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‘लाल’ क्यों बेहाल?

हरियाणा के चुनाव को लेकर एक चुटकुला ज़ोरों पर है कि हरियाणा चुनाव ने सबको खुश कर दिया। चाचा खुश है कि परिवार की राजनीतिक दुकानदारी एक तरफ से ना सही दूसरी तरफ से चल निकली है। भतीजा खुश है कि सीट भले ही सिर्फ दस आईं, उप-मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई। अशोक तंवर खुश हैं, कि भूपिंदर हुड्डा सीएम नहीं बन पाए। हुड्डा जी खुश कि मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई में बीजेपी 75 पार का अरमान पूरा नहीं कर पाई। खट्टर खुश कि सरकार में रह कर जीना मुश्किल करने वाले कई हार गए। चुनाव आयोग खुश कि कम से कम ईवीएम के सिर किसी ने ठीकरा नहीं फोड़ा।
कुछ साल पहले तक हरियाणा की राजनीति में लाल नाम का बोलबाला था। प्रदेश की पूरी राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमा करती थी। लेकिन अब ये लाल राज्य में बेहाल है। हालिया विधानसभा चुनाव में हरियाणा के तीन लाल यानी बंसीलाल, देवीलाल और भजनलाल के राजनीतिक वारिसों की परीक्षा थी। लेकिन इस चुनाव में चौधरी देवीलाल के खून दुष्यंत चौटाला ने लाज बचाई है। लेकिन बाकी बेहाल हैं। 1966 में अस्तित्व में आने के बाद से ही हरियाणा की राजनीति मुख्यत: इन तीन परिवारों के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है। लेकिन इस बार स्थिति बदली सी नजऱ आती है। प्रदेश की राजनीति के सिरमौर रह चुके ये परिवार आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं।
चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे बंसीलाल ने अपने बड़े बेटे रणबीर सिंह महिंद्रा के बजाय छोटे बेटे सुरेंद्र सिंह को अपना राजनीतिक वारिस चुना था। दो बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सांसद रहने के बाद सुरेंद्र सिंह 2005 में प्रदेश की भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार मंत्री चुने गए। लेकिन इसके कुछ ही हफ्ते बाद उनका निधन हो गया। बंसीलाल पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विश्वस्त थे और इसलिए भी सुरेंद्र सिंह को अपने कथित तानाशाही रवैये की वजह से हरियाणा का संजय गांधी कहा जाता था। इत्तेफाकन संजय गांधी की भी मृत्यु एक विमान दुर्घटना में ही हुई थी और सुरेंद्र सिंह का भी निधन एक हेलीकॉप्टर क्रैश में ही हुआ।
सुरेंद्र सिंह के बाद उनकी पत्नी किरण चौधरी सूबे की राजनीति में उतरीं। इससे पहले वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय थीं। किरण चौधरी 2014 में तीसरी बार विधायक बनने में तो सफल रहीं, लेकिन वह मुकाम हासिल करने में नाकाम मानी जाती हैं जहां से मुख्यमंत्री पद की दावेदारी बन सके। हालांकि अपने इस कार्यकाल में विधायक दल की नेता बनाए जाने की वजह से किरण चौधरी को लेकर बड़ी संभावनाएं जताई जाने लगी थीं। राष्ट्रीय कांग्रेस की बागडोर राहुल गांधी और प्रदेश कांग्रेस की कमान अशोक तंवर के हाथ में आने से भी किरण को फायदा ही हुआ। लेकिन हाल ही में भूपेंद्र सिंह हुड्डा को विधायक दल का नेता बनाकर कांग्रेस हाईकमान ने चौधरी को बड़ा झटका दिया है।
सार्वजनिक जीवन में किरण चौधरी बंसीलाल की राजनीतिक वारिस मानी जाती हैं। लेकिन हरियाणा कांग्रेस के एक पदाधिकारी की मानें तो बंसीलाल और किरण चौधरी की आपस में कभी नहीं बनी। कहा जाता है कि एक बार बंसीलाल ने अपने दौरे से जुड़ी जानकारी पूछने पर एक पत्रकार को जवाब दिया-अगर किरण भिवानी में होंगी तो मैं दिल्ली में मिलूंगा और अगर वे दिल्ली में होंगी तो मुझसे भिवानी आकर मिल लेना। ऐसी ही घटनाओं के आधार पर माना जाता है कि कि सुरेंद्र सिंह की मौत के बाद बंसीलाल और उनके करीबी नेताओं ने सूबे में किरण चौधरी के पैर जमवाने में कोई खास मदद नहीं की। कुछ ये कयास भी लगाते हैं कि यदि बंसीलाल ने किरण चौधरी को सहारा दिया होता तो हरियाणा में उनका राजनीतिक वजूद ज्यादा बड़ा हो सकता था।
परिवार के अन्य सदस्यों की बात करें तो 2009 के लोकसभा चुनाव में किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी भी मैदान में उतरीं और जीत हासिल करने में सफल रहीं। लेकिन उसके बाद हुए दोनों आम चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा है। वहीं, रणबीर सिंह महिंद्रा बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष और विधायक रह चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद वे सूबे के राजनीतिक गलियारों में कोई खास जगह नहीं बना पाए हैं। बल्कि पिछले दो विधानसभा चुनाव लगातार हारने की वजह से उनका राजनीतिक भविष्य आज बड़े ख़तरे में दिख रहा है। 2014 के विधानसभा चुनाव में सिंह के सामने बंसीलाल की दूसरी बेटी सुमित्रा देवी ने ताल ठोकी थी और दोनों ही हार गए। जानकारों के मुताबिक हरियाणा में बंसीलाल परिवार का प्रभाव 1996 से ही घटने लगा था जब उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी से अदावत के चलते कांग्रेस छोड़कर हरियाणा विकास पार्टी का गठन किया था। इसके बाद वे भारतीय जनता पार्टी की मदद से चौथी और आखिरी बार हरियाणा के मुख्यमंत्री बनने में सफल तो रहे, लेकिन भाजपा ने जल्द ही उनसे समर्थन वापिस ले लिया। तब बंसीलाल ने एक बार फिर कांग्रेस का हाथ थामा, लेकिन यह साथ ज्यादा दिन नहीं चला। इसके बाद से ही बंसीलाल के राजनीतिक सितारे गर्दिश में रहे। रही-सही कसर सुरेंद्र सिंह के निधन और परिवार की आपसी तनातनी ने पूरी कर दी।
ताऊ देवीलाल की तुलना में बंसीलाल के परिवार की कमजोर पकड़ को लेकर राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि ‘बंसीलाल ने विकास पुरुष की भूमिका तो अच्छे से निभाई लेकिन अपने अक्खड़ स्वभाव के चलते वे कभी जनता से नहीं जुड़ पाए। इस बात का नुकसान न सिर्फ उन्हें बल्कि उनके राजनीतिक वारिसों को भी उठाना पड़ा है।Ó नौ बार विधायक और तीन बार मुख्यमंत्री रहे भजनलाल के हाथ में प्रदेश की कमान करीब 11 साल रही। भजनलाल सबसे पहले 1980 में सुर्खियों में आए जब उन्होंने जनता पार्टी से चुनाव लड़ा और मुख्यमंत्री बनते ही कांग्रेस का हाथ थाम लिया। लेकिन 2005 में अपनी जगह भूपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री बनाए जाने की वजह से भजनलाल का मन कांग्रेस से खट्टा हो गया। यह चुनाव भजनलाल के ही नेतृत्व में लड़ा और जीता गया था। नतीजतन भजनलाल ने 2007 में कांग्रेस छोड़कर हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजका) की स्थापना की। जानकारों के मुताबिक बंसीलाल और भजनलाल में दो समानताएं थीं। एक तो यह कि जोड़-तोड़कर सरकार बनाने में माहिर भजनलाल भी ख़ुद को जननेता के तौर पर स्थापित नहीं कर पाए। और दूसरी यह कि बंसीलाल की ही तरह भजनलाल ने भी अपने बड़े बेटे चंद्रमोहन के बजाय छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई को अपने ज्यादा करीब रखा।
दो बार सांसद और तीन बार विधायक रहे कुलदीप बिश्नोई इस बार आदमपुर सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी हैं। 2009 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में हजका के छह विधायक जीतने के बाद बिश्नोई का कद हरियाणा में अचानक से बढ़ गया था और वे खुद को भविष्य के मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने लगे थे। लेकिन उनके पांच विधायकों ने कांग्रेस में शामिल होकर उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इसके बाद 2014 के विधानसभा चुनाव में हरियाणा जनहित कांग्रेस की झोली में सिर्फ दो सीटें ही आईं और 2016 आते-आते हालात ऐसे बने कि हजका का कांग्रेस में विलय हो गया। जानकारों का कहना है कि कुलदीप विश्नोई का प्रभाव लगातार घटने के पीछे उनका अपना व्यवहार प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहा है। पिता भजनलाल से उलट विश्नोई अपने समर्थकों से मिलना-जुलना कम ही पसंद करते हैं। साथ ही वे एक चुनाव जीतने के बाद दूसरे चुनाव तक अपने क्षेत्र से दूर रहने के लिए भी जाने जाते हैं। कुलदीप विश्नोई के बेटे भव्य विश्नोई ने भी 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना भाग्य आजमाया था। लेकिन वे अपनी जमानत तक बचा पाने में नाकाम रहे।

चंद्रमोहन के कारण भजनलाल की साख गिरी
2005 में कांग्रेस ने भजनलाल को मुख्यमंत्री न बनाने की एवज़ में उनके बेटे चंद्रमोहन को उपमुख्यमंत्री बनाया गया। उपमुख्यमंत्री रहते हुए चंद्रमोहन और प्रदेश की पूर्व एडवोकेट जनरल अनुराधा बाली का प्रेम प्रंसग पूरे हरियाणा में चर्चा का विषय बन चुका था। जबकि चंद्रमोहन पहले से शादीशुदा थे। ख़बर यह भी उड़ी कि कांग्रेस में ही भजनलाल के प्रतिद्वंदी नेताओं के हाथ बाली के उन बयानों की सीडी लग गई थी जिनमें उन्होंने चंद्रमोहन पर ज्यादती के आरोप लगाए थे। इसके बाद चंद्रमोहन ने इस्लाम अपना लिया और पहली पत्नी को तलाक दिए बिना ही अनुराधा बाली से निकाह कर लिया। लेकिन कुछ वर्षों बाद बाली की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ चंद्रमोहन बल्कि पूरे भजनलाल परिवार की छवि पर बट्टा लगाया था।
दुष्यंत ने जगाई आस
हरियाणा के मुख्यमंत्री और एक बार उप प्रधानमंत्री रहे ताऊ देवीलाल की पहचान जननेता के तौर पर स्थापित है। उनकी राजनीतिक विरासत उनके बड़े बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने संभाली। हालांकि उन्होंने अपनी विरासत अपने छोटे बेटे अभय चौटाला को सौंपी। पिछले एक दशक से चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) प्रदेश में प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका निभा रही थी। लेकिन चौटाला परिवार में दो फाड़ होने की वजह से इनेलो हाशिए पर जाती दिखी है। परिवार की अंदरूनी कलह सार्वजनिक तौर पर बीते साल तब सामने आई जब भर्ती घोटाले में 10 साल के लिए जेल में बंद ओमप्रकाश चौटाला कुछ समय के लिए बाहर आए थे। तब उन्होंने पहले पार्टी सांसद और अपने पोतों दुष्यंत और दिग्विजय चौटाला और फिर अपने बड़े बेटे अजय चौटाला को पार्टी से निकाल दिया। अजय चौटाला ने इसके बाद जनता जननायक पार्टी (जजपा) बना ली। ओमप्रकाश चौटाला के साथ उनके छोटे बेटे अभय चौटाला हैं। जब ओमप्रकाश चौटाला राजनीति में पूरी तरह सक्रिय थे और उनके साथ उनके दोनों बेटे भी सक्रिय होने लगे थे तब से ही उनके परिवार में इस बात को लेकर सहमति थी कि अजय चौटाला केंद्र की राजनीति करेंगे और अभय चौटाला प्रदेश की। लेकिन अजय चौटाला के जेल जाने के बाद जब उनके पुत्र दुष्यंत चौटाला ने मोर्चा संभाला है। इस चुनाव में नई पार्टी बनाकर दुष्यंत भाजपा के साथ सरकार में शामिल हो गए हैं। इससे उनका राजनीतिक भविष्य उज्जवल नजर आ रहा है।
– दिल्ली से रेणु आगाल