क्या 5 साल में निपट जाएंगे सारे मुकदमें?
20-Apr-2015 05:10 AM 1238441

 

भारत के प्रधान न्यायाधीश एच.एल. दत्तू ने बताया है कि समय सीमा तय कर दी गई है कि किसी मामले की सुनवाई 5 साल से ज्यादा नहीं चलेगी। दिल्ली में 24 अदालतों के मुख्य न्यायाधीशों और मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन के बाद न्यायमूर्ति दत्तू ने यह आश्वासन दिया है। जिस देश की अदालतों में पौने 3 करोड़ मामले लंबित हों, वहां मुख्य न्यायाधीश का यह आश्वासन आश्चर्यजनक और सवालों से भरा हुआ है। किंतु उन्होंने आश्वासन दिया है तो अवश्य ही सोच-विचार कर और पर्याप्त तैयारियों के बाद दिया होगा। देश की अदालतोंं में मामले दशकों चलते हैं। वादी-प्रतिवादी, गवाह भगवान को प्यारे हो जाते हैं लेकिन मुकदमे का निराकरण नहीं हो पाता। जब फैसला आता है तो वह इसलिए हास्यास्पद बन जाता है कि उसे सुनने के लिए वादी और प्रतिवादी कई बार इस धरती पर ही नहीं रहते। ऐसे बहुत से मुकदमेे हैं जिनका उदाहरण दिया जाता है लेकिन न्याय की यह देरी उन अपराधियों पर भारी पड़ती है जो अपने दंड के अनुपात में कई गुना ज्यादा सजा इसलिए भुगत लेते हंै क्योंंकि उनके मामले का निराकरण ही नहीं हो पाता।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2011 तक भारत में 4,30,000 लोग जेलों में बंद थे, जिनमें से 3 लाख बंदी केवल इसलिए बंद थे क्योंकि उनके मुकदमे का निर्णय होना है। 2007 में यह संख्या केवल 2,50,727 थी। केवल तीन वर्षों में विचाराधीन बंदियों की संख्या में 50,000 का इजाफा हो गया। इन विचाराधीन बंदियों में से एक तिहाई से अधिक 88,312 अनपढ़ थे, इनमें माध्यमिक स्तर से कम शिक्षित बंदियों की संख्या जोड़ दी जाए तो यह संख्या विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या का 80 प्रतिशत (1,96,954) थी ।  2007 में विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या 2,50,727 थी जिसमें से 1891 पांच वर्ष से भी अधिक समय से बंद थे।
अगस्त 2010 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि सभी विचारण न्यायाधीशों ने मुकदमों के निस्तारण की गति में उच्च स्तर बनाये रखा है। ऐसे में हमारे अपराधिक न्याय तंत्र के लिए यह एक भयावह स्थिति है। इनमें ऐसे बंदी भी सम्मिलित हैं कि जिन पर चल रहे मुकदमे में जितनी सजा दी जा सकती है, उससे कहीं अधिक वे फैसले के इन्तजार में जेल में रह चुके हैं।  52 हजार से अधिक बंदी ऐसे थे जिन पर हत्या करने का आरोप था। हो सकता है कि पांच वर्ष से अधिक समय से बंद 1891 विचाराधीन बंदी हत्या के ही अपराध में बंद हों। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इनमें से कितने ऐसे हैं जिन पर हत्या का आरोप संदेह के परे साबित किया जा सकेगा।
वास्तविकता यह है कि जब भारत का संविधान निर्मित हो रहा था और अनुच्छेद 21 पर चर्चा हुई तो अपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया, निष्पक्ष विचारण, जीवन के मूल अधिकार तथा अन्य बिंदुओं पर विचार किया गया। लेकिन तेज गति से विचारण का बिंदु चर्चा में सम्मिलित ही नहीं था। यह बात पहली बार तब सामने आई जब 1979 में हुसैन आरा खातून के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि तेजगति से विचारण अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अभियुक्त का मूल अधिकार है। इसके उपरांत इस बात को न्यायालयों ने अनेक बार दोहराया है, लेकिन अभी तक विचाराधीन बंदियों के लिए यह अधिकार एक सपना ही बना हुआ है। 1970 के बाद विचारधीन बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है लेकिन उनमें सजा काटने वाले कम हैं और अदालत में अपने दिन की प्रतीक्षा करने वाले अधिक।
आखिर इस स्थिति का हल क्या है? पूर्व विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने मामूली आरोपों के बंदियों को 2010 के अंत तक रिहा किए जाने की एक योजना घोषित की थी, जिससे विचाराधीन 3 लाख बंदियों में से दो तिहाई को रिहा किया जा सके और जेलों की भीड़ को कम किया जा सके। लेकिन इस योजना पर कितना अमल हुआ है? इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। 16 सितंबर, 2012 की स्थिति के अनुसार देश की अधीनस्थ अदालतों में न्यायिक अधिकारियों के 3670 पद रिक्त थे।
अधीनस्थ अदालतों में लंबित मुकदमों की बढ़ती संख्या को देखते हुये ही 11वें वित्त आयोग की सिफारिश पर केन्द्रीय सहायता से राज्यों में 1734 त्वरित अदालतें गठित की गयी थीं। केन्द्रीय सहायता से शुरू की गयीं त्वरित अदालतों ने सन 2000 से 2011 की अवधि में त्वरित अदालतों ने करीब 33 लाख मुकदमों का निबटारा भी किया था। इसी तरह देश की ग्रामीण जनता को छोटे-छोटे विवादों के निबटारे के लिये ग्राम न्यायालयों की स्थापना की परिकल्पना की गयी। ग्राम न्यायालयों की स्थापना के लिये ग्राम न्यायालय कानून, 2008 के तहत इस समय मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा और कर्नाटक में 150 से अधिक ग्राम न्यायालय काम कर रहे हैं।
13वें वित्त आयोग ने 2010-15 की अवधि में राज्यों में न्यायिक सुधार के विभिन्न कार्यक्रमों के लिए पांच हजार करोड रुपए के अनुदान की सिफारिश की थी। केन्द्रीय सहायता से इस अवधि के दौरान राज्यों द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं। पिछले कुछ दशकों में अदालतों में लंबित मुकदमों और नये मुकदमों की संख्या में काफी वृद्धि हुई है लेकिन इस अनुपात में नयी अदालतों का गठन और न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों की संख्या में ही वृद्धि नहीं हो सकी है। न्यायाधीशों और अदालतों की संख्या में वृद्धि की तुलना में मुकदमों की संख्या दुगुनी रफ्तार से बढ़ी है। यदि न्यायिक प्रणाली का इसी रफ्तार से विस्तार होता रहा तो अगले तीन दशकों में मुकदमों की संख्या बढ़कर 15 करोड़ हो जायेगी और इनके निबटारे के लिये कम से कम 75 हजार न्यायाधीशों और अदालतों की आवश्यकता पड़ सकती है। अधीनस्थ अदालतों और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों पर तेजी से नियुक्तियां करने के इरादे से जुलाई 2011 में एक विशेष अभियान शुरू किया गया था। इस अभियोग की संतोषजनक प्रगति को देखते हुये इसकी अवधि बढ़ायी भी गयी थी।

इस रात की कोई सुबह भी है ?

  • देश में आठ लाख वकील।
  • अदालतें-चौदह हजार ।
  • अदालत में काम करने को औसतन 57 वकील।
  • जज केवल बारह हजार।
  • 66 वकीलों के लिए एक जज।
  • एक जज के पास निर्णय करने को 3170 मुकदमे।
  • साल में दिन 365/366।
  • काम के दिन मात्र 200।
  • एक दिन में 60 मुकदमों में सुनवाई हो, तो हर मुकदमे में अगली सुनवाई के लिए दिन तय होगा (अगली पेशी) तीन माह बाद।
  • साल में चार सुनवाई से अधिक नहीं।
  • एक जज एक मुकदमे में रोज निर्णय करे, तो साल में निर्णय होंगे केवल 200।
  • पूरे देश में निपटेंगे केवल 2400000 मुकदमे।
  • मौजूदा मुकदमों को निपटने में समय लगेगा 12 वर्ष।
  • रेणु आगाल
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