30 साल का सूखा
21-Jul-2020 12:00 AM 3843

 

भारत की पहली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस आज क्षेत्रीय दलों से भी कमजोर स्थिति में है। जिन राज्यों में कभी उसका एक क्षत्र राज हुआ करता था, आज उन्हीं राज्यों में कांग्रेस अपनी पहचान बरकरार रखने के लिए संघर्ष कर रही है। बिहार में तो पार्टी पिछले लगभग 30 साल से सत्ता से दूर है। अभी भी पार्टी उस स्थिति में नहीं है कि वह सत्ता में आ सके।

वो 1990 का दशक था, उसके बाद कांग्रेस कभी बिहार में अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी। राजद के लालू प्रसाद यादव और उसके बाद जदयू के नीतीश कुमार का ऐसा जादू चला कि कांग्रेस चाहकर भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। यह दोनों नेता जेपी आंदोलन से निकले हुए वो नेता रहे, जिन्होंने बिहार की राजनीति को नए सिरे से जन्म दिया। इन दोनों की राजनीति ने न सिर्फ कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया बल्कि कांग्रेस को उनके पीछे चलने पर मजबूर कर दिया।

बिहार की 243 विधानसभा सीटों के लिए एक बार फिर से चुनाव होने जा रहे हैं। प्रदेश में राजनीतिक वातावरण गरमा गया है। एक बार फिर लालू यादव की पार्टी राजद और नीतीश की जदयू के बीच सीधा-सीधा मुकाबला होना है। खास बात यह है कि पिछले विधानसभा चुनाव में नीतीश की जदयू ने लालू की राजद के साथ मिलकर सरकार बनाई थी। लेकिन दोनों के बीच का गठबंधन ज्यादा नहीं चल सका और नीतीश ने लालू से नाता तोड़कर भाजपा के समर्थन से अपनी सरकार बना ली। अब चुनाव से पहले दोनों पार्टियां अपना सियासी समीकरण बनाने में लगी हैं।

बिहार में अब तक 33 मुख्यमंत्री रहे जिनमें जगन्नाथ मिश्र, भोला पासवान, नीतीश कुमार और राबड़ी देवी सबसे ज्यादा तीन बार मुख्यमंत्री रहे। बिहार में 7 बार राष्ट्रपति शासन भी रहा। 1990 में कांग्रेस के जगन्नाथ मिश्र के बाद लालू यादव पहली बार जनता दल से बिहार के मुख्यमंत्री बने। 1995 में हुए चुनाव से पहले लालू यादव अपनी पार्टी राजद को मजबूती के साथ खड़ी कर चुके थे। 1995 के चुनाव में लालू यादव को बहुमत मिला और वो एक बार फिर मुख्यमंत्री बने लेकिन चारा घोटाले में भ्रष्टाचार के बड़े आरोपों के बीच लालू यादव को दो साल बाद ही 1997 में मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा। लालू यादव ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बना दिया। राबड़ी देवी 2000 तक मुख्यमंत्री रहीं। 2000 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन 7 ही दिनों में ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ कि राबड़ी देवी एक बार फिर से बिहार की मुख्यमंत्री बन गई। राबड़ी देवी 2005 तक मुख्यमंत्री रहीं।

बिहार की राजनीति मेें सुशासन बाबू के नाम से लोकप्रिय हुए नीतीश कुमार राबड़ी देवी के बाद 2005 में मुख्यमंत्री बने। इसके बाद से लगातार नीतीश कुमार ही बिहार के मुख्यमंत्री है। इस बीच मई 2014 से फरवरी 2015 तक 9 महीने के लिए जीतन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बने लेकिन नीतीश कुमार के प्रभाव के चलते उनकी समय से पहले ही सत्ता से विदाई हो गई। बिहारी बाबू नीतीश कुमार एक बार फिर से मुख्यमंत्री बन गए।

लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच चले सत्ता के संघर्ष में भाजपा ने बिहार की राजनीति में अपने पैर पसारे। 2005 में भाजपा और जदयू का गठबंधन हुआ। यह गठबंधन 2014 में टूटा। नई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच नीतीश कुमार की जदयू और लालू प्रसाद यादव की राजद ने आपस में हाथ मिला लिया। 2015 का चुनाव दोनों ने कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा। हालांकि इस चुनाव में राजद को नीतीश कुमार की जदयू को मिली 71 सीटों के मुकाबले 80 सीटें मिली थी लेकिन नीतीश कुमार फिर से मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। गठबंधन में कड़वाहट आई और दोनों के बीच दरार पड़ गई। नीतीश ने अपनी सरकार बचाए रखने के लिए एक बार फिर भाजपा से हाथ मिला लिया।

चूंकि लालू यादव चारा घोटाला मामले में जेल में है, इसलिए राजद के पास नेतृत्व कमजोर हो गया। लेकिन पिछले 5 सालों में उनके बेटे तेजस्वी यादव ने बिहार में एक मजबूत नेता के तौर पर उभरने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। तेजस्वी यादव ने विपक्ष के तौर पर नीतीश सरकार पर समय-समय पर कई सधे हुए राजनीतिक हमले किए। यहीं नहीं, कई सर्वे रिपोर्ट में तेजस्वी यादव को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में जनता की पहली पसंद भी बताया जा रहा है। जहां एक ओर तेजस्वी यादव कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे, वहीं नीतीश कुमार एक बार फिर भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लडें़गे। भाजपा ने साफ कर दिया है कि अगर जदयू और भाजपा गठबंधन सत्ता में आया तो नीतीश कुमार ही फिर से मुख्यमंत्री होंगे।

कांग्रेस भी बढ़ाना चाहती है अपना प्रभाव

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजद और जदयू के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया था। कांग्रेस ने 40 सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार होने वाले चुनाव में महागठबंधन से नीतीश कुमार की पार्टी हट चुकी है। ऐसे में महागठबंधन में मुख्य रूप से राजद और कांग्रेस ही बड़ी पार्टी के रूप में है। बदली राजनीतिक स्थितियों में कांग्रेस अपना दबदबा बढ़ाना चाहती है। यही कारण है कि चुनाव से पहले कांग्रेस के नेताओं ने चुनाव लड़ने के लिए 80 सीटों की मांग की है। हालांकि इस पर अभी कोई निर्णय नहीं हुआ है लेकिन माना जा रहा है कि कांग्रेस इससे कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी।

 - विनोद बक्सरी

FIRST NAME LAST NAME MOBILE with Country Code EMAIL
SUBJECT/QUESTION/MESSAGE
© 2025 - All Rights Reserved - Akshnews | Hosted by SysNano Infotech | Version Yellow Loop 24.12.01 | Structured Data Test | ^