार रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। उनकी सरकार में आरक्षण कम होता है तो नुकसान पार्टी को भी होगा। लिहाजा वे पंचायत चुनाव के आरक्षण के जरिए अपनी साख बचाने में लगे हुए हैं। यद्यपि राज्य निर्वाचन आयोग ने चुनाव प्रक्रिया रोके जाने के बारे में कोई आदेश जारी नहीं किया है। आयोग विधि विशेषज्ञों से सलाह ले रहा है। सरकार द्वारा परिसीमन को बहाल किए जाने का आदेश उस वक्त आया है जब केवल मतदान की प्रक्रिया शेष बची है। ऐसे में चुनाव नहीं भी रूकते तो भी शिवराज सिंह चौहान यह तो कह ही सकते हैं कि उन्होंने चुनाव प्रक्रिया को रोकने का प्रयास तो किया। कांग्रेस कोर्ट नहीं जाती तो आरक्षण बरकरार रहता। पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए जो सीटें आरक्षित की गईं थीं, उन पर अभी चुनाव नहीं हो रहा है। इन सीटों पर चुनाव उसी स्थिति में संभव है जबकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार ओबीसी के लिए आरक्षित सीटें सामान्य वर्ग में बदली जाएं।
उधर, सुप्रीम कोर्ट द्वारा त्रिस्तरीय पंचायत के चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण पर रोक लगाए जाने के मामले में 3 जनवरी को सुनवाई होगी। इस दौरान केंद्र सरकार ने अर्जी दाखिल कर खुद को पक्षकार बनाने की मांग की है। राज्य सरकार द्वारा इस मामले में पुनर्विचार याचिका दायर की गई है, जिस पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया था। उधर, सुप्रीम कोर्ट ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ओबीसी को आरक्षण देने के लिए उनके आबादी के आंकड़े जुटाने का आदेश दिया है। महाराष्ट्र के संदर्भ में दिए गए इस आदेश की वजह से पंचायत चुनाव में ओबीसी के लिए आरक्षित पदों के चुनाव पर रोक लग गई है। आगे भी यदि ओबीसी को आरक्षण का लाभ पंचायत और नगरीय निकाय के चुनाव में देना है तो उसके लिए आबादी का आधार देना होगा। इसमें भी कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक तभी हो सकता है, जब सुप्रीम कोर्ट विशेष अनुमति दे। इसके लिए कोर्ट के समक्ष आंकड़े प्रस्तुत करने होंगे। इसके मद्देनजर सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग विभाग के माध्यम से ओबीसी मतदाताओं की गिनती कराने का काम प्रारंभ किया है। सभी कलेक्टरों को निर्देश दिए गए हैं कि 7 जनवरी तक यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाए और पंचायतवार व वार्डवार जानकारी शासन को भेजी जाए। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में ओबीसी आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाई रोक को बहाल कराने के लिए शिवराज सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की जा चुकी है। इस पर 3 जनवरी को सुनवाई प्रस्तावित है। इसको लेकर मुख्यमंत्री ने दिल्ली में सालिसिटर जनरल तुषार मेहता सहित विधि विशेषज्ञों के साथ बैठक भी की।
जुटाए जा रहे जातिगत आंकड़े
प्रदेश में पंचायत चुनाव में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण पर मचे घमासान के बीच सरकार बीच का रास्ता निकालने की तैयारी में जुटी हुई है। सूत्रों का कहना है कि प्रदेश सरकार फिलहाल ओबीसी को 22 फीसदी आरक्षण देने के मसौदे पर काम कर रही है। इसके लिए प्रदेश में पहली बार ओबीसी मतदाताओं की गिनती कराई जा रही है। इसके लिए सभी कलेक्टरों को 23 दिसंबर को पत्र के माध्यम से आदेशित किया गया है। वहीं दूसरे राज्यों की स्ट्रेटजी पर सरकार की नजर है। यह जानकारी भी जुटाएं कि क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मप्र की तरह अन्य राज्य पुनर्विचार याचिका दायर करने जैसे विकल्पों पर जा रहे हैं या नहीं?
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में स्थानीय चुनावों में 27 प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों के अध्यादेश को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि ट्रिपल टेस्ट का पालन किए बिना आरक्षण के फैसले को स्वीकार नहीं किया जा सकता है। एक अधिकारी ने बताया कि मुख्यमंत्री ने पिछड़ा वर्ग आयोग से कहा है कि वैकल्पिक तौर पर ओबीसी वर्ग की सीट वार गणना करने का रोडमैप भी बनाएं। इधर, ओबीसी को लेकर सरकार की तैयारी 22 प्रतिशत आरक्षण देने की दिख रही है। इसके लिए सांख्यिकी विभाग को आंकड़े जुटाने के निर्देश दिए हैं। वहीं प्रदेश की पंचायतों में ओबीसी वोटर्स की गिनती कराने का आदेश देने के बाद राज्य सरकार अब यह जानकारी जुटा रही है कि प्रदेश की पंचायतों में अनारक्षित सीटों पर पिछले सालों में कितने ओबीसी नेता निर्वाचित हुए हैं। पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग इस जानकारी के माध्यम से प्रदेश की राजनीति में ओबीसी नेताओं के पिछड़ेपन का अध्ययन करना चाहता है। साथ ही ओबीसी वर्ग को दिए जाने वाले आरक्षण को खत्म करने के मामले में कोर्ट में यह जानकारी देने की तैयारी है कि इसी के चलते इस वर्ग के आरक्षण को बढ़ाने का काम सरकार कर रही है।
मप्र पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि मप्र पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग ने अन्य पिछड़ा वर्ग के पिछड़ेपन के स्वरूप, रीति और कारणों के अध्ययन की जानकारी मांगी है जिसके कारण पिछड़ा वर्ग के व्यक्तियों की राजनीतिक हिस्सेदारी में बाधा उत्पन्न होती है। कलेक्टरों से कहा गया है कि जिलों की सभी ग्राम पंचायतों की वार्ड इकाई वार और पंचायत वार अनारक्षित वर्ग के लिए निश्चित सीटों के विरुद्ध चुने गए अन्य पिछड़ा वर्ग के जनप्रतिनिधियों की जानकारी दस दिन में एक्सेल शीट में प्रस्तुत करें। यह जानकारी 7 जनवरी तक मप्र पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के दफ्तर में पहुंचाने के लिए कहा गया है। गौरतलब है कि 17 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट द्वारा ओबीसी आरक्षण खत्म करने का आदेश देने के बाद राज्य सरकार पंचायतों में निवास करने वाले ओबीसी वर्ग के वोटर और उनकी अलग-अलग जातियों की जानकारी मांग चुकी है। इसके लिए पंचायत सचिवों को जल्द जानकारी भेजने के लिए कहा गया है।
इसके पहले नवंबर माह में मप्र पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग के सचिव द्वारा जारी निर्देश में कलेक्टरों से मांगी गई जानकारी में कहा गया था कि प्रदेश में पिछड़े वर्ग की वर्तमान सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक स्थिति का अध्ययन करने तथा इन वर्गों का कल्याण करने के लिए सुझाव और अनुशंसाएं आयोग को देना है। इसलिए शासन की विभिन्न योजनाओं और विभागों की संरचना में ओबीसी वर्ग की भागीदारी का अध्ययन किया जाना है। आयोग ने कलेक्टरों से जिला स्तर पर नियुक्त और वर्तमान में कार्यरत तृतीय, चतुर्थ श्रेणी तथा संविदा-आउटसोर्स और अन्य नियुक्त ओबीसी वर्ग के अधिकारियों व कर्मचारियों की जानकारी भेजी जाए।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम आदेश पर
मप्र में पंचायत चुनाव के भविष्य का फैसला अब सुप्रीम कोर्ट का निर्णय करेगा। राज्य निर्वाचन आयोग ने भी आगामी निर्वाचन प्रक्रिया प्रारंभ करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया है। राज्य निर्वाचन आयोग ने प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत निर्वाचन प्रक्रिया निरस्त करने के आदेश जारी कर दिए हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त बसंत प्रताप सिंह के आदेश से जारी आदेश में साफ किया गया कि क्योंकि मप्र की सरकार ने 26 दिसंबर को मप्र पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज्य संशोधन अध्यादेश 2021 तुरंत प्रभाव से वापस ले लिया है और इसके चलते अब राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचन के लिए किए गए परिसीमन और आरक्षण का स्टेटस गड़बड़ा रहा है, इसीलिए चुनाव निरस्त किए जाते हैं। इसके साथ ही राज्य निर्वाचन आयोग ने साफ कहा कि पंचायतों का कार्यकाल मार्च 2020 में समाप्त हो चुका है और इनकी निर्वाचन प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब हो चुका है। आयोग के संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन हेतु जल्द चुनाव करवाए जाना आवश्यक है और आगामी निर्वाचन प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के द्वारा 17 दिसंबर को दिए गए आदेश के पालन करते हुए यथा शीघ्र प्रारंभ की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अब 3 जनवरी 2022 को सुनवाई है। राज्य सरकार भी ओबीसी आरक्षण को निरस्त किए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के खिलाफ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट से पुनर्विचार करने का आग्रह कर रही है। वहीं केंद्र सरकार भी ओबीसी आरक्षण के मुद्दे चुनाव टालने की बात कह रही है। यानी अब गेंद पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट के पाले में है। सबकी निगाहें 3 जनवरी पर रहेंगी जब सुप्रीम कोर्ट पंचायत चुनाव को लेकर सुनवाई करेगा और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ही अब पंचायत चुनावों पर छाया कोहरा साफ हो पाएगा। गौततलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 15 दिसंबर को महाराष्ट्र में स्थानीय चुनावों में 27 प्रतिशत ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों के अध्यादेश को रद्द कर दिया था।
अब नए सिरे से होगा परिसीमन
सरकार ने कमलनाथ सरकार में हुए परिसीमन को एक बार फिर समाप्त कर दिया है। इसके लिए नया अध्यादेश लागू किया गया है। इसकी अधिसूचना पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने गत दिनों जारी की गई है। अब जिला पंचायत से लेकर ग्राम पंचायत तक का परिसीमन नए सिरे से किया जाएगा। फरवरी के अंत तक परिसीमन का काम पूरा कर लिया जाएगा। पंचायतराज एवं ग्राम स्वराज (द्वितीय संशोधन) अध्यादेश 2021 की अधिसूचना में कहा गया है कि चुनाव की अधिसूचना राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा किसी भी कारण से ऐसे परिसीमन के प्रकाशन की तारीख से 18 माह की अवधि के भीतर जारी नहीं की जाती है, तो प्रकाशित परिसीमन व विभाजन निरस्त माना जाएगा। इससे पहले सरकार ने एक महीने पहले कमलनाथ सरकार के दौरान 2019 को लागू परिसीमन और आरक्षण को समाप्त करने के लिए अध्यादेश लागू किया था, जिसे 26 दिसंबर को वापस ले लिया गया था। कमलनाथ सरकार ने सिंतबर 2019 में प्रदेश में जिले से लेकर ग्राम पंचायतों तक नया परिसीमन कर करीब 1200 नई पंचायतें बनाई थी, जबकि 102 ग्राम पंचायतों को समाप्त कर दिया गया था। इसी तरह, 1950 की सीमा में बदलाव भी किया गया था। शिवराज सरकार ने पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच 22 नंवबर को ऐसी पंचायतों के परिसीमन को निरस्त कर दिया था, जहां बीते एक साल से चुनाव नहीं हुए थे। ऐसी सभी जिला, जनपद या ग्राम पंचायतों में पुरानी व्यवस्था को बहाल कर दिया गया था। यानी 2014 में हुए चुनाव के दौरान थे। सरकार के इस फैसले को कांग्रेस ने कोर्ट में चुनौती दी थी।
निर्वाचन आयोग को लौटाने होंगे अब 20 करोड़ रुपए
प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव भले ही अब निरस्त हो गए हैं, लेकिन अब भी सरकार, राजनीतिक दल और प्रत्याशी इसमें बुरी तरह से उलझे हुए हैं। इसमें सरकार के बाद अगर कोई सर्वाधिक उलझा है तो वह है इन चुनावों में नामाकंन करने वाले ग्रामीण। दरअसल यह चुनाव ऐसे समय निरस्त किए गए हैं जबकि, प्रदेश में चुनाव प्रचार पूरी तरह से जोर पकड़ चुका था। यही वजह है कि अब आयोग को प्रत्याशियों द्वारा जमा कराई गई जमानत की राशि तो लौटानी ही पड़ रही है, साथ ही इन चुनावों की विभिन्न तैयारियों पर खर्च की गई राशि का भी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके उलट उन प्रत्याशियों को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ रहा है जिन्होंने चुनावी प्रचार के लिए अपनी संपत्ति बेचकर या फिर उसे गिरवी रखकर राशि का इंतजाम किया था। दरअसल प्रदेश में यह चुनाव तीन चरणों में 6 जनवरी से होने जा रहे थे, जो सरकार की नाकामी की वजह से पिछड़ा वर्ग के आरक्षण विवाद की भेंट चढ़ गए हैं। यह चुनाव ऐसे समय निरस्त किया गया है जब पहले चरण के मतदान के लिए महज 9 दिन का समय ही रह गया था। इसकी वजह से अब पहले चरण के लिए नामांकन दाखिल कर चुके करीब 2.15 लाख उम्मीदवारों की फीस वापसी की कवायद करनी होगी।
...फिर सरंपच होंगे पंचायतों के मुखिया!
प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव निरस्त होने के साथ ही अब फिर से ग्राम पंचायतों की कमान सरपंचों को सौंपने की तैयारी है। चुनाव के चलते आचार संहिता लागू होने के बाद पंचायत संचालनालय ने पंचायतों की कमान सचिव एवं पंचायत समन्वय अधिकारी (पीसीओ) को सौंप दी थी। अब फिर से सरपंचों को कमान सौंपी जाएगी। इस संबंध में शासन स्तर पर फैसला आने वाले दिनों में हो जाएगा। राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव निरस्त करने का ऐलान करने के अगले ही दिन पंचायत संचालनालय की ओर से पंचायत संचालन संबंधी प्रस्ताव शासन को भेज दिया था। जिसमें मौजूदा स्थिति में सचिव एवं पीसीसी से पंचायत संचालित कराने के साथ-साथ पूर्व की भांति सरपंचों को पंचायत सौंपने का प्रस्ताव भी शामिल है। हालांकि अभी इसका फैसला राज्य शासन को करना है कि पंचायतों की कमान फिर से सरपंचों को सौंपी जाए या फिर सचिव एवं पीसीओ के पास ही अधिकार रहें। चुनाव आयोग द्वारा पंचायत चुनाव निरस्त करने के साथ ही प्रदेशभर में लागू आचार संहिता अप्रभावी हो गई है। ऐसे में सचिव एवं पीसीओ से पंचायतों की कमान वापस लेकर सरपंचों को सौंपी जाएगी। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सरकार किसी तरह का विवाद खड़ा नहीं करना चाहती है। क्योंकि पंचायतों के अधिकार सरपंचों को सौंपने को लेकर त्रिस्तरीय पंचायत संघ मांग कर चुका है और आंदोलन की चेतावनी भी दे चुका है। ऐसे में सरकार किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए सरपंचों को ही मुखिया बनाने की तैयारी में है।
- राजेंद्र आगाल