20-Nov-2020 12:00 AM
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देश में कुपोषण से मुक्ति के लाख दावे-वादे और घोषणाएं की जाएं परंतु विभागीय आंकड़े ही सबकी पोल खोलते रहते हैं। इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि दुनियाभर के बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है। विकासशील और गरीब देशों में यह समस्या ज्यादा है। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि पिछले तीन दशक से दुनिया के तमाम देश बच्चों के कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए संजीदगी से काम कर रहे थे और ऐसा हो पाने का एक कारण यह माना गया है कि वैश्विक आर्थिक विकास से यह गुंजाइश बनी। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद कोई बहुत उत्साहजनक नतीजे देखने को नहीं मिले।
देश के सबसे कुपोषित बच्चों वाले राज्यों में मप्र भी शामिल है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पूरे प्रदेश में 10 लाख से ज्यादा बच्चे कम वजन और 1 लाख से ज्यादा अतिकम वजन वाले सामने आए हैं। मतलब साफ है कि प्रदेश में कुपोषण थम नहीं रहा है। मप्र में कुपोषण लगातार पैर पसार रहा है। साल 2017 से लेकर 2019 तक की बात करें तो 10 लाख से ज्यादा बच्चे कम और अति कम वजन वाले दर्ज किए गए हैं। 2020 में विभाग पोर्टल पर आंकड़ा दर्ज नहीं कर पा रहा है क्योंकि कोरोना संक्रमण के कारण महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों ने काम ही नहीं किया है।
वैसे मौजूदा वैश्विक मंदी और महामारी ने बच्चों पर कुपोषण की आफत का अंदेशा और बढ़ा दिया। इस बात की तसदीक पिछले पखवाड़े संयुक्त राष्ट्र के दो बड़े अधिकारियों के बयानों से भी हो रही है। ये दो अधिकारी हैं संयुक्त राष्ट्र की राजनीतिक प्रमुख रोजमेरी डिकार्लो और संयुक्त राष्ट्र के मानवतावादी मामलों के प्रमुख मार्क लोकॉक। लोकॉक ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद को आगाह किया है कि कोराना संकट ने आर्थिक रूप से कमजोर देशों की स्वास्थ्य परिस्थितियों पर बहुत बुरा असर डाला है। लिहाजा उन देशों में गरीबी और भुखमरी बढ़ेगी, लोगों की औसत आयु कम हो जाएगी और शिक्षा की स्थिति खराब हो जाएगी। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह कि बच्चों की मौतों की संख्या बढ़ जाएगी। जाहिर है, ये अंदेशे फिजूल नहीं हैं। हाल में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक कोराना आने के बाद से दुनिया में हर महीने कमोवेश दस हजार बच्चे सिर्फ भूख से मर रहे हैं। आर्थिक मंदी के गंभीर होने पर यह आंकड़ा और भयावह हो सकता है।
अगर भारत के संदर्भ में इसे देखें तो इस समय आर्थिक मंदी का सबसे घना साया हमारे ऊपर ही है। विशेषज्ञों ने यह हिसाब लगाकर भी बता दिया है कि मौजूदा वित्तीय वर्ष के बाकी बचे 5 महीनों में भी भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के आसार नहीं हैं। वैसे भी इस साल की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शून्य से भी 23.9 फीसदी की गिरावट के बाद आर्थिक स्थिति को लेकर दुविधा में रहने का कोई कारण बचा नहीं है। दूसरी ओर कोरोना अभी भी अपनी चरम स्थिति में पहुंचा नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि संकटकाल में आगे क्या करना जरूरी होगा? खासतौर पर हालात से जूझने के लिए प्राथमिकताएं तय करना ही पड़ेंगी और तात्कालिक व दीर्घावधि की योजनाएं फौरन बनानी पड़ेंगी। बेशक तात्कालिक योजनाओं में देश में कामधंधों को पटरी पर लाना पहला काम होगा। लेकिन दीर्घावधि की योजनाओं में आने वाली पीढ़ी का ध्यान रखना सबसे बड़ी चुनौती होगी। जाहिर है, उसके लिए देश के बच्चों के स्वास्थ्य को इस आफत से बचाना उतना ही जरूरी है।
बच्चों में कुपोषण के मोर्चे पर दुनिया में कितना भी काम क्यों न हुआ हो, लेकिन यह भी एक हकीकत है कि अपने देश में आज भी 5 साल से कम उम्र के करीब 8 लाख 80 हजार बच्चे हर साल मर रहे हैं। इनमें 69 फीसदी बच्चों की मौत सिर्फ कुपोषण से होती है। यह आंकड़ा यूनिसेफ की रिपोर्ट स्टेट ऑफ वल्र्ड्स चिल्ड्रन, 2019 का है। हालांकि सरकार इस आंकड़े को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेती दिखती। उसका तर्क होता है कि पिछले कुछ दशकों से बाल विकास के संकेतकों में सुधार आया है। बेशक पिछले तीस-चालीस साल के दौरान रहीं तमाम सरकारों ने बच्चों पर ज्यादा खर्च करके हालात को कुछ संभाला है। इसी दौरान स्कूली बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन की विश्व प्रसिद्ध योजना का क्रियान्वयन भी हुआ। पिछले दशक में खाद्य सुरक्षा कानून ने भी काफी असर डाला। इसका सीधा असर बच्चों में पोषण से जोड़ा जा सकता है।
इधर कुछ वर्षों में जिस तरह से आर्थिक तंगी बढ़ी है, उससे इस तरह की योजनाओं को और ज्यादा प्रभावी बनाने के काम में अड़चनें आई हैं। कई तिमाहियों से जिस तरह से देश की माली हालत गिरावट पर है, उसका असर बच्चों में कुपोषण की समस्या से निपटने की योजनाओं पर पड़ा है। इधर, लगातार बढ़ती आबादी ज्यादा सरकारी खर्च की मांग कर रही है। गौरतलब है कि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद हम भुखमरी के वैश्विक सूचकांक में अतिगंभीर श्रेणी में हैं। वैश्विक भुखमरी सूचकांक में 117 देशों के बीच हमारा नंबर 102 वां है। यानी देश की मौजूदा माली हालत के मद्देनजर यह मानने में कोई दुविधा नहीं होनी चाहिए कि बच्चों में कुपोषण की समस्या और गहराती जाने वाली है।
पर्याप्त मात्रा में धन की दरकार
जहां तक बच्चों और किशोरों के लिए कल्याणकारी योजनाओं का सवाल है, तो यह भी तय है कि इसके लिए पर्याप्त मात्रा में धन की दरकार होगी। अलबत्ता सरकार के तरफदार विशेषज्ञ एक ही बात निकालकर लाएंगे कि अगर आर्थिक मोर्चे को संभाल लिया जाए यानी पहले सकल घरेलू उत्पाद बढ़ा लिया जाए तो उसके बाद सब ठीक हो जाएगा। लेकिन इसका जवाब भी दिया जाना चाहिए कि माली हालत सुधारने का काम लंबा खिंचने वाला है। इस मोर्चे पर पिछले दो साल से हम जिस तरह से लगातार नीचे आते जा रहे हैं, उसके मद्देनजर आने वाले साल-दो साल में किसी चमत्कार की उम्मीद बेमानी है और तब तक स्थायी नुकसान हो जाएगा। इसमें सबसे बड़ा अंदेशा बच्चों की एक भरी-पूरी पीढ़ी के अविकसित या कमजोर हो जाने का है। यह अपूरणीय क्षति होगी।
- राजेश बोरकर