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बीमार होता बचपन

एशिया क्षेत्र की भौगोलिक और प्राकृतिक बनावट के कारण यहां निवास करने वालों के पेट के आसपास चर्बी ज्यादा जमा होती है, जिससे बीमारियों की संख्या भी बढ़ जाती है। आधुनिक जीवन-शैली और खानपान में हो रहे बदलाव के कारण हमारा देश कुपोषण और मोटापे के साथ ही गैर-संचारी रोगों से पीडि़त होता जा रहा है। दरअसल, कंप्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रीशन सर्वे (सीएनएनएस) के तहत देश में बच्चों और किशोरों के रोगों के अध्ययन के दौरान यह जानकारी सामने आई। यह सर्वे विगत दशकों में हमारे समाज में हो रहे तीव्र आर्थिक और सामाजिक बदलाव की ओर इशारा करता है। सर्वे में बच्चों के खानपान और उनसे होने वाले रोगों का अध्ययन किया गया है, लेकिन खानपान और रोग काफी हद तक सामाजिक परिवेश से जुड़े होते हैं, जो आर्थिक हालात को भी दर्शाते हैं। रिपोर्ट डराने वाली इसलिए भी है, क्योंकि पिछले कुछ सालों में बच्चों और किशोरों में डायबिटीज, हाइपरटेंशन और किडनी संक्रमण आदि रोग बढ़े हैं।
देश में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, नेशनल हेल्थ पॉलिसी और सरकारी स्वास्थ्य मानकों के अनुसार आम लोगों और ग्रामीणों को अब भी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं नसीब नहीं हैं। ऐसे में विशेष सुविधाएं अभी दूर की कौड़ी हैं। समाज में खानपान में हो रहे तेजी से बदलाव के कारण ऐसी बीमारियां भी सिर उठाने लगी हैं, जो आमतौर पर एक खास उम्र के बाद देखी जाती हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) और भारतीय जनसंख्या परिषद के साथ मिलकर वर्ष 2016 और 2018 के बीच बच्चों और किशोरों में खानपान को लेकर कंप्रिहेंसिव नेशनल न्यूट्रीशन (सीएनएनएस) सर्वे किया। इसमें देश के तीस राज्यों के एक लाख बारह हजार बच्चों को शामिल किया गया। इसमें बच्चों में अधिक वजन और गैर-संचारी रोगों के लक्षणों का भी अध्ययन किया गया है। कुपोषण और अतिपोषण के अलावा इसमें विटामिन और मिनरल को भी शामिल किया गया है।
इस सर्वे रिपोर्ट में बताया गया है कि बच्चों और किशोरों में गैर-संचारी रोगों का जोखिम बढ़ रहा है, जो काफी चिंतनाजनक है। बच्चों में हाई कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स के संकेत मिले हैं। हाई कोलेस्ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स से हृदय रोग, दौरा और दूसरे गैर-संचारी रोगों का खतरा बढ़ जाता है। सर्वे के दौरान पांच से नौ साल तक की उम्र के दस प्रतिशत बच्चों में प्री-डायबिटिक के लक्षण पाए गए, जो यह संकेत देते हैं कि भविष्य में उन्हें निश्चित ही मधुमेह होगा। अभी हालत यह है कि इसी उम्र के एक प्रतिशत बच्चे डायबिटीज की चपेट में हैं।
व्यापक स्तर पर किया गया यह सर्वे बच्चों में मोटापे की ओर संकेत करता है। सर्वे में शामिल पांच से नौ साल आयु वर्ग के लगभग पांच प्रतिशत बच्चे और किशोर अधिक वजन के हैं, जबकि पांच साल से कम आयु वर्ग में, हर तीन बच्चों में से एक बच्चा यानी पैंतीस प्रतिशत बच्चे अविकसित कद और तैंतीस प्रतिशत बच्चे कम वजन के हैं। हर छह में से एक बच्चे का वजन उसके कद के मुताबिक कम था, यानी सत्रह प्रतिशत बच्चों का वजन कद के हिसाब से कम था और इसी उम्र वर्ग के इकतालीस प्रतिशत बच्चे एनीमिक यानी खून की कमी का शिकार थे। देखने में तो उक्त समस्याएं सामान्य-सी लगती हैं, लेकिन यही आगे बड़ी बीमारी को जन्म देती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार पांच से नौ साल के बच्चों में से एक तिहाई यानी करीब चौंतीस और सोलह फीसद किशोरों में ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर उच्च पाया गया। यह खून में पाई जाने वाली एक प्रकार की चिकनाई है, जिसका सीधा संबंध दिल की बीमारियों और दौरे से है। ट्राइग्लिसराइड्स का बढऩा भविष्य में दिल की गंभीर परेशानियों को जन्म देना है। लगभग सात प्रतिशत बच्चों और किशोरों को किडनी के गंभीर रोग होने का खतरा है। जबकि, पांच प्रतिशत किशोरों में उच्च रक्तचाप पाया गया। विगत कुछ सालों में बच्चों के खानपान में तेजी से बदलाव आया है। फास्ट फूड और जंक फूड की मात्रा काफी बढ़ गई है। खानपान में बदलाव, ज्यादा काबोहाईड्रेट और चीनी वाली चीजों की खपत का असर सीधे-सीधे सेहत पर पड़ता है।
मात्र 4 फीसदी अधिक वजन वाले बच्चे
देश में पांच से नौ वर्ष के बीच के चार प्रतिशत बच्चे अधिक वजन वाले हैं, यानी इनका बीएमआई (बॉडी मॉस इंडेक्स) सामान्य से ज्यादा है। इनमें भी एक फीसद बच्चों का बीएमआई सामान्य से दो स्टैंडर्ड ज्यादा है। पांच से नौ वर्ष के बच्चों में ज्यादा वजन वाले बच्चे गोवा और नागालैंड में हैं। सबसे कम वजन के मामले में झारखंड और बिहार आगे है। इन दोनों राज्यों में एक प्रतिशत से भी कम बच्चे ज्यादा वजन के हैं। बच्चों का वजन कम या ज्यादा होना घरों की आर्थिक और सामाजिक हालात पर निर्भर करता है। वहीं, गरीब परिवारों के केवल एक प्रतिशत बच्चे अधिक वजन वाले हैं, जबकि अमीर परिवारों में नौ प्रतिशत बच्चे ज्यादा वजन के हैं। रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में अधिक बच्चे मोटापे से पीडि़त हैं। शहरी क्षेत्रों में पांच से नौ आयु वर्ष के 7.5 प्रतिशत बच्चे ज्यादा वजन के हैं, जबकि, ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 2.6 फीसद का है। इसी तरह शहरी क्षेत्रों के दस से उन्नीस साल के 9.7 प्रतिशत किशोर ज्यादा वजन के हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 3.2 प्रतिशत का है।
– धर्मवीर रत्नावत