5 राज्यों में होगी अग्निपरीक्षा
17-Mar-2021 12:00 AM 3610

 

5 राज्यों यानी पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। 27 मार्च से मतदान की प्रक्रिया शुरू होगी और मतगणना 2 मई को होगी। चुनावी मैदान में पार्टियां और नेता अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस अग्निपरीक्षा में कौन सफल होगा यह तो 2 मई को ही पता चलेगा। अभी भाजपा, कांग्रेस, टीएमसी, एआईएडीएमके, डीएमके सहित कई पार्टियां चुनावी मैदान में पसीना बहा रही हैं।

नए दशक के शुरुआती वर्ष यानी 2021 की पहली छमाही में देश की 2 सबसे बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के साथ ही टीएमसी, एआईएडीएमके और डीएमके सहित कई पार्टियों की अग्निपरीक्षा होगी। यह अग्निपरीक्षा पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में होने जा रही है। इन 5 राज्यों की 824 विधानसभा सीटों पर 18.68 करोड़ मतदाता 2.7 लाख मतदान केंद्रों पर अपना मतदान कर पार्टियों और नेताओं की किस्मत तय करेंगे। इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, महासचिव राहुल गांधी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल, केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पनालीस्वामी और पुडुचेरी के पूर्व मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी की भी अग्निपरीक्षा होनी है।

पश्चिम बंगाल में जहां भाजपा को सत्ता में आने की चुनौती है, वहीं असम में उसे अपनी सत्ता बचानी है। दक्षिण भारत में कांग्रेस के लिए केरल में इस बार सत्ता में आना एक बड़ी चुनौती है। तो वहीं लेफ्ट पार्टी को अपने एकमात्र गढ़ को बचाना भी जरूरी है। पुडुचेरी में ताजा राजनीतिक हालात को देखते हुए चुनाव बेहद जरूरी है। वहीं, जयललिता और करुणानिधि की अनुपस्थिति में इस बार तमिलनाडु में एआईएडीएमके और डीएमके आमने-सामने हैं। यानी ये चुनाव किसी एक पार्टी के वर्चस्व की जंग नहीं है, बल्कि हर राज्य की स्थिति-परिस्थिति के अनुसार पार्टियों की भी स्थिति है। जिन 5 राज्यों में चुनाव हो रहा है, उनमें से पश्चिम बंगाल ऐसा राज्य है जहां का चुनाव सबसे रोचक होने वाला है। इस राज्य में साम, दाम, दंड, भेद सबकुछ आजमाया जा रहा है।

मोदी मैजिक की परीक्षा

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद से ही लगभग हर चुनाव में भाजपा का एक ही नारा रहता है कि वह मोदी मैजिक पर सवार होकर जीत हासिल कर रही है। लेकिन इस बार 5 राज्यों के चुनाव में मोदी मैजिक की असली परीक्षा है। और इस परीक्षा का केंद्र बिंदु है पश्चिम बंगाल। बंगाल में भगवा सरकार बनाने के लिए भाजपा पिछले 5 साल से लगातार तैयारी कर रही है। पार्टी के प्रदेश प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को कमजोर करने और भाजपा को मजबूत करने की रणनीति में जुटे रहे। वहीं उनके साथ राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, गृहमंत्री अमित शाह खड़े रहे। जिसका परिणाम यह हुआ है कि भाजपा ने टीएमसी के करीब 2 दर्जन विधायक तोड़ लिए हैं। लेकिन इसके बाद भी पश्चिम बंगाल में भाजपा अभी भी दूसरे पायदान पर नजर आ रही है।

दरअसल, पश्चिम बंगाल में भाजपा अपने ही बनाए जाल में फंस गई है। यह सच है कि बंगाल में धार्मिक उन्माद कभी नहीं रहा, लेकिन इस बार भाजपा ने बंगाल को धार्मिक और जातीय गोलबंदी में कैद कर दिया है। यह गोलबंदी जितना बंगाल को नुकसान पहुंचाएगी, उससे कहीं अधिक भाजपा और उसके परिवार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी। इसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। क्योंकि उन्माद को फैलाकर आप चुनाव तो जीत सकते हैं किंतु राजनीति नहीं कर सकते। राजनीति का मूल सिद्धांत राजनय है। अर्थात् राज चलाने की नीति। भाजपा राजनीति के क्षरण को न्यौत रही है। वह राजनीति के बुनियादी सिद्धांतों को ही खत्म कर रही है। जब ये सिद्धांत ही नहीं बचेंगे तो सिवाय उन्माद, हिंसा, खून-खराबे और असहमति के स्वर को कुचल देने के सिवाय क्या बचेगा!

दीदी की दमदारी

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी वहां की रग-रग में छाई हुई हैं। भाजपा उनके राज को उखाड़ फेंकने का भरपूर दावा कर रही है, लेकिन राजनीति की माहिर खिलाड़ी दीदी भाजपा को उसी की भाषा में जवाब दे रही हैं। जब विकास की बात आती है तो वे मोदी सरकार से अपने राज्य के विकास की तुलना करने लगती हैं। जब धर्म की बात आती है तो वे भी धार्मिक हो जाती हैं। जब छल-कपट की बात आती है तो वे उसमें भी बाजी मार लेती हैं। लेकिन ममता बनर्जी ने माकपा को शिकस्त देने के लिए जो तुरुप का पत्ता फेंका था, उस पत्ते को खेलने में भाजपा सबसे आगे है। यही कारण है कि केंद्र में जब से भाजपा की सरकार आई तब से लगातार उन्हें घेरने की कोशिश की जाती रही है। कभी राज्यपाल के जरिए तो कभी किसी जांच के नाम पर, तो कभी सार्वजनिक तौर पर उन्हें अपमानित करने के प्रयास किए जाते हैं। मगर ममता इन सभी विघ्न-बाधाओं को पार कर भाजपा को अच्छी तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे रही हैं। जिस हिंसा की परम्परा को ममता ने शुरू किया था, उसे आगे तक ले जाने में भाजपा हर तरह से अव्वल है। उन्माद फैलाने और समुदायों को विभक्त करने में ममता उसकी बराबरी नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि धर्म और जाति-भेद से दूर पश्चिम बंगाल में अब धार्मिक नारे गूंज रहे हैं। हालांकि मंच पर चंडी पाठ कर ममता ने भाजपा को उसके ही पाले में घेर लिया है। क्या भाजपा अब मंच से रावण संहिता का पाठ कर सकती है। इसके अतिरिक्त ममता बनर्जी के साथ जो हिंसा हुई है, वह बंगाल के भद्र-लोक को भी नागवार गुजरी है। एक स्त्री पर हमला, ऐसा बंगाल में कभी सोचा नहीं जा सकता। बंगाल में स्त्री की प्रतिष्ठा इधर के बंगाल में ही नहीं उधर के बंगाल में भी है। शेख हसीना वाजेद वहां की प्रधानमंत्री हैं और उनके पहले खालिदा जिया थीं। यह है बंगाल कि सार्वभौमिकता और इसी के बूते ममता बनर्जी पूरी टक्कर दे रही हैं। बंगाल में वाकई खेला होबो!

तमिलनाडु में विरासत की लड़ाई

तमिलनाडु में मुकाबला इस बार डीएमके और एआईएडीएमके के बीच हो रहा है। पिछली बार की तरह इस बार लेफ्ट और छोटे दलों का कोई अलग मोर्चा नहीं बना है। कांग्रेस जहां विपक्षी गठबंधन की अगुवाई कर रही डीएमके के साथ है वहीं भाजपा का सत्ताधारी एआईएडीएमके के साथ चुनावी समझौता हुआ है। असल में तमिलनाडु में दोनों ही गठबंधनों के बीच विरासत की लड़ाई होने जा रही है और उसमें भी सत्ताधारी गठबंधन में हिस्सेदारी जताने जेल से छूट कर वीके शशिकला भी आ धमकी हैं। मौजूदा स्थिति देखें तो भाजपा के मुकाबले कांग्रेस बेहतर स्थिति में है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे में जिस तरीके से एमजीआर और के कामराज की विरासत पर भाजपा ने दावा जताने की कोशिश की है, सिर्फ डीएमके की कौन कहे, जयललिता के लोग भी बेचैन हो उठे हैं। डीएमके और एआईएडीएमके की बरसों पुरानी जंग में तमिलनाडु में ये पहला विधानसभा चुनाव है, जो पुराने दिग्गजों एम करुणानिधि और जे जयललिता की गैरमौजूदगी में होने जा रहा है। चुनाव के लिहाज से देखें तो इन दोनों ही नेताओं के बगैर 2019 का आम चुनाव पहला रहा और अब ये दूसरा चुनाव होगा। 2016 में विधानसभा चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद जयललिता बीमार पड़ीं और फिर अस्पताल में ही उनका निधन हो गया। दो साल बाद 2018 में एम करुणानिधि भी चल बसे। और इस हिसाब से देखा जाए तो राजनीतिक विरासत की असली जंग अब शुरू होने जा रही है, जिसमें एक तरफ तो करुणानिधि के बेटे डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन हैं और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी के नेतृत्व में जयललिता की राजनीतिक विरासत के दावेदार खड़े हैं। ये लड़ाई भी पारिवारिक राजनीतिक विरासत बनाम एक स्वाभाविक विरासत की लड़ाई है। सत्ताधारी एआईएडीएमके के पाले में खड़े होकर भाजपा के लिए फैमिली पॉलिटिक्स पर हमला बोलना आसान हो जा रहा है,  क्योंकि पारिवारिक राजनीतिक की सबसे बड़ी मिसाल कांग्रेस भी डीएमके के साथ ही चुनाव लड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो तमिलनाडु दौरे में एक ही साथ दोनों को निशाना बना लिया।

असम में क्षेत्रीय पार्टियों का दम

असम में भाजपा और कांग्रेस के साथ क्षेत्रीय पार्टियों का दम दिखेगा। भाजपा का मानना है कि राज्य में उनका कांग्रेस से नहीं बल्कि बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट से कड़ा मुकाबला है। असम के कैबिनेट मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने भी कहा है कि राज्य में क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा टक्कर नहीं दे सकती हैं लेकिन अजमल हमेशा एक फैक्टर बने रहे हैं। वहीं सरमा ने यह भी कहा कि चुनावों में भाजपा और कांग्रेस-एआईयूडीएफ के बीच टक्कर होगी। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय दल लोगों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं, जैसा कि उन्हें होना चाहिए। अजमल हमेशा से असम के एक इलाके के लिए फैक्टर रहे हैं। वह संस्कृति और सभ्यता के लिए खतरा हैं। इस बीच, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और असम के पार्टी प्रभारी बैजयंत जय पांडा ने कहा, 'अब कांग्रेस ने एआईयूडीएफ के साथ समझौता कर लिया है और यह पहचान की राजनीति की बात करती है। मुझे लगता है कि कांग्रेस अपने खुद के अस्तित्व की बात कर रही है। उन्हें कांग्रेस बचाओ में ध्यान केंद्रित करना चाहिए न कि असम बचाओ में। भाजपा भारतीयता के लिए खड़ी है और हम राइट साइड हैं।Ó गौरतलब है कि प्रदेश की 126 सदस्यीय विधानसभा सीटों के लिए तीन चरणों में 27 मार्च, 1 और 6 अप्रैल को मतदान होगा। चुनाव का परिणाम 2 मई को घोषित किया जाएगा। राज्य में इस बार सत्तारूढ़ भाजपा के कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच जबरदस्त टक्कर देखने को मिलेगी। असम में 33 हजार मतदान केंद्र होंगे। राज्य में पिछले चुनावों की तुलना में करीब 30 फीसदी मतदान केंद्र बढ़ाए गए हैं। गौरतलब है कि भाजपा असम में 2016 के विधानसभा चुनाव में कुल 126 सीटों में से 89 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 60 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। कांग्रेस 122 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 26 सीटों पर कामयाबी हासिल की थी। एजीपी 30 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 14 पर सफलता हासिल की थी। वहीं बदरुद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ ने 74 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाई और 13 सीटों पर सफलता मिली। बीओपीएफ ने 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और 12 पर उसके उम्मीदवार जीतकर विधानसभा पहुंचे। विधानसभा चुनाव में सीपीआई 15 सीटों पर चुनाव लड़ी थी लेकिन खाता नहीं खुला।

केरल में कमजोर विपक्ष

केरल में विधानसभा चुनाव में यूं तो लड़ाई यूडीएफ और एलडीएफ गठबंधन के बीच मानी जा रही है लेकिन इनके अलावा भाजपा भी अपना पूरा जोर लगाने में जुटी है। दक्षिणी राज्य केरल में अपनी जमीन तलाश रही भगवा पार्टी इस बार राज्य के 125 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। 375 करोड़ रुपए के एसएनसी लावलिन घोटाले और सोने की तस्करी में शामिल होने के आरोप झेलने के बावजूद केरल की वाम मोर्चा सरकार यदि विधानसभा चुनाव में मजबूती से लड़ती दिखाई दे रही है तो इसकी बड़ी वजह विपक्ष का कमजोर होना है। मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस चुनाव के दौरान वरिष्ठ नेता पीसी चाको के इस्तीफे से और कमजोर हुई है। 50 वर्ष कांग्रेस में बिताने के बाद इस्तीफे में चाको ने आरोप लगाया कि पार्टी नेता विपक्षी दल रमेश चेन्निथला और पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के खेमों में बंटी है। चाको के मुताबिक कांग्रेस के सभी उम्मीदवार या तो चांडी खेमे के हैं या चेन्निथला खेमे के। ऐसे में उनके या पूर्व रक्षामंत्री एके एंटनी जैसे निष्पक्ष नेताओं के लिए पार्टी में जगह नहीं बची है। यही वजह है कि केरल के इतिहास में 1997 के बाद दूसरी बार सत्ताधारी गठबंधन चुनाव में जीत हासिल कर सकता है। पिछले वर्ष दिसंबर में हुए पंचायत चुनाव में धमाकेदार जीत हासिल करने वाले मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व पर राज्य की जनता मुहर लगा चुकी है।

अगली पीढ़ी की अग्निपरीक्षा

5 राज्यों में होने जा रहे चुनाव में सियासी चेहरों की बढ़ी अहमियत के साथ ही अधिकांश सूबों में नई या अगली पीढ़ी के नेताओं का नेतृत्व कसौटी पर है। तमिलनाडु में स्टालिन, केरल में रमेश चेन्निथला हों या असम में गौरव गोगोई, हिमंत बिस्व सरमा या फिर बंगाल में भाजपा के नए पोस्टर बॉय शुभेंदु अधिकारी, अगली पीढ़ी के इन नेताओं के लिए ये चुनाव सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। 5 चुनावी राज्यों में ममता बनर्जी के अलावा मुख्यमंत्री पद की होड़ में शामिल सभी दलों के संभावित दावेदारों को नेतृत्व की काबिलियत साबित करनी है। असम में मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल 5 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर चुके हैं, मगर राज्य में पार्टी के राजनीतिक नफा-नुकसान का आंकलन करने के बाद भाजपा ने उन्हें अगले मुख्यमंत्री के तौर पर पेश नहीं किया है। भाजपा की इस रणनीति में पूर्वोत्तर में पार्टी के सबसे बड़े रणनीतिकार के तौर पर उभरे हिमंत बिस्व सरमा के लिए नेतृत्व का रास्ता खुला रखने का संकेत देखा जा रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों में भाजपा की जमीन मजबूत करने में बीते कुछ साल में कामयाब रहे हिमंत के लिए यह चुनाव असम का नेतृत्व संभालने के लिहाज से सबसे निर्णायक है।

नेतृत्व निखारने की चुनौती

असम में नागरिकता संशोधन कानून से बढ़ी भाजपा की सिरदर्दी, गठबंधन के सहारे कांग्रेस की मजबूत हुई चुनौती और मौजूदा मुख्यमंत्री सोनोवाल की दावेदारी के बीच हिमंत के सामने अपने नेतृत्व को निखारने की चुनौती है। असम में दिग्गज नेता तरुण गोगोई के निधन के बाद कांग्रेस में भी अगली पीढ़ी के नेतृत्व का पूरा मैदान खाली है। लिहाजा स्वाभाविक रूप से यहां होड़ भी ज्यादा है। कांग्रेस सांसद गौरव गोगाई अपने पिता तरुण गोगोई की जगह राज्य में पार्टी के सबसे बड़े छत्रप के रूप में उभरने के लिए जोर लगा रहे हैं। राज्य में जमीनी पकड़ रखने वाले सांसद प्रदीप बोरदोलोई इस दौड़ में गौरव को तगड़ी टक्कर दे रहे हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा भी कांग्रेस के नेतृत्व के चेहरे की रेस से बाहर नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस में इन तीनों में आपसी प्रतिस्पर्धा तो है ही, साथ ही जनता की कसौटी पर खुद को दमदार साबित करने की दोहरी चुनौती भी है।

शुभेंदु को बचानी होगी साख

बंगाल में तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी का नेतृत्व निर्विवाद है, मगर इस चुनाव को महा-मुकाबला बना चुकी भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं करना चुनौती बनी हुई है। हालांकि नंदीग्राम में ममता और शुभेंदु की सीधी जंग के बीच भाजपा ने अपनी सियासी ताकत को जिस तरह शुभेंदु अधिकारी के इर्दगिर्द केंद्रित कर दिया है उससे साफ संकेत है कि पार्टी उनमें प्रदेश का अपना नेतृत्व देख रही है। ममता की 10 साल की सत्ता और ढाई दशक से भी अधिक की जमीनी सियासी पकड़ के बीच शुभेंदु के लिए अगली पीढ़ी के नेतृत्व को बंगाल में स्थापित करना आसान चुनौती नहीं है। तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि के दौर के बाद यह पहला विधानसभा चुनाव है। स्वाभाविक रूप से द्रमुक नेता स्टालिन के पास खुद को राज्य के नए सियासी छत्रप के रूप में साबित करने का मौका है।

पलानीस्वामी की दोहरी परीक्षा

जयललिता के अवसान के बाद केंद्र और भाजपा की राजनीतिक सरपरस्ती में अपना कुनबा बिखरने से बचाने में कामयाब रही अन्नाद्रमुक की चुनौती को स्टालिन फिलहाल हल्के में नहीं ले सकते। इसी तरह, अन्नाद्रमुक में जयललिता के बाद नेतृत्व की लड़ाई में मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने भले ही उपमुख्यमंत्री पनीरसेल्वम को मात दे दी हो, मगर यह चुनाव ही जनता के बीच उनके नेतृत्व की विश्वसनीयता और लोकप्रियता दोनों को तय करेगा। वहीं केरल में वामपंथी गठबंधन के पास मुख्यमंत्री पिनराई विजयन का आजमाया हुआ नेतृत्व है, मगर कांग्रेस में एके एंटनी और ओमन चांडी जैसे दिग्गजों के बाद रमेश चेन्निथला के लिए जनता की कसौटी पर खुद को साबित करने की सबसे बड़ी चुनौती है। चुनाव के दरम्यान केरल में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं के असंतोष और अंदरूनी उठापटक की बातें रमेश की इस चुनौती को कहीं ज्यादा बढ़ाती दिख रही हैं।

जाति-धर्म से परे बंगाल

बंगाल पूरे भारत में अकेला ऐसा प्रांत है, जहां न धर्म ऊपर है, न जाति, न कोई समुदाय। वहां सबसे ऊपर है बंग भाषा और बंग संस्कृति। चूंकि भाषा, उत्पादन के साधन और क्षेत्र-विशेष के लोगों की आस्था से ही संस्कृति का विकास होता है, इसलिए बंग संस्कृति की जड़ें पूरे बंगाली समाज में बहुत गहरी हैं। क्योंकि यह बंगाल ही था, जहां शुरू से श्रम को महत्व मिला। बुनकर संस्कृति बंगाल की ही देन है। बंगाल में कोई काम हड़बड़ी में नहीं होता बल्कि उसको खूब मनोयोग से पूरा किया जाता है। कपड़ा बुनने में बंगाल ने इतनी प्रगति की, कि ढाका की मलमल की ख्याति पूरे विश्व में फैल गई। जब बंगाल की दीवानी ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने हाथों में ली तो पहला काम ही यह किया कि यहां के पूरे कपड़ा उद्योग को ही नष्ट कर दिया। हजारों बुनकरों के हाथ काट दिए, ताकि उनकी लंका शायर की मिलों में बना कपड़ा भारत में बाजार पा सके। लेकिन अंग्रेजों ने यहां जितने अत्याचार किए, उतना ही बंगाल को उन्होंने आधुनिकता की तरफ ढकेला भी।

कांग्रेस की नई टीम का इम्तिहान

5 राज्यों में विधानसभा चुनाव का प्रचार रफ्तार पकड़ चुका है। कांग्रेस प्रचार में पूरी ताकत झोंक रही है, क्योंकि इन राज्यों के नतीजे पार्टी के नए अध्यक्ष की राह तय करेंगे। चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहता है तो राहुल गांधी के लिए अध्यक्ष पद पर वापसी की राह आसान होगी। वहीं, प्रदर्शन उम्मीद से कम रहा तो पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को नेतृत्व पर सवाल उठाने का एक और मौका मिल जाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस से ज्यादा राहुल गांधी की नई टीम का इम्तिहान है। राहुल की साख 5 राज्यों के प्रभारियों के प्रदर्शन पर निर्भर है, क्योंकि सभी चुनावी राज्यों के प्रभारी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष के भरोसेमंद माने जाते हैं। इन चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहता है, तो बिहार की तरह पार्टी से नाराज चल रहे असंतुष्ट नेताओं को कांग्रेस नेतृत्व और उनकी टीम के सदस्यों पर सवाल उठाने का मौका मिल जाएगा। कांग्रेस को सबसे ज्यादा उम्मीद तमिलनाडु से है। तमिलनाडु और पुडुचेरी का प्रभार दिनेश गुंडुराव के पास है। वह राहुल की नई टीम का हिस्सा हैं। केरल के वायनाड से राहुल खुद सांसद हैं। वर्ष 2019 में उनका यहां से चुनाव लड़ना फायदेमंद साबित हुआ और पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। पर निकाय चुनाव में एलडीएफ को मिले समर्थन ने यूडीएफ की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। केरल में 1980 के बाद कोई पार्टी दूसरी बार सत्ता में नहीं आई है। ऐसे में एलडीएफ सत्ता में वापसी करता है तो यह पार्टी के लिए बड़ा झटका होगा। तारिक अनवर लोकसभा चुनाव से पहले ही एनसीपी से कांग्रेस में आए हैं। केरल के प्रभारी के तौर पर संगठन में उनकी पहली जिम्मेदारी है। ऐसे में यूडीएफ सत्ता में वापसी नहीं करता है तो उन्हें प्रदेश प्रभारी बनाने के फैसले पर भी सवाल उठेंगे। पश्चिम बंगाल का प्रभार पूर्व केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद के पास है। वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल हैं, पर पार्टी नेतृत्व ने उन पर भरोसा जताया है। ऐसे में जितिन प्रसाद के सामने भी खुद को साबित करने की चुनौती है। असम का प्रभार भी राहुल की टीम के सदस्य जितेंद्र सिंह संभाल रहे। उनके सामने भी खुद को साबित करने की चुनौती होगी।

बड़ा चुनावी मुद्दा बना सीएए

देश के 5 राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव में नागरिकता कानून (सीएए) मुद्दा अहम बनता नजर आ रहा है। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने गत दिनों असम में विधानसभा चुनाव अभियान की शुरुआत की। इस दौरान राहुल ने कहा कि अवैध घुसपैठ एक मुद्दा है, लेकिन असम के लोगों में वो क्षमता है कि इस मुद्दे को वो खुद सुलझा सकते हैं। साथ ही कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए सीएए नहीं होने देंगे। वहीं, केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन ने भी कहा कि सीएए को हम अपने राज्य में लागू नहीं होने देंगे। बता दें कि केंद्र की मोदी सरकार ने बीते साल 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन विधेयक संसद से पास करा लिया था। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर से ये कानून भी बन गया। हालांकि, एक साल बाद भी इस कानून को अमलीजामा पहनाने के नियम सरकार नहीं बना पाई है। अब जबकि असम और पश्चिम बंगाल सहित 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहा है तो सीएए मुद्दे पर सियासत भी गर्मा गई है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही इस मुद्दे को अपनी-अपनी तरह से चुनावी हथियार बनाने में जुटे हैं।  केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में एक रैली में कहा कि कोरोना वैक्सीन जब देश में सबको मिल जाएगी तो उसके बाद नागरिकता कानून को जमीन पर उतारा जाएगा। शाह ने कहा कि केंद्र की मोदी सरकार पड़ोसी देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों का ध्यान रखते हुए नागरिकता कानून लाई थी। अमित शाह ने कहा कि ममता बनर्जी लगातार सीएए का विरोध कर रही हैं, लेकिन मैं भरोसा दिलाता हूं कि शरणार्थियों को नागरिकता मिलेगी। भाजपा के छोटे से लेकर बड़े नेता तक बंगाल में सीएए के मुद्दे को जोर-शोर से उठा रहे हैं और लागू करने का भरोसा भी दिला रहे हैं।

चुनावी राज्यों में पार्टियों की वर्तमान स्थिति

देश के 4 राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी के विधानसभा चुनाव का घमासान शुरू हो गया  है। तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में एक चरण में 6 अप्रैल को विधानसभा चुनाव होने हैं। असम में 3 चरणों में 27 मार्च, 1 अप्रैल और 6 अप्रैल को विधानसभा चुनाव कराए जाएंगे। पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में 27 मार्च, 1, 6, 10, 17, 22, 26 और 29 अप्रैल को मतदान होगा। सभी राज्यों में सभी सीटों के लिए वोटों की गिनती 2 मई को होगी। पश्चिम बंगाल विधानसभा का कार्यकाल 30 मई को पूरा हो रहा है। ऐसे में 30 मई से पहले हर हाल में विधानसभा और नई सरकार के गठन की प्रकिया पूरी होनी है। पश्चिम बंगाल में कुल 294 विधानसभा सीटें हैं। पिछले 10 साल से ममता बनर्जी यहां मुख्यमंत्री हैं। 140 सीटों वाली केरल विधानसभा का कार्यकाल एक जून को खत्म हो रहा है। राज्य में 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी की अगुवाई वाले गठबंधन लेफ्ट डेमोक्रेटिक फं्रट ने 91 सीटों पर जीत हासिल की थी। पिनरई विजयन राज्य के 12वें मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस की अगुवाई वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट दूसरे नंबर पर रहा था। 126 सीटों वाली असम विधानसभा का कार्यकाल 31 मई को समाप्त हो रहा है। 2016 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने राज्य में 15 साल से सत्तासीन कांग्रेस के शासन को उखाड़ फेंका था। 2016 के चुनाव में भाजपा को 86 सीटें मिलीं और सर्वानंद सोनोवाल राज्य के मुख्यमंत्री बने। तमिलनाडु विधानसभा का कार्यकाल 24 मई को खत्म हो रहा है। 234 सीटों वाली तमिलनाडु विधानसभा के लिए 2016 में हुए चुनाव में जयललिता की अगुवाई में एआईएडीएमके ने जीत हासिल की थी। 5 दिसंबर 2016 को जयललिता के निधन के बाद ओ पनीरसेल्वम राज्य के मुख्यमंत्री बने लेकिन केवल 73 दिनों तक ही वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिके रह सके। 16 दिसंबर 2017 को ई पलानीस्वामी राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा का कार्यकाल 8 जून को खत्म हो रहा है। 30 सीटों वाली पुडुचेरी विधानसभा के लिए 2016 में हुए चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए गठबंधन को जीत हासिल हुई थी। यूपीए को कुल 17 सीटों पर जीत मिली जिनमें कांग्रेस को अकेले 15 सीटें हासिल हुई थीं। पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा कांग्रेस के सीनियर नेता वी नारायणस्वामी पुडुचेरी के मुख्यमंत्री बने थे।

- राजेंद्र आगाल

FIRST NAME LAST NAME MOBILE with Country Code EMAIL
SUBJECT/QUESTION/MESSAGE
© 2025 - All Rights Reserved - Akshnews | Hosted by SysNano Infotech | Version Yellow Loop 24.12.01 | Structured Data Test | ^