मोबाइल से कैंसर 70 प्रतिशत बढ़ा?
18-Feb-2015 12:47 PM 1237654

मोबाइल से कैंसअगस्त 2012 में पंजाब के लुधियाना जिले में बीएसएनएल ने अपने सभी मोबाइल टॉवरों की रेडिएशन क्षमता कम कर दी। लेकिन

कैंसर एक्सप्रेस में इलाज के लिए राजस्थान जाने वालों की संख्या कम नहीं हुई। क्योंकि निजी टेलीकॉम ऑपरेटरों ने रेडिएशन घटाने से इंकार कर दिया था।Ó उनकी रैंज पर असर पड़ रहा था। पंजाब, जो कि मोबाइल टॉवर की दृष्टि से सबसे सघन नेटवर्क वाले राज्यों में से एक है- भारत की कैंसर राजधानी में तब्दील हो चुका है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कैंसर महामारी का रूप धारण करता जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि अगले दो दशक में कैंसर मामलों में 70 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। भारत में ही वर्ष 2009 से 2011 के बीच 10 लाख 57 हजार 204 मामले थे, जो बढ़कर 2014 में 11 लाख 17 हजार 269 तक पहुंच गए। यद्दपि तम्बाकू का उपयोग कैंसर का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है लेकिन हाल के दिनों में जीवन शैली में बदलाव और रेडिएशन के कारण भी तेजी से कैंसर फैल रहा है।
मोबाइल उपयोग करने वालों की संख्या भारत में ही 95 करोड़ को पार कर चुकी है। जाहिर है इतनी बड़ी संख्या में मोबाइल कनेक्शनों को चलायमान रखने के लिए बड़ी संख्या में मोबाइल टॉवर लगाए जा रहे हैं और इनमें नियमों की अनदेखी की जा रही है। महिलाओं में बढ़े स्तन कैंसर के मामलों को भी अब मोबाइल रेडिएशन से जोड़ा जाने लगा है। हर 10 मिनट में 1 महिला ब्रेस्ट कैंसर की शिकार बन रही है। प्रतिवर्ष 1 लाख 30 हजार महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर का खतरा झेलती हैं। पहले देर से विवाह, मातृत्व में देरी इत्यादि कारणों को स्तन और गर्भाशय के कैंसर से जोड़ा जाता रहा है लेकिन ऐसे कई मामले सामने आए जब 7-7 बच्चों की माँओं को स्तन कैंसर हुआ। जिन महिलाओं का विवाह समय पर हो गया और समय पर माँ भी बन गईं, वे भी कहीं न कहीं स्तन कैंसर की शिकार हो गईं। पुरुषों में भी उन समूहों में कैंसर फैल रहा है जो हाई रिस्क में नहीं आते हैं। घनी आबादी में मोबाइल टॉवर लगाने से भी रेडिएशन का खतरा बढ़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि कैंसर पर रोक नहीं लगाई गई तो आने वाले दो दशक में यह मौत का सबसे बड़ा कारण बन जाएगा।
टावर लगाने की अनुमति देने से पूर्व निगम सार्वजनिक रूप से आपत्तियां लेकर निस्तारण करता है। हेरिटेज संबंधी भवनों, अस्पताल, स्कूल पर टावर की अनुमति नहीं है। टावर के लिए भूखंड का आकार 900 वर्गफीट, लंबाई चौड़ाई 20 फीट से कम नहीं होना चाहिए। संरचना की स्थिरता के लिए एमएनआईटी, आरआईईएस दिल्ली, नेशनल कौंसिल फॉर बिल्डिंग मेटेरियल अथवा राज्य सरकार में रजिस्टर्ड चार्टड इंजीनियर्स में से किसी एक में प्रमाण पत्र लेना जरूरी है, लेकिन इनमें से किसी नियम का पालन नहीं होता। जनवरी 2013 में एक ग्लोबल रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत में 450 मिलीवॉट प्रति वर्ग मीटर रेडिएशन इमिशन लिमिट है, लेकिन यह सेफ लिमिट से 900 गुना ज्यादा है। रिपोर्ट से सामने आया कि सेफ रेडिएशन इमिशनट 0.50 मिलीवॉटवर्ग मीटर है। यह बायोइनीशिएटिव रिपोर्ट 2012 में 29 स्वतंत्र वैज्ञानिकों और दस देशों के हेल्थ एक्सपर्ट ने मिलकर तैयार की थी। दूसरी तरफ यह भी दावा किया जाता है कि रेडिएशन इमिशन लिमिट को यदि और कम किया जाएगा, तो यह और खतरनाक हो सकता है, क्योंकि तब मोबाइल हैंडसेट नेटवर्क सर्च करने के लिए अपने रेडिएशन को बढ़ा देगा। यह इससे भी ज्यादा खतरनाक होगा। सरकार ने 1 सितंबर 2012 से टॉवर्स की रेडिएशन लिमिट कम कर दी थी। इससे पहले देश में रेडिएशन इमिशन लिमिट 4500 मिली वॉट प्रति वर्ग मीटर थी, लेकिन यह एक सितंबर 2012 से घटाकर 450 मिलीवॉट प्रति वर्ग मीटर कर दी गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर आपके 50 मीटर के दायरे में मोबाइल टावर लगा है और आप उसकी रेडिएशन के संपर्क में रहते हैं तो आपको कई प्रकार की बीमारियां लग सकती हैं। इसके रेडिएशन के संपर्क में आने वाले लोगों में स्लीप डिस्टरबेंस, सिर दर्द, थकान, जोड़ों में दर्द, कैंसर, दिमाग में स्लेजिंग हियरिंग डिसऑर्डर जैसी बीमारियां भी सामने आई हैं। बच्चों पर इसका असर ज्यादा पड़ता है, क्योंकि उनका ब्रेन छोटा नाजुक होता है। वल्र्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर का कहना है कि टावर के रेडिएशन मनुष्य में कैंसर पैदा करते हैं। इससे ब्रेन कैंसर का एक टाइप ग्लाइओमा हो सकता है।
कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट का भी दावा है कि इन इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों से कैंसर तक हो सकता है। शोधकर्ताओं ने इन टावरों के आसपास रहने वाले सैकड़ों लोगों से बातचीत के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की है। इनमें से कुछ लोग तो उन इमारतों में रहते हैं। जिनकी छतों पर ऐसे टावर लगे हैं। बाकी लोग उनके 50 मीटर के दायरे में रहते हैं। कोलकाता के केंद्रीय इलाके में ऐसे टावरों का घनत्व बहुत ज्यादा है। इन सबका कहना था कि उनको किसी न किसी बीमारी से जूझना पड़ रहा है। इस अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि विकिरण की वजह से टावर के पास रहने वाले ज्यादातर लोग किसी चीज पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते। बहुत से लोगों को रात को ठीक से नींद भी नहीं आती।
संस्थान के एक शोधकर्ता आशीष मुखर्जी कहते हैं, ज्यादातर लोगों का कहना था कि अपने घर से दूर जाने पर उनकी बीमारियों का असर कम हो जाता है। लेकिन घर आते ही वे पहले जैसी हालत में लौट आते हैं।Ó शोधकर्ताओं का कहना है कि इस रिपोर्ट के नतीजों की पुष्टि के लिए और तकनीकी सबूत जरूरी हैं। लेकिन इस मामले पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। मुखर्जी कहते हैं, टावर से निकलने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें कोशिकाओं को नष्ट कर कैंसर पैदा करने में सक्षम हैं। इससे दिल की बीमारियां भी पैदा हो सकती हैं।Ó महानगर के चित्तरंजन नेशनल कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट के निदेशक जयदीप विश्वास कहते हैं, टावर के आसपास रहने वाले लोग चौबीसों घंटे विकिरण की जद में रहते हैं। इससे उन लोगों को खासकर बहरापन, अंधापन और मेमोरी लॉस होने की आशंका ज्यादा है।Ó वह कहते हैं कि विकिरण का ब्रेन ट्यूमर से कोई सीधा संबंध है या नहीं, इसकी पुष्टि के लिए अभी और विस्तृत अध्ययन जरूरी है। विश्वास का कहना है कि ऐसे अध्ययनों के होने तक मोबाइल फोन के टावरों को ज्यादा आबादी वाले इलाकों में लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
कैंसर विशेषज्ञ गौतम मुखर्जी कहते हैं, चौबीसों घंटे इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों की जद में रहने का स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पडऩा लाजिमी है।Ó कुछ साल पहले सरकार ने ऐसे टावरों से पैदा होने वाले विकिरण पर अध्ययन के लिए एक टीम का गठन किया था। उस टीम के सदस्य और आईआईटी, खडग़पुर के प्रोफेसर सुदर्शन नियोगी कहते हैं, 0.92 वाट्स प्रति वर्गमीटर की निर्धारित सीमा सही नहीं है। छह मिनट तक विकिरण की जद में रहने पर शरीर को उसके कुप्रभाव से मुक्त होने में 23 घंटे 54 मिनट लगते हैं। लेकिन जिन इलाकों में टावरों का घनत्व ज्यादा है वहां ऐसा संभव नहीं होता।Ó नियोगी भी इस मामले को गंभीर बताते हुए और अधिक अध्ययन की जरूरत पर जोर देते हैं। र 70 प्रतिशत बढ़ा?

 

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