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‘त्रिशंकु’ खुशी

5 माह पहले लोकसभा चुनाव में रिकार्ड जीत के साथ भाजपा ने केंद्र में सरकार बनाई, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा के उपचुनाव ने पार्टी को बड़ा झटका दिया है। खासकर हरियाणा का चुनाव परिणाम भाजपा के लिए निराशाजनक रहा। यह भाजपा के लिए खतरे का संकेत भी है।
बेशक बीजेपी महाराष्ट्र के साथ-साथ हरियाणा में भी सरकार बनाने जा रही है। शक इस बात को लेकर भी नहीं है कि लोगों के सामने बीजेपी के मुकाबले कोई विकल्प खड़ा नजर आ रहा है – लेकिन रवैया बदला नहीं तो नतीजे नहीं बदलने वाले। राजनीति में सबसे बड़े सबक चुनावों में ही मिलते हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव नतीजों में सबक बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए है। बीजेपी के लिए विशेष रूप से क्योंकि जल्द ही उसे दिल्ली, बिहार और झारखंड चुनावों में भी हाथ आजमाने हैं। आम चुनाव के ही तेवर को आगे बढ़ाते हुए बीजेपी ने राष्ट्रवाद का मुद्दा आगे बढ़ाया और आखिर तक टिकी रही। ये तो नहीं कहा जा सकता कि लोगों ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया, लेकिन इतना जरूर है कि ये बार बार नहीं चलने वाला। रही बाद तोड़-फोड़ वाली राजनीति की तो इसमें भी मामला 50-50 ही रहने वाला है – महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे मिसाल हैं।
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के नतीजे बीजेपी नेतृत्व के लिए कई मामलों में अलर्ट हैं – खास तौर पर इसलिए भी क्योंकि जल्द ही बीजेपी अगले विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज करने वाली है। तेज तैयारी, इसलिए क्योंकि नई बीजेपी पूरे साल चुनावी तैयारी कर रही होती है। 2014 में बीजेपी का विजय अभियान आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और आधा जम्मू-कश्मीर तक जारी रहा, लेकिन इस बार उसमें रोड़े खड़े हो गए हैं। झारखंड में चुनाव अभी कराए नहीं गए हैं और जम्मू-कश्मीर में हालात माकूल नहीं बताए जा रहे हैं। हालांकि, विधानसभा चुनाव के नतीजों के दिन 24 अक्टूबर को ही जम्मू-कश्मीर में ब्लॉकों के चुनाव कराए गए हैं। नतीजे भी आ चुके हैं और वे बीजेपी के लिए जरा भी उत्साहजनक नहीं हैं।
पांच साल पहले बीजेपी को दिल्ली विधानसभा चुनाव से झटके लगने शुरू हुए थे, लेकिन इस बार पहले ही शुरू हो गए हैं। चुनावी पैटर्न पहले जैसा ही रहा है, मोदी लहर के साथ ही बीजेपी पिछली बार विधानसभा चुनावों में भी उतरी थी। फर्क सिर्फ इतना रहा कि इस बार बीजेपी के पास मुख्यमंत्री के चेहरे थे, पिछली बार ऐसे चेहरे कांग्रेस के पास थे।
झारखंड चुनाव: अव्वल तो झारखंड में भी महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ ही चुनाव होने वाले थे, लेकिन आम आदमी पार्टी का कयास है कि उसे दिल्ली के साथ कराया जा सकता है। बिहार का नंबर उसके बाद आता है। 2015 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को दिल्ली और बिहार दोनों में ही हार का मुंह देखना पड़ा था। अब तक तो यही सुनने में आया है कि झारखंड में भी क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी फैक्टर खड़ा हुआ है। ऐसे में बीजेपी ने अगर राष्ट्रवाद के सहारे एक बार फिर स्थानीय समस्याओं से ध्यान बंटाने की कोशिश की तो नतीजे उलटे पड़ेंगे इसमें शक की कम ही गुंजाइश है। ये बात अलग है कि हरियाणा में बहुमत से चूक जाने के बावजूद बीजेपी वोटों की हिस्सेदारी में 3 फीसदी का इजाफा और सबसे बड़ी पार्टी बने रहने को भी बड़ी उपलब्धि बता रही है। ये भी ठीक है कि वो निर्दलियों की मदद से सरकार बनाने में कामयाब हो रही है-लेकिन ये भी ध्यान रहे एक ही जुगाड़ हर बार काम नहीं करता।
दिल्ली चुनाव: दिल्ली में बीजेपी के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती नजर आ रही है। इसलिए नहीं कि वो पिछली बार हार गई थी, बल्कि इसलिए क्योंकि दिल्ली बीजेपी में अब भी बहुत कुछ बदला नहीं है। गुटबाजी जहां की तहां ही है। आम चुनावों में इसलिए ज्यादा महसूस नहीं हुआ क्योंकि तब हर तरह सर्जिकल स्ट्राइक और मोदी-मोदी वाला माहौल रहा। दिल्ली में आप के तीसरे स्थान पर खिसक जाने से भी बीजेपी को बहुत निश्चिंत रहने की जरूरत नहीं है। आम चुनाव के नतीजों ने अरविंद केजरीवाल को भूल सुधार का मौका मुहैया करा दिया और तभी से वो नए सिरे से चुनावी तैयारियों में जुट चुके हैं। आम आदमी पार्टी ने अपनी रणनीतियों में भी काफी बदलाव किया है-मोदी सरकार पर निजी हमलों की जगह उम्मीद भरी तारीफें होने लगी हैं और केंद्र के कदमों पर बड़ी ही नपी तुली प्रतिक्रिया आ रही है। दिल्ली की अवैध कालोनियों को नियमित करने के मोदी सरकार के फैसले पर आप की प्रतिक्रिया से इसे समझा जा सकता है।
बिहार चुनाव: आम चुनाव में तो बिहार में भी राष्ट्रवाद, पाकिस्तान और सर्जिकल स्ट्राइक से काम चल गया, लेकिन उसके बाद चमकी बुखार और बाढ़ से बेहाल बिहार के लोग नेताओं का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। ऐसा भी संभव नहीं है कि बीजेपी सारी जिम्मेदारियां मुख्यमंत्री के कंधे पर थोप कर पल्ला झाड़ लेगी-क्योंकि चुनाव में एनडीए का चेहरा तो नीतीश कुमार ही होंगे। बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजों को बीजेपी और जेडीयू चाहें तो एक अच्छे फीडबैक के तौर पर ले सकते हैं। समस्तीपुर लोकसभा सीट तो पासवान परिवार की थी और बनी हुई है। पहले रामविलास पासवान के भाई सांसद रहे, अब उनके भतीजे प्रिंस सांसद बन गए हैं। बड़ी बात ये है कि पांच विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में एनडीए के हिस्से में सिर्फ एक सीट आई है-और आम चुनाव में खाता भी नहीं खोल पायी आरजेडी ने दो सीटें जीत ली हैं।
ये तो कतई नहीं कहा जा सकता कि लोगों ने बीजेपी के राष्ट्रवाद के मुद्दे को खारिज कर दिया है। कम से कम नतीजों से तो ऐसा बिलकुल नहीं लगता। हां, नतीजे ही ये भी बता रहे हैं कि राष्ट्रवाद, धारा 370 या पाकिस्तान जैसे मुद्दे चुनावी थाली का जायका बढ़ा सकते हैं, लेकिन उसमें मूल तत्व बेहद जरूरी हैं और उन्हें नजरअंदाज करने का खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा – ये तय है।
लोकसभा चुनाव में जनता पीएम के चेहरे पर वोट डालती है, जबकि विधानसभा चुनाव में ये देखती है कि उनका नेता, उनका मुख्यमंत्री उम्मीदवार कौन है। तभी तो, जिस भाजपा को लोकसभा में हरियाणा में 58.2 फीसदी वोट मिले थे, अब वह महज 36.2 फीसदी रह गए हैं। यानी करीब 22 फीसदी की गिरावट। वैसे हरियाणा में पिछली बार ऐसी गिरावट नहीं दिखी थी, लेकिन इस बार दिखी है। 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 35-40 फीसदी वोट मिले थे और विधानसभा में भी स्थिति वही रही। 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर ऐसी बढ़ी कि करीब 55-60 फीसदी लोगों ने भाजपा को वोट दिया और राज्य की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा जीती। हालांकि, 2019 के विधानसभा चुनाव में फिर से भाजपा 35-40 फीसदी वोट पर आकर टिक गई है, जो स्थिति पिछली बार थी। यानी जनता का मूड महज 5 महीनों में बदल गया।
पब्लिक पॉलिसी थिंक टैंक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट ने एक स्टडी की है, जिससे ये बात साफ हुई है कि अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराए गए तो अधिकतर वोटर दोनों ही चुनावों में एक जैसा बर्ताव करते हैं। इसके लिए 1999, 2004, 2009 और 2014 के आंकड़ों को आधार बनाया गया है। इसके अनुसार ये साफ होता है कि अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं तो औसतन 77 फीसदी बार ऐसा होता है कि लोग दोनों ही चुनावों में एक ही पार्टी को वोट देते हैं। ये बात एक अन्य स्टडी से भी साफ हुई है, जिसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट, अहमदाबाद के पूर्व प्रोफेसर, डीन और डायरेक्टर इंचार्ज जगदीप छोकर और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, दिल्ली के डायरेक्टर संजय कुमार ने किया है। छोकर और कुमार ने 1989 से लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने वाले 31 मौकों का विश्लेषण किया और पाया कि इनमें से 24 बार एक ही पार्टी को दोनों चुनावों में करीब बराबर वोट मिले। सिर्फ 7 मौके ही ऐसे थे, जब ये ट्रेंड देखने को नहीं मिला।
जनता को राहुल-सोनिया से मतलब नहीं !
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के रूझानों को देखें तो एक बात साफ होती है कि राहुल-सोनिया की ना के बराबर कोशिश के बावजूद लोगों ने कांग्रेस को वोट दिए हैं। यानी जनता ने साफ कर दिया है उन्हें न तो राहुल गांधी से कोई मतलब है, ना ही सोनिया गांधी से। हां, कांग्रेस का स्थानीय नेता अगर काबिल है तो जनता उसे वोट देने के लिए तैयार दिख रही है। तभी तो भूपेंद्र सिंह हुडा को जनता ने वोट दिए। अब अगर हरियाणा में कांग्रेस की सरकार बनती है तो इसका पूरा श्रेय भूपेंद्र सिंह हुडा को जाएगा, ना कि राहुल-सोनिया को। राहुल गांधी और सोनिया गांधी से लोगों को मोह यूं ही नहीं भंग हुआ, बल्कि इसके लिए वो खुद ही जिम्मेदार हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष थे। पार्टी चुनाव क्या हारी, राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा सौंप दिया। बाकी नेताओं ने लाख मनाने की कोशिश की, लेकिन नहीं माने। थक-हार कर खुद सोनिया गांधी ने अंतरिम अध्यक्ष बनने की ठान ली, लेकिन किसी दूसरे नेता को पार्टी की कमान नहीं सौंपी। पार्टी के अंदर जिस तरह का कलह चल रहा है, वह जनता को दिख रहा है और जनता समझ भी रही है कि ये सब राहुल गांधी और सोनिया गांधी की नाकामी है।
निराशाजनक चुनाव
हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव सब बोरिंग लग रहा था। न तो कैंपेन में आक्रामता दिख रही थी, ना ही जनता में कोई उत्साह नजर आ रहा था। चुनाव के दिन 21 अक्टूबर को भी वोटिंग में रिकॉर्ड गिरावट दिखी। हरियाणा में तो 19 सालों में सबसे कम वोटिंग हुई और महाराष्ट्र में करीब 9 सालों में सबसे कम वोटिंग दर्ज की गई। लेकिन 24 अक्टूबर को जब मतगणना शुरू हुई तो अचानक ही ये चुनाव दिलचस्प हो गए। महाराष्ट्र की तस्वीर तो फिर भी कुछ देर में साफ हो गई, लेकिन हरियाणा में त्रिशंकु विधानसभा बन गई, जिसके बाद इस चुनाव एक अलग ही मोड़ ले लिया। सोशल मीडिया पर लोगों ने बहस करना शुरू कर दिया। बहस इस बात की कि सरकार किसकी बनेगी? क्या फॉर्मूले हो सकते है? साथ तमाम तरह के उदाहरण और रिकॉर्ड भी शेयर किए जाने लगे। इस पर चर्चा शुरू हो गई कि लोकसभा चुनाव और विधानसभा चुनाव को जनता अलग-अलग चश्मों से देखती है। तो क्या वाकई ऐसा है?
तोड़-फोड़ में चांस 50-50 ही है
चुनावों के समय बीजेपी दूसरे दलों के नेताओं को बड़ी तेजी से तोड़ कर लाती रही है और बदले में उन्हें ओहदे भी गिफ्ट करती रही है – लेकिन ये हर जगह नहीं चलता। सतारा का नतीजा सबसे बड़ा उदाहरण है। वैसे महाराष्ट्र में ऐसे 19 उम्मीदवार चुनाव हार गए हैं। अमित शाह अब भी बीजेपी अध्यक्ष हैं, लेकिन गृह मंत्री होने के चलते उनके हिस्से के 24 घंटे का एक बड़ा भाग सरकारी कामकाज में देना पड़ता है। कहने को तो जेपी नड्डा कार्यकारी अध्यक्ष बनाये गये हैं, लेकिन बड़े फैसले तो वो ले नहीं सकते। वैसे भी अमित शाह के लिए कोई छोटा फैसला भी नहीं होता। कहीं ये डबल रोल बीजेपी को भारी तो नहीं पडऩे लगा है?
– इन्द्र कुमार