आखिर इतना आक्रोश क्यों?
20-Apr-2022 12:00 AM 2986

 

- देश में अचानक एकसाथ एक जैसी वारदात की वजह क्या?

- सांप्रदायिक हिंसा के पीछे विदेशी ताकत या चुनावी षड्यंत्र?

सत्य, धर्म, दया और मर्यादा के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम बने भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव रामनवमीं पर इस बार आधा दर्जन से अधिक राज्यों में जिस तरह की हिंसक वारदातें हुईं, उससे सवाल उठने लगे हैं कि आखिर इतना आक्रोश क्यों? क्योंकि अभी तक धूमधाम और शांतिपूर्ण तरीके से रामनवमीं मनाई जाती थी, लेकिन इस बार सभी जगहों पर हिंसा का पैटर्न एक जैसा था। हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को न जाने किसकी नजर लग गई है कि यहां की फिजा में सांप्रदायिकता का जहर घुल गया है। यह जहर इतना जहरीला हो गया है कि हमेशा धूमधाम और शांतिपूर्ण तरीके से मनाए जाने वाले पर्व रामनवमीं के मौके पर भी इस बार आधा दर्जन से अधिक राज्यों में हिंसा हुई। सभी जगहों पर पैटर्न एक जैसा था- मसलन हुड़दंग, उकसाने वाली नारेबाजी और फिर पत्थरबाजी, जिसने दंगे का रूप ले लिया। हिंसा की इन घटनाओं ने संविधान, लोकतंत्र और बहुलतावाद में विश्वास रखने वाले शांतिप्रिय भारतवासियों की चिंता बढ़ा दी है। लोग अपने जान-माल और बच्चों के भविष्य को लेकर सहम गए हैं। देशभर में अपेक्षाकृत शांत माने जाने  वाले मप्र के खरगोन जिले में उपद्रव और आगजनी का ऐसा तांडव मचा कि आज तक उसका डर लोगों के मन में समाया हुआ है। शहर में कर्फ्यू लगा हुआ है और दीवारों, सड़कों पर सांप्रदायिक हिंसा के निशान दिख रहे हैं। आखिर इतना आक्रोश क्यों?

मप्र में बेहद शांत स्वभाव के माने जाने वाले इलाके मालवा-निमाड़ में पिछले करीब एक साल से सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं सामने आ रही हैं। क्षेत्र के आमजन भी इस बात को लेकर चिंतित दिखते हैं कि आखिर इस इलाके में पिछले दो साल में ऐसी क्या बात हो गई जो यहां इस तरह की घटनाएं होने लगी हैं। वहीं देशभर में पिछले 8-10 दिनों के भीतर जो कुछ देखने को मिला है, उसके बारे में आमतौर पर माना जा रहा है कि यह तो महज ट्रेलर था, असली पिक्चर तो अभी आनी बाकी है, क्योंकि वर्ष 2024 में लोकसभा के आम चुनाव हैं, जबकि उसके पहले गुजरात, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मप्र व कर्नाटक समेत 11 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। भयभीत लोगों को प्रशासन की ओर से सुरक्षा का भरोसा दिलाया जा रहा है। इसके बाद भी कई इलाकों से पलायन की खबर भी सामने आ रही हैं। आखिर ऐसी क्या वजह रही है कि गंगा-जमुनी तहजीब वाले इस देश में एक साथ रहने वाले विभिन्न संप्रदाय के लोग एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। क्या इसके पीछे विदेशी ताकतों का हाथ है या चुनावी षड्यंत्र? वजह कोई भी हो, सांप्रदायिक हिंसा से भारत माता का सीना छलनी हुआ है।

सारे मुद्दे जमींदोज

मप्र सहित आधा दर्जन से अधिक राज्यों में रामनवमीं को जो सांप्रदायिक उन्माद देखने को मिला उसकी जड़ में कौन है, यह तो जांच का विषय है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के लिए सांप्रदायिकता एक बड़ा हथियार बनकर उभरा है। उप्र चुनाव में जो 'अस्सी बनाम बीसÓ व बुलडोजर की राजनीति शुरू हुई थी, वह आगे भी जारी रहेगी। ऐसा इसलिए कि चुनाव जीतने का यह एक ऐसा अचूक फॉर्मूला साबित हुआ है, जिसके सामने प्रचंड बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, अशिक्षा, समाज के कमजोर तबकों का उत्पीड़न और सरकार की तमाम नाकामियां जैसे मुद्दे जमींदोज हो जाते हैं। राजस्थान में करौली के बाद मप्र के खरगोन का दंगा काफी चर्चित रहा। हालांकि यहां तत्परता दिखाते हुए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी दंगा करने वाले दंगाईयों के मकानों व दुकानों पर बुलडोजर चलवा दिए। लेकिन उसके बाद भी खरगोन सहित अन्य क्षेत्रों में भय का माहौल है। दरअसल राज्य में विधानसभा चुनाव का माहौल बन चुका है। ऐसे में यह दंगा किसी सुनियोजित साजिश का अंग माना जा रहा है। आजादी से पहले जिस तरह अंग्रेज धर्म और जाति के नाम पर हम भारतीयों को लड़ाते रहते थे, आज उसी तर्ज पर हम आजादी के 74 साल बाद भी लड़ रहे हैं।

इसी तरह चुनाव वाले राज्य गुजरात के हिम्मतनगर और खम्भात आदि जगहों से भी हिंसा की खबरें आईं हैं। करीब 7 माह पहले ही वहां विजय रूपाणी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को नया मुख्यमंत्री बनाया गया था। गुजरात भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। यही कारण है कि उप्र में जीत हासिल करने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अहमदाबाद में रोड शो किया था। कर्नाटक में भी पिछले वर्ष जुलाई में येदियुरप्पा की जगह बासवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके बाद से ही यह राज्य हिजाब विवाद, हलाल मीट, मुस्लिम दुकानदारों, कारीगरों व ऑटो वालों का बहिष्कार आदि के कारण चर्चा में बना हुआ है। यहां भी रामनवमीं के मौके पर कोलार व कुछ अन्य जगहों पर हिंसा हुई है। दक्षिण भारत में कर्नाटक इकलौता राज्य है, जहां भाजपा की सरकार है। वर्ष 2019 में कांग्रेस व जद (एस) के विधायकों को तोड़कर उसने वहां सत्ता पर कब्जा किया था। इसे बचाए रखना भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। बहरहाल उपरोक्त मुद्दों से तैयार हुए माहौल के बीच पार्टी ने राज्य में अपना चुनावी अभियान शुरू कर दिया है।

उल्लेखनीय है कि हिंसा व घृणा किसी भी देश और समाज के लिए बेहद घातक हैं, लेकिन भारत में यह तेजी से बढ़ती नजर आ रही है। हालत यह हो गई है कि गाली-गलौज और यहां तक कि बलात्कार की खुली धमकी को भी कुछ लोग सोशल मीडिया पर उचित ठहरा रहे हैं। स्थिति दिनों-दिन गंभीर होती जा रही है, लेकिन किसी भी स्तर पर कोई अंकुश नहीं है।

सवाल उठता है कि क्या बुलडोजर चलवा देने से दंगे के जख्म भर जाएंगे? सरकार की कोशिश होनी चाहिए कि ऐसी नौबत ही न आए कि दंगा-फसाद हो। लेकिन देखा यह जाता है कि दंगे और हादसे होने के बाद लाठी पीटी जाती है। सालों साल हो रहे दंगों से सरकारों ने अभी तक कोई सबक भी नहीं लिया है। क्या सरकार ने यह जानने की कभी कोशिश की है कि आखिर किसी एक समुदाय के त्यौहार पर दूसरे समुदाय के लोग इस तरह हमलावर कैसे हो जाते हैं। अगर वाकई सरकार ने इन तथ्यों पर होमवर्क किया होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती।

बुलडोजर चलवाना समाधान नहीं

मप्र के खरगोन में सांप्रदायिक हिंसा के बाद सरकार ने दंगाईयों के घरों पर बुलडोजर चलवा दिया है। लेकिन यह समस्या का समाधान बिलकुल नहीं है। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तो साफ-साफ कह दिया है कि बुलडोजर चलवाने का अधिकार प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पास नहीं है, बल्कि कोर्ट के पास है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारें बुलडोजर चलवाने का निर्णय कैसे ले लेती हैं। अगर वाकई दंगे-फसाद रोकने हैं तो अपराधियों पर नकेल कसने की जरूरत है। क्षेत्र में अपराधी प्रवृत्ति के कौन-कौन से लोग हैं, उनकी पूरी सूचना पुलिस के पास रहती है। अगर पुलिस इन अपराधियों पर नकेल कसकर रखे तो दंगा-फसाद होने की संभावना नगण्य हो जाएगी। लेकिन अक्सर देखा गया है कि क्षेत्र के बदमाश या तो पुलिस के लिए कमाई का जरिया रहते हैं, या फिर नेताओं के लिए वोट का। अगर ऐसी ही स्थिति रही तो सरकार कितना भी बुलडोजर चलाए अपराधियों के हौंसले पस्त होने वाले नहीं हैं।

दरअसल, शासन-प्रशासन के साथ आम आदमी भी दंगे-फसाद का आदी हो गया है। जब मामले ताजे रहते हैं तो उस पर बड़े-बड़े दावे और वादे किए जाते हैं और बाद में भुला दिया जाता है। अगर शासन-प्रशासन पहले से चुस्त-दुरुस्त रहे और अपराधियों पर नकेल कसे रहे तो घटना के बाद लाठी पीटने की नौबत नहीं आएगी। और न ही सरकार को बुलडोजर का सहारा लेना पड़ेगा। लेकिन देखा यह जा रहा है कि कानून व्यवस्था के नाम पर सुशासन की जगह वाहवाही लूटने का दौर चल रहा है। बड़े-बड़े मंचों से बुलडोजर चलाने का बखान किया जा रहा है। बैनर-पोस्टर लगाकर बताया जा रहा है कि कानून व्यवस्था दुरुस्त रखने के लिए सरकार कितनी तत्पर है। फिर ऐसे में रामनवमीं या अन्य जुलूस पर हमले और पत्थरबाजी कैसे हो जाती है। सरकारों को सोचना चाहिए कि अपराध होने के बाद इस तरह की कार्रवाई का बहुत ज्यादा अर्थ नहीं रह जाता। सरकार की वाहवाही की न तो अब लोगों को कोई गरज है और न ही आगे रहेगी। उन्हें सुशासन चाहिए। दंगे-फसाद रोकना है तो शासन और प्रशासन को सालभर सख्त और सतर्क रहना चाहिए। वरना धार्मिक आयोजनों पर ऐसे ही पत्थर बरसते रहेंगे और सांप्रदायिक दंगों में देश-प्रदेश जलता रहेगा।

दंगे के पीछे पीएफआई तो नहीं

मप्र सहित देशभर में जिस तरह एक ही तरीके से रामनवमीं के दिन दंगे हुए हैं, उससे आशंका जताई जा रही है कि इसके पीछे कहीं पॉपुलर फं्रट ऑफ इंडिया का हाथ तो नहीं है। प्रदेश में सुरक्षा एजेंसी के रडार पर अब विवादित संगठन पॉपुलर फं्रट ऑफ इंडिया भी आ गया है। इस संगठन से खरगोन हिंसा के कनेक्शन की जांच भी चल रही है। सूत्रों के अनुसार इंटेलिजेंस ने पीएफआई की मप्र में सक्रियता बढ़ने पर सरकार को अपनी रिपोर्ट भेजी है। अब सरकार जल्द इस संगठन पर प्रतिबंध लगा सकती है। पीएफआई एक इस्लामिक संगठन है। इसका गठन 2006 में केरल में हुआ और उसका मुख्यालय दिल्ली में बताया जाता है। खरगोन में हुई हिंसा के बाद आरोप लगे कि इसके लिए फंडिंग पीएफआई ने की थी। इन आरोपों के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने इसके कनेक्शन की जांच शुरू की। हाल ही में मप्र भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने आरोप लगाया था कि पीएफआई ने खरगोन में आगजनी और पथराव के लिए फंड दिया था। प्रदेश में पीएफआई तेजी से अपने पैर पसार रहा है। इस संगठन से प्रदेश को बड़ा खतरा भी बताया जा रहा है। इस पर सिमी से कनेक्शन के आरोप भी लगे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रदेश में पीएफआई के 650 से ज्यादा सदस्य सक्रिय हैं। यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। इस संगठन का इंदौर, उज्जैन, खंडवा, बुरहानपुर, रतलाम, खरगोन सहित प्रदेश के अधिकांश जिलों में नेटवर्क है। सूत्रों के अनुसार खरगोन हिंसा से तार जोड़ने के साथ प्रदेश में बढ़ रही संगठन की सक्रियता की वजह से इंटेलिजेंस के कान भी खड़े हो गए हैं। उसने एक रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। सरकार इस रिपोर्ट के आधार पर अब जल्द ही संगठन पर प्रतिबंध लगाने का फैसला कर सकती है। इस संगठन की कई अलग-अलग शाखाएं हैं। महिलाओं के लिए नेशनल वीमेंस फ्रंट और विद्यार्थियों के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया हैं। सूत्रों के अनुसार इन संगठनों के जरिए देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है। रिटायर्ड डीजीपी आरएलएस यादव ने कहा कि हमारा समाज लड़ना नहीं चाहता है, कोई लड़ाना चाहता है। हमारी सबसे पुरानी संस्कृति है। ये संस्कृति एक साथ रहने की, अच्छा व्यवहार करने की और एक-दूसरे के धर्म को मानने की है। इसके पीछे कुछ लोग और संगठन हैं, जो षड्यंत्र कर रहे हैं। यह स्थानीय कारणों से नहीं हो रहा है। यह देश के लिए बड़ा षड्यंत्र है। हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। ऐसे में दूसरे देश नहीं चाहते कि हम आगे बढ़ें। उन्हें लगता है कि उनका सामान फिर कौन खरीदेगा। अंग्रेजों के समय से स्लीपर सेल बनाए जा रहे हैं। ये लोग हथियार नहीं चलाते बल्कि लोगों को भड़काते हैं। उनमें जहर घोलते हैं। पूरे देश में कई वर्षों से शांति थी, लेकिन अब झगड़े शुरू हो गए हैं।  इसमें जिम्मेदारी सरकार की और पुलिस की है। ऐसे लोगों की पहचान कर उन पर कार्रवाई की जाए।

विपक्षी पार्टियां मौन

हैरत की बात यह है कि विभिन्न राज्यों में हुई हिंसक घटनाओं व उन्मादी माहौल को लेकर विपक्षी पार्टियों की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। सिर्फ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने शांति व भाईचारे की अपील करते हुए एक ट्वीट किया, जबकि सपा नेता अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, आम आदमी पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल व तृणमूल की मुखिया ममता बनर्जी समेत अन्य विपक्षी नेता खामोश हैं। पार्टियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता अलग बात है, लेकिन देश में जिस तरह के हालात बन रहे हैं, उसमें अमन-चैन व भाईचारे के लिए इन पार्टियों के नेताओं को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की समाधि तक कुछ कदम का मार्च करना ही चाहिए था। यदि यह संभव नहीं था, तो कम से कम संयुक्त बयान तो जारी ही किया जा सकता था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।

देश में तेजी से बढ़ रही हिंसा और घृणा के मसले पर विपक्षी दलों की उदासीनता समाज में भारी बेचैनी पैदा कर रही है। इस खामोशी के बहुत सारे मतलब भी निकाले जा रहे हैं। हद तो यह है कि जब विभिन्न शहरों में हिंसक झड़प हो रही थी, तो कांग्रेस और बसपा एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त दिखे। वहीं सपा प्रमुख अखिलेश यादव उप्र में होने वाली आपराधिक घटनाओं की खबरें ट्वीट कर रहे थे। वे शायद अपने राजनीतिक कैरियर में दूसरी बार बड़ी गलती कर रहे हैं। वर्ष 2013 में जब मुजफ्फरनगर दंगा हुआ था तो अखिलेश उप्र के मुख्यमंत्री थे और उस समय दंगा भड़काने वालों के खिलाफ जिस तरह की कार्रवाई करनी चाहिए थी, वह उन्होंने नहीं की थी। अब यह दूसरा मौका है, जब जनता ने उन्हें प्रदेश में मजबूत विपक्ष बनाया है तो भी वे खामोश हैं। क्या 'भाईचाराÓ और जातीय जनगणना जैसे मुद्दे सिर्फ चुनाव के लिए थे?

भाईचारे को किसकी नजर

पिछले 7 सालों से देशभर में शांति और भाईचारे का माहौल था। ऐसे में अचानक ऐसा क्या हुआ कि भाईचारा दुश्मनी में बदल गया है। रामनवमीं के जुलूस के दौरान आधा दर्जन राज्यों में सांप्रदायिक हिंसा चौंकाने वाली है। जेएनयू में खाने की पसंद को लेकर हुई झड़प भी हालात के बिगड़ने का एक और संकेत है। यह भारत की छवि को धूमिल करता है और इसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर प्रभाव डालता है। श्रीराम सेना के खिलाफ कर्नाटक सरकार की कार्रवाई का कोई मतलब नहीं होगा अगर यह महज दिखावा भर हो। इस बार भारत में हमने रामनवमीं कैसे मनाई? हमने रामनवमीं को रावणनवमीं में बदल दिया। देश के कई शहरों और गांवों में एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय से भिड़ गए। यहां तक की जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र, जिन्हें देश में अत्यंत प्रबुद्ध माना जाता है, वे भी आपस में भिड़ गए। कई शहरों में लाठियां, ईंट और गोलियां भी चलीं। कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस की ज्यादती के भी शिकार हुए। यह सब हुआ है, उसके जन्मदिन पर, जिसे अल्लामा इकबाल ने 'इमामे हिंदÓ कहा है। इकबाल का शेर है- है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज। अहले-नजर समझते हैं इसको इमामे हिंद!! राम को भगवान भी कहा जाता है और मर्यादा पुरुषोत्तम भी। लेकिन राम के नाम पर कौनसी मर्यादा रखी गई? राम को सांप्रदायिकता के कीचड़ में घसीट लिया गया। इसके लिए हमारे देश के वामपंथी और दक्षिणपंथी तथा हिंदू और मुसलमान, दोनों जिम्मेदार हैं। यदि रामनवमीं का उत्सव मना रहे पूजा-पाठी छात्र कह रहे हैं कि पूजा-स्थल के तंबू के पास ही छात्रावास में मांस पकाया और खिलाया जा रहा है तो उससे हमें दुर्गंध आती है तो उनका दिल रखते हुए मांसाहार कहीं और भी उस समय करवाया जा सकता था और यदि मांसाहारी छात्र चाहते तो पूजा के घंटे भर पहले या बाद में भी भोजन कर सकते थे लेकिन यह झगड़ा तो न राम से संबंधित था और न ही मांसाहार से! इसके मूल में संकीर्ण राजनीति थी। वामपंथ और दक्षिणपंथ की!

मांसाहार का समर्थन करने वालों में हिंदू छात्र भी थे। हिंदू मांसाहारी तो अपना औचित्य ठहराने के लिए भवभूति के ग्रंथ 'उत्तरराम चरित्रमÓ, प्रसिद्ध तांत्रिक मत्स्येंद्रनाथ और गोरखनाथ और चार्वाक के मद्यं, मांसं, मीनश्च, मुद्रा, मैथुनमेव च श्लोक तथा उपनिषदों के कई प्रकरणों को भी उद्धृत कर डालते हैं। वे वेदमंत्रों के भी मनमाने अर्थ लगा डालते हैं लेकिन वे वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों के उन तथ्यों और तर्कों को मानने के लिए कभी भी तैयार नहीं होते कि मांसाहार स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था के लिए घाटे का सौदा है। इसी तरह कुछ शहरों में मंदिरों और मस्जिदों के आगे भी बम फोड़े गए, पत्थर मारे गए और गोलियां तक चलीं। आप क्या समझते हैं कि यह काम किसी सच्चे ईश्वरभक्त या अल्लाह के बंदे का हो सकता है? बिल्कुल नहीं! यदि कोई सच्चा ईश्वरभक्त या अल्लाह का बंदा है तो उसके लिए ईश्वर और अल्लाह अलग-अलग कैसे हो सकते हैं? वह तो एक ही है। बस, उसकी भक्ति के रूप अलग-अलग हैं। ये रूप देश-काल और परिस्थितियों से तय होते हैं। यदि सारे विश्व में देश-काल और परिस्थितियां एक-जैसी होतीं तो इतने सारे धर्म, मजहब, रिलीजन होते ही नहीं। इस विविधता को धर्मांध लोग नहीं समझ पाते हैं। इसीलिए वे रामनवमीं को रावणनवमीं बना डालते हैं।

खरगोन दंगे में जिनके घर जले, उनके घर सरकार बनाएगी

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरगोन दंगे को लेकर बड़ी घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि दंगे में जिन लोगों के घर जले हैं, उन्हें सरकार बनवाएगी। उन्होंने कहा कि किसी ने दंगा फैलाया, तो मामा छोड़ेगा नहीं। कुछ लोग हैं, जो गड़बड़ करते हैं। दंगाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। खरगोन में गरीबों के घर जल गए। उनमें अनुसूचित जाति के लोग भी थे। छोटे-छोटे मकान जला दिए। अब बताइए जिन्होंने घर जलाए, उन पर कार्रवाई होना चाहिए या नहीं होना चाहिए। जिनके घर जले हैं, वो चिंता नहीं करें। मामा फिर से घर बनाएगा। हम फिर से घर खड़ा करेंगे। जिन्होंने घर जलाए हैं, बाद में उनसे ही वसूल करूंगा। छोडूंगा नहीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि अब दिग्विजय सिंह को उसमें भी दर्द होता है। कार्रवाई कैसे हो गई। झूठे फोटो पोस्ट कर रहे हैं। अरे झूठों कुछ तो शर्म करो। यह प्रदेश में आग लगाना चाहते हैं। लोगों को भड़का के शांति भंग करना चाहते हैं, ताकि अच्छे काम से लोगों का ध्यान हट जाए। घबराने की जरूरत नहीं है। भाजपा सरकार सबको सम्मान और सुरक्षा देगी। भाईचारा कायम रखिए। गड़बड़ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी। त्योहार धूमधाम से मनाएं, लेकिन भाईचारे से मनाएं। आने वाले समय हनुमान जयंती, गुड फ्राइडे, ईद को प्रेम से मनाएं।

मुस्लिम समाज के आदर्श ही विवादित लोग

मुस्लिम समाज की त्रासदी यह है कि उसका एक तबका जाकिर नाइक जैसे मौलानाओं और ओवैसी जैसे नेताओं को आदर्श मानता है तो एक अन्य राणा अयूब, शरजील इमाम, उमर खालिद से प्रेरणा लेता है। वह एपीजे अब्दुल कलाम, अब्दुल हमीद, मेजर उस्मान, रहीम, रसखान और यहां तक कि मुगल शासकों में सबसे उदार माने गए अकबर तक को घास नहीं डालता। दारा शिकोह के बजाय उसे औरंगजेब सुहाता है। जो मुस्लिम अपने समाज की कट्टरता या फिर पिछड़ेपन के मजहबी कारणों के खिलाफ बोलते, लिखते या कुछ कहते हैं, उन्हें या तो सरकारी या फिर संघी मुसलमान करार दिया जाता है। हाल ही में उप्र में मंत्री बनाए गए दानिश आजाद अंसारी इसका ताजा उदाहरण हैं। निसंदेह एक त्रासदी यह भी है कि कट्टरता का जवाब कट्टरता से देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह खतरनाक है। यति नरसिंहानंद या फिर बजरंग नाम बदनाम करने वाला तथाकथित मुनि कम खतरनाक नहीं। इन्हें फ्रिंज एलीमेंट कहकर खारिज करने से काम चलने वाला नहीं है, क्योंकि उनके जहरीले बयान बहुत बुरा असर डालते हैं और उन लोगों का काम आसान करते हैं, जो मुसलमानों को यह समझानेे की कोशिश में रहते हैं कि वे खतरे में हैं।

मालवा-निमाड़ में हुए हालिया सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं

-               खरगोन में रामनवमीं के दिन निकल रहे जुलूस में डीजे बजाए जाने को लेकर हुए विवाद के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी और जमकर पत्थरबाजी हुई पुलिस को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े तो वहीं पेट्रोल पंप का भी भरपूर उपयोग किया गया। कई घरों और दुकानों में भी आग लगा दी गई। अब तक लगभग 100 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है, वहीं दंगाइयों की संपत्ति को जमींदोज किया जा रहा है। सुरक्षा के मद्देनजर 4 भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, 15 डीएसपी सहित आरएएफ की कंपनी और बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है।

-               सितंबर 2021 में इंदौर के मुस्लिम बहुल बॉम्बे बाजार में मुस्लिम लिबास में दो लड़कियां एक आदमी के साथ देखी गईं। कुछ लोगों ने उन्हें रोका और उनसे पहचान पत्र दिखाने की मांग की। पहचान पत्र से पता चला कि वह लड़कियां हिंदू थीं, उनके साथ का पुरुष भी हिंदू था। इस बात को लेकर हंगामा शुरू हो गया।

-               अगस्त 2021 में इंदौर इलाके में एक मुस्लिम लड़की और हिंदू लड़के में प्यार हो गया था। समाज के बंधनों के डर से दोनों भाग गए थे। इस घटना को सोशल मीडिया पर जोरदार ढंग से शेयर किया गया था। इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय में बेहद नाराजगी थी।

-               अगस्त 2021 में उप्र के हरदोई का रहने वाला तस्लीम चूड़ियां बेचने के लिए इंदौर आता था। वह हिंदू नाम रखकर चूड़ियां बेचता था। इंदौर पुलिस ने उसके खिलाफ मामला दर्ज किया था। मप्र के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा था कि वह व्यक्ति हिंदू नाम रखकर चूड़ियां बेचता था। मंत्री के मुताबिक चूड़ी बेचने वाले के पास से दो फर्जी आधारकार्ड भी मिले थे। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने पर खूब चर्चा हुई थी।

-               2020 में महाकाल मंदिर के लिए विश्व प्रसिद्ध उज्जैन में भी 25 दिसंबर को हिंदूवादी संगठनों की रैली के दौरान हिंसा हुई थी। 25 दिसंबर को भारतीय जनता युवा मोर्चा की रैली पर हुए पथराव के बाद 18 लोगों को अरेस्ट किया गया था। मुस्लिम पक्ष का आरोप था कि भारत माता मंदिर की तरफ जा रही रैली के दौरान हिंदूवादी युवाओं ने बेगमबाग के सामने रुककर हंगामा किया, खड़े वाहनों में तोड़फोड़ की। इसके बाद मुसलमान बस्ती के लोगों ने रैली पर पथराव किया।

-               दिसंबर 2020 में राम मंदिर के लिए चंदा जुटाने के लिए मंदसौर में रैली निकाली गई। आरोप लगे कि इस दौरान मुसलमानों के धार्मिक स्थल और घरों में तोड़फोड़ की गई। पुलिस ने इस संबंध में 9 लोगों को अरेस्ट किया था, जिन्हें बाद में जमानत मिल गई थी।

-               मालवा क्षेत्र के तीन जिले उज्जैन, इंदौर और मंदसौर में पिछले डेढ़-दो साल में सांप्रदायिक हिंसा की छोटी बड़ी 12 से ज्यादा घटनाएं हो चुकी हैं। 2021 में इस तरह की सबसे पहली सांप्रदायिक हिंसा 25 दिसंबर को उज्जैन के बेगमबाग इलाके में हुई थी। 29 दिसंबर को इंदौर के चांदनखेड़ी और मंदसौर के डोराना गांव में रैली के दौरान माहौल खराब हुए। इंदौर के स्कीम 71 के सेक्टर-डी और राजगढ़ के जीरापुर में निकाली गई रैली में हालात बिगड़े। ये दोनों घटनाएं रैलियों के मुस्लिमों बहुल इलाकों से गुजरने के दौरान हुईं।

द कश्मीर फाइल्स पर विवाद

इस पर गौर करें कि द कश्मीर फाइल्स के बहाने कश्मीरी पंडितों के दमन और उत्पीड़न का जो सवाल उभरा था, उसे किस तरह यह स्वरूप दे दिया गया कि इस फिल्म के जरिए समुदाय विशेष के प्रति नफरत फैलाई जा रही है। आज कश्मीरी पंडितों की वापसी का सवाल नेपथ्य में है और यह प्रश्न सतह पर कि क्या कश्मीर में मुस्लिम नहीं मारे गए? निसंदेह मारे गए और बड़ी संख्या में मारे गए, लेकिन क्या उसके लिए कश्मीरी पंडित जिम्मेदार थे? यदि देश में सचमुच गंगा-जमुनी तहजीब है तो फिर अयोध्या मामले का समाधान सुप्रीम कोर्ट को क्यों करना पड़ा और क्या कारण है कि कई मुस्लिम नेता उसके फैसले को स्वीकार करने को तैयार नहीं? आखिर जिन गंगा-जमुना का उद्गम स्थल एक ही स्थल हिमालय ही है और जिनका प्रयागराज में संगम हो जाता है, वे अलग-अलग तहजीब या संस्कृति की परिचायक कैसे हो सकती हैं? जैसे गंगा-जमुनी तहजीब सवालों के घेरे में है, वैसे ही ईश्वर अल्लाह तेरो नाम... से दिया जाने वाला संदेश भी। क्या यह संदेश सचमुच ग्रहण किया गया? लक्ष्मण आचार्य के भजन रघुपति राघव राजाराम... में गांधीजी ने ईश्वर अल्लाह तेरो नाम... की पंक्ति इस नेक इच्छा से जोड़ी थी कि हिंदू और मुस्लिम समाज को यह संदेश दिया जा सके कि ईश्वर-अल्लाह एक ही हैं, बस उनके नाम अलग हैं, लेकिन कई मुस्लिम नेताओं और मौलानाओं ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। यह स्थिति अभी भी है। असदुद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी के नेताओं को जब कभी जय श्रीराम नारे का जिक्र करना होता है तो वे जेएसआर कहना पसंद करते हैं। ऐसे नेताओं के लिए भारत माता की जय भी बीएमकेजे है। वंदे मातरम् को लेकर भी उनकी आपत्ति किसी से छिपी नहीं। यह भी कोई नई-अनोखी बात नहीं कि ऐसे मुसलमानों को धमकियां मिलती हैं और उनके खिलाफ फतवे जारी होते हैं, जो कभी सार्वजनिक रूप से जय श्रीराम या फिर भारत माता की जय बोल देते हैं। अब तो यह स्थिति है कि भाजपा को वोट देने वाला मुस्लिम भी निंदा और कुछ मामलों में तो पिटाई, सामाजिक बहिष्कार का भी पात्र है। इस कहर से सेलेब्रिटी भी नहीं बच पाते। क्या यह किसी से छिपा है कि विभिन्न मौकों पर इरफान, सारा अली खान और मोहम्मद कैफ को किस तरह लांछित किया गया?

दिग्विजय-विजयवर्गीय का ट्वीट विवादित

खरगोन में भड़की हिंसा भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन सियासत कम होने का नाम नहीं ले रही है। पहले राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह और उसके बाद भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के विवादित ट्वीट कर विवाद में फंस गए हैं। अपने बयानों से कई बार विवाद पैदा करने वाले कांग्रेस के चाणक्य दिग्विजय सिंह ने बिहार का एक फोटो शेयर कर उसे खरगोन का बताया था। हालांकि गलती का अहसास होते ही खुद दिग्विजय सिंह ने उसे हटा दिया। दूसरी तरफ भाजपा लगातार उन्हें घेरने में लगी है। दिग्विजय सिंह के खिलाफ प्रदेश का माहौल खराब करने और धार्मिक उन्माद फैलाने के मामले की धाराओं में कई शहरों में एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। अभी दिग्विजय सिंह का मामला थमा भी नहीं है कि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अपने ट्विटर हैंडल से एक वीडियो को शेयर किया है, जिसके कैप्शन में उन्होंने लिखा है कि ये है खरगोन में चाचा जान दिग्विजय सिंह के शांतिदूत, पुलिस इन पर कार्रवाई ना करे तो क्या करे। आस्तीन के सांप कोई भी हो फन कुचलना जरूरी है। वीडियो में एक मुस्लिम युवक कह रहा है कि 4 गाड़ियां हमारे एरिया में हैं, हम जरा कुछ करें तो तहलका मचा देते हैं ये लोग। इतना डर काफी है तुम्हारे लोगों के लिए। समझ गए न। जबकि वह तेलंगाना के निजामाबाद में स्थित स्टार होटल के सामने बना यह वीडियो 2019 का है।

- राजेंद्र आगाल

 

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