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ये जानलेवा प्रदूषण

भारत एक प्रकृति पूजक राष्ट्र है। लेकिन आधुनिकता के रथ पर सवार होकर हम न केवल प्रकृति का दोहन कर रहे हैं, बल्कि प्रदूषण भी फैला रहे हैं। इसका परिणाम हमें ही भुगतना पड़ रहा है। आज आलम यह है कि प्रदूषण की वजह से देश में हर मिनट 2 लोगों की मौत हो रही है। लेकिन हम इससे सबक न लेते हुए लगातार प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। खासकर दिवाली के समय देशभर का वायु प्रदूषण जानलेवा स्तर तक पहुंच जाता है।
भारत में जल, जमीन, आकाश और पाताल चारों जगह प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। प्रदूषण के कारण देश की आबादी विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रही है। खासकर वायु प्रदूषण तो सबसे अधिक जानलेवा साबित हो रहा है। विभिन्न रिपोट्र्स की चेतावनी के बाद भी हम चेतने को तैयार नहीं है। इसका प्रभाव यह हो रहा है कि देश में हर साल 10 लाख से ज्यादा लोग वायु प्रदूषण की वजह से मारे जाते हैं। मेडिकल जर्नल द लैंसेट द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की सबसे प्रदूषित जगह भारत में ही हैं। इसके बाद भी हम दीपावली पर जहरीली गैस वाले पटाखों को जलाने की प्रतियोगिता में जुट जाते हैं। इस बार भी दीपावली पर देशभर में कोई आतिशबाजी के कारण देश की राजधानी दिल्ली सहित कई शहरों की हवा दम घोटू साबित हुई। हालांकि पिछले वर्षों की अपेक्षा इस बार लोगों ने थोड़ी जागरूकता दिखाई और ग्रीन पटाखे फोड़े। इसका असर यह हुआ कि पिछले वर्ष की अपेक्षा एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) कम रहा। फिर भी प्रदूषण खतरनाक स्तर पर रहा।
दम घोटू हुई हवा
इस बार दीपावली से पूर्व देश के प्रदूषित शहरों का एक्यूआई संतोषजनक स्तर पर रहा। लेकिन दीपावली के दिन एक्यूआई खतरनाक स्तर पर पहुंच गया। दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, मुरादाबाद, फरीदाबाद, कानपुर, लखनऊ, पटना, रांची जैसे कई शहरों की हवा पटाखों से हुए प्रदूषण के कारण दम घोटू साबित हुई। दिल्ली का एक्यूआई रात को 500 और सुबह 396 रहा। वहीं देश में दूसरे स्थान पर मुरादाबाद रहा, जहां का एक्यूआई 398 रहा। गौरतलब है कि शून्य से 50 के बीच के एक्यूआई को ‘अच्छाÓ, 51 से 100 को ‘संतोषजनकÓ, 101 से 200 को ‘मध्यमÓ, 201 से 300 को ‘खराबÓ, 301 से 400 को ‘बहुत खराबÓ और 401 से 500 को ‘गंभीरÓ और 500 से ऊपर को अति गंभीर आपात स्थिति की श्रेणी में रखा जाता है। दिवाली से पहले वेस्ट यूपी, दिल्ली-एनसीआर में एक्यूआई जहां 300 से कम चल रहा था, वहीं दिवाली के बाद यह चरम पर पहुंच गया है। गाजियाबाद का एक्यूआई 396, नोएडा का 397 ग्रेटर नोएडा का 375, गुरुग्राम का 372, मुरादाबाद का 398 व मेरठ का एक्यूआई 352 रहा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वैज्ञानिकों ने इसे सेहत के लिए खतरनाक माना।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि दिल्ली-एनसीआर के आसपास दीपावली बीतने के बाद भी एक्यूआई खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यही नहीं अमृतसर, जालंधर, पटियाला, कैथल, जिंद, पानीपत, मेरठ, गंगानगर आदि कई ऐसे शहर हैं, जहां का एक्यूआई खतरनाक स्तर पर है। वायु प्रदूषण अर्थात हवा में ऐसे अवांछित गैसों, धूल के कणों आदि की उपस्थिति, जो लोगों तथा प्रकृति दोनों के लिए खतरे का कारण बन जाए। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रदूषण अर्थात दूषित होना या गन्दा होना। वायु का अवांछित रूप से गंदा होना अर्थात वायु प्रदूषण है। वायु प्रदूषण हानिकारक तरल बूंदों, ठोस पदार्थों और विषाक्त गैसों (कार्बन ऑक्साइड, हलोगेनटेड और गैर-हलोगेनटेड हाईड्रोकार्बन, नाइट्रोजन और सल्फर गैसें, अकार्बनिक पदार्थ, अकार्बनिक और कार्बनिक अम्ल, बैक्टीरिया, वायरस, कीटनाशक आदि) का मिश्रण है, जो सामान्यत: ताजी हवा में नहीं पाए जाते और पेड़-पौधों और पशुओं के जीवन के लिए बहुत खतरनाक है। प्रदूषण की दर इंसान के अधिक पैसे कमाने के स्वार्थ और कुछ अनावश्यक इच्छाओं को पूरा करने की वजह से बढ़ रही है। आधुनिक युग में जहां तकनीकी उन्नति को अधिक प्राथमिकता दी जाती है वहां हर व्यक्ति जीवन का असली अनुशासन भूल गया है।
सिर्फ पटाखे नहीं प्रदूषण की वजह
पिछले साल दीपावली के नजदीक सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि या तो हरित पटाखे छोड़े जाएं या फिर त्योहारों के मौके पर शाम 8 से 10 तक ही पटाखे चलाए जाएं। इसके बाद मार्च, 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट देश भर में पटाखों के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के लिए दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें दलील दी गई थी कि इनकी वजह से प्रदूषण बढ़ता है तो अदालत ने कहा था कि लोग पटाखों के पीछे क्यों पड़े हैं जबकि इनसे ज्यादा प्रदूषण तो वाहनों और तमाम उद्योगों से होता है। जैसे कि शहरों की बात करें तो वहां होने वाले वायु प्रदूषण के लिए कारें ज्यादा जिम्मेदार हैं।
इसी परिप्रेक्ष्य में अदालत ने पटाखों और ऑटोमोबाइल से होने वाले प्रदूषण के बीच तुलनात्मक अध्ययन की बात कह कर एक ऐसी विसंगति पर अंगुली रखी थी जो देश में एक ओर रोजगार तो दूसरी तरफ प्रदूषण के मारक असर की चिंता से जुड़ी है। पटाखों पर बैन के कारण इस उद्योग से जुड़े रोजगार के खात्मे की आशंका के तहत अदालत की चिंता यह थी कि कहीं इस उपाय से देश में बेरोजगारी न बढ़ जाए। इसलिए प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखों को जिम्मेदार मानकर उसके असली कारकों की अनदेखी घातक सिद्ध हो सकती है। सवाल है कि अगर पटाखे शहरों में वायु प्रदूषण की मुख्य वजह नहीं हैं तो क्या कार आदि वाहनों और उद्योग-धंधों से निकलने वाला जहरीला धुआं ही प्रदूषण का असली कारण है?
वाहन एवं उद्योग भी
ऐसे कई अध्ययन हुए हैं, जो साबित करते हैं कि दिखावे के पटाखे और खेतों में जलाई जाने वाली पराली (कृषि अवशेष) के अलावा कार के रूप में संपन्नता ने असल में हवा को जहर बनाने में ज्यादा योगदान दिया है। वर्ष 2019 की शुरुआत में सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने एक रिपोर्ट में बताया था कि आबोहवा खराब करने की वजहों में 61 प्रतिशत हिस्सेदारी वाहनों और इंडस्ट्री से होने वाले प्रदूषण की है। उस रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर में ही कार जैसे वाहनों की वजह से 39 प्रतिशत और इंडस्ट्री के कारण 22 प्रतिशत प्रदूषण हो रहा है। इनके अलावा धूल से 18 प्रतिशक प्रदूषण फैल रहा है। देश की राजधानी दिल्ली में निजी वाहनों की संख्या फिलवक्त सवा करोड़ से ऊपर है। यह संख्या सालाना करीब 10 लाख की दर से बढ़ रही है।
उल्लेखनीय यह है कि निजी वाहनों में सबसे बड़ी संख्या कारों की है जिसका उपभोक्ता शहरी मध्यवर्ग है। दिल्ली सरकार ने बताया था कि देश की राजधानी में वर्ष 2015 में साढ़े 6 हजार लोगों की मौत सांस संबंधी बीमारियों की वजह से हुई जिसके लिए यहां की प्रदूषित हवा सीधे तौर पर जिम्मेदार है। वैसे तो सम-विषम फॉर्मूला अपना कर, कार-फ्री डे का आयोजन करके और 15 साल से ज्यादा पुराने वाहनों को सख्ती के साथ सड़कों से हटाने जैसे उपाय यहां की सरकार कर चुकी है। इस साल एक बार फिर 4 नवंबर से यही व्यवस्था दिल्ली में लागू होने जा रही है, लेकिन जिस तरह से लोग कारों के पीछे भाग रहे हैं, उसके कारण ट्रैफिक जाम और स्मॉग (जहरीली धुंध) की समस्याएं यहां की सतत नियति बन चुकी हैं।
आकाल मौत का कारण
कारों की बढ़ती संख्या दो अहम सवाल खड़े करती है? पहला यह कि आखिर क्यों लोग अपनी पूंजी ऐसी मद में खर्च करते हैं जो आगे चलकर उन्हीं की जिंदगी हलकान करती है? और दूसरा यह कि कारों पर लगाम लगाने में सरकारें नाकाम क्यों हो रही हैं? मसला अकेले दिल्ली-मुंबई का नहीं है। कानपुर, इंदौर, लुधियाना, अहमदाबाद समेत ज्यादातर उत्तर-मध्य भारतीय शहरों में ट्रैफिक जाम और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण ने लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल कर दिया है। चूंकि वाहनों की संख्या बढ़ रही है इसलिए हवा में बढ़ता प्रदूषण लोगों में सांस की बीमारियां पैदा कर रहा है। इसके कारण आम लोगों की जिंदगी औसतन तीन साल तक कम हो रही है।
कुछ ही समय पहले इस बारे में एक अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अर्थशास्त्रियों ने किया। उनके अध्ययन से पता चला कि हमारे देश के करीब 66 करोड़ लोग उन क्षेत्रों में रहते हैं जहां की हवा में मौजूद सूक्ष्म कण पदार्थों (पार्टिकुलेट मैटर) का प्रदूषण सुरक्षित मानकों से ऊपर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) हाल के एक सर्वे में यह भी बता चुका है कि दुनिया के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में से पांच शहर भारत में हैं। डब्ल्यूएचओ ने यह भी कहा था कि वायु प्रदूषण भारत में अकाल मौतों की प्रमुख वजहों में से एक है। इससे संबंधित बीमारियों की वजह से हर साल छह लाख बीस हजार लोगों की मौतें भारत में होती हैं।
सार्वजनिक परिवहन की सीमा
कार पर पूंजी लगाने वालों की मजबूरी यह है कि महंगी होती प्रॉपर्टी और आबादी के दबाव के मद्देनजर उन्होंने जिन उपनगरीय इलाकों में निवास को प्राथमिकता दी है, वहां से कार्यस्थल तक आना-जाना आसान नहीं है। दिल्ली से बाहर मेट्रो का इतना विस्तार नहीं हुआ है कि सभी लोग आसानी से दिल्ली पहुंच सकें। अन्य शहरों में तो अभी मेट्रो की शुरुआत ही हो रही है। मेट्रो की अपनी सीमाएं भी हैं, वह बस-कार की तरह शहर के हर कोने तक नहीं पहुंच सकता है। दिल्ली-एनसीआर में तो लोग मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए भी कारों का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि उन्हें इस वास्ते फीडर बसों का विकल्प नहीं मिल पाता है।
मेट्रो के बरक्स पब्लिक ट्रांसपोर्ट के रूप में बसें लोगों को ऐसी सहूलियत मुहैया नहीं करा पा रही हैं कि वे कार खरीद को तिलांजलि दे सकें। सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीआरआरआई) के प्रमुख साइंटिस्ट डॉ. एस वेलमुरगन के मुताबिक दिल्ली में 6,088 बसों के बेड़े में से औसतन 3,850 बसें ही रोजाना सड़कों पर निकल पाती हैं जो जरूरत के मुकाबले नाकाफी हैं। ऐसे में लोगों को खुद का वाहन एक सुविधाजनक विकल्प लगता है। हालांकि इसके पीछे सोशल स्टेटस भी एक बड़ी वजह है। कई बार लोग जरूरी नहीं होने पर भी कार खरीदते हैं और इसके लिए तरह-तरह की आपातकालीन जरूरतों का हवाला देते हैं।
जिंदगी पर भारी पड़ती जहरीली हवा
प्रदूषित हवा हमारी सेहत पर कितनी भारी पड़ रही है, इसका एक खुलासा इस साल मार्च में अमेरिका के हेल्थ इफेक्ट्स इंस्टीट्यूट (एचईआई) द्वारा जारी की गई रिपोर्ट-स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर-2019 में किया गया गया था। उस रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक घर से बाहर रहने या घर में वायु प्रदूषण की वजह से 2017 में स्ट्रोक, मधुमेह, दिल का दौरा, फेफड़े के कैंसर या फेफड़े की पुरानी बीमारियों से पूरी दुनिया में करीब 50 लाख लोगों की मौत हुई। रिपोर्ट में बताया गया कि इनमें से 30 लाख मौतें सीधे तौर पर पीएम 2.5 से जुड़ी हैं। इनमें से करीब आधे लोगों की मौत भारत और चीन में हुई है।
साल 2017 में इन दोनों देशों में 12-12 लाख लोगों की मौत इस वजह से हुई थी। उस रिपोर्ट में दक्षिण एशिया को सबसे प्रदूषित क्षेत्र माना गया था जिसमें भारत, पाक, बांग्लादेश और नेपाल शामिल हैं। हालांकि चीन और भारत में प्रदूषण से होने वाली मौतों का आंकड़ा एक जैसा है, लेकिन संस्था का कहना था कि चीन ने प्रदूषण को कम करने में काफी हद तक सफलता हासिल कर ली है। गौरतलब है कि भारत में स्वास्थ्य संबंधी खतरों से होने वाली मौतों का तीसरा सबसे बड़ा कारण वायु प्रदूषण और इसके बाद धूम्रपान है। खराब आबोहवा की वजह से दक्षिण एशिया में मौजूदा हालात में जन्म लेने वाले बच्चों की जिंदगी ढाई से तीन साल कम हो रही है।
मप्र में लोगों के जीवनकाल में 3.6 वर्ष की कमी
शिकागो विश्वविद्यालय, अमेरिका की शोध संस्था ‘एपिकÓ द्वारा तैयार ‘वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांकÓ का नया विश्लेषण दर्शाता है कि मध्य प्रदेश में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति राज्य के नागरिकों की उम्र औसतन 3.6 वर्ष कम करती है। मध्य प्रदेश के लोगों का जीवनकाल घट रहा है और वे बीमार जीवन जी रहे हैं। अगर भारत अपने ‘राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रमÓ के लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल रहा और वायु प्रदूषण स्तर में करीब 25 प्रतिशत की कमी को बरकरार रखने में कामयाब रहा, तो ‘एक्यूएलआईÓ यह दर्शाता है कि वायु गुणवत्ता में इस सुधार से आम भारतीयों की जीवन प्रत्याशा औसतन 1.3 वर्ष बढ़ जाएगी।
वायु की गुणवत्ता मानक को अनुरूप नहीं
दरअसल वायु प्रदूषण पूरे भारत में एक बड़ी चुनौती है, लेकिन उत्तरी भारत के गंगा के मैदानी इलाके में यह स्पष्ट रूप से अलग दिखता है। वर्ष 1998 में गंगा के मैदानी इलाकों से बाहर के राज्यों में निवास कर रहे लोगों ने उत्तरी भारत के लोगों के मुकाबले अपने जीवनकाल में करीब 1.2 वर्ष की कमी देखी होती, अगर वायु की गुणवत्ता विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक को अनुरूप हुई होती। अब यह आंकड़ा बढ़ कर 2.6 वर्ष हो चुका है, और इसमें गिरावट आ रही है, लेकिन गंगा के मैदानी इलाकों की वर्तमान स्थिति के मुकाबले यह थोड़ी ठीकठाक है। वहीं उत्तरी भारत के गंगा के मैदानी इलाकों में निवास कर रहे लोगों को वायु गुणवत्ता में इस सुधार से अपने जीवनकाल में करीब 2 वर्ष के समय का फायदा होगा। एक्यूएलआई से संबंधित स्टडी समकक्ष-विशेषज्ञों के मूल्यांकन एवं अध्ययनों पर आधारित है, जिसे प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन और सह-लेखकों एवं शोधार्थियों की टीम ने तैयार किया है। इसी क्रम में उन्होंने भारत तथा उन देशों में यह अध्ययन किया, जहां आज प्रदूषित सूक्ष्म तत्वों और धूलकणों की सघनता सबसे ज्यादा है।
प्रदूषण मुक्त रहा देवास
दिवाली के बाद की सुबह बड़े शहर और इंडस्ट्रियल शहरों का एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) काफी निराश करने वाला रहा। हालांकि, मध्यप्रदेश का देवास इस लिस्ट में एयर क्वालिटी इंडेक्स 49 के साथ सबसे कम प्रदूषित शहर दिख रहा है। 50 से कम एयर क्वालिटी इंडेक्स को आदर्श और सबसे अच्छा माना जाता है। देवास मध्यप्रदेश के 10 सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार है सो प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के इस आंकड़े ने सबको चौकाया। ऐसा तब हुआ, जब लोगों ने दिवाली पर पटाखे भी जलाए। हालांकि पिछले साल के मुकाबले कम पटाखे जलाए गए। पिछले वर्ष दिवाली के एक दिन बाद इस शहर का एक्यूआई 312 था, जो कि दिवाली के दिन 173 था। दिवाली के एक दिन पहले भी शहर का प्रदूषण 125 मापा गया था। प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के आंकड़ों के 26 अक्टूबर यानि दिवाली के ठीक एक दिन पहले देवास का एक्यूआई 117 है, जो मॉडरेट माना जाता है। इस स्थिति में अस्थमा के मरीज और सांस की अन्य बीमारी से जूझ रहे लोगों को तकलीफ होती है। हालांकि ऐन दिवाली के दिन प्रदूषण का स्तर लगभग आधा होकर एक्यूआई 65 पहुंच गया। शाम के समय यह स्तर 33 के करीब था।
वायु प्रदूषण रोकने चलेगा जागरूकता अभियान
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने केन्द्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड की देश भर के प्रमुख 200 शहरों की आई निगरानी रिपोर्ट में प्रदेश के भोपाल-दमोह सहित अन्य शहरों में एम्बिएंट एयर क्वालिटी इंडेक्स के बढ़ते स्तर पर गंभीर चिंता जताते हुए इसके बढ़ते स्तर को कम करने और इसकी रोकथाम को लेकर कई दिशा-निर्देश जारी किए हैं। कमलनाथ ने कहा कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नई दिल्ली के वर्ष 2011-15 की रिपोर्ट के आधार पर मध्यप्रदेश के 6 शहरों भोपाल, इंदौर, देवास, ग्वालियर, सागर और उज्जैन को नॉन अटेंटमेंट सिटी घोषित किया गया था। यह घोषणा परिवेशीय वायु में धूल कणों की मात्रा निधार्रित मानकों से अधिक पाए जाने के कारण की गई थी। वर्तमान में आई रिपोर्ट और जनता के स्वास्थ्य की रक्षा को देखते हुए प्रदेश में इन शहरों के साथ-साथ अन्य शहरों में भी वायु प्रदूषण की रोकथाम को लेकर जागरूकता अभियान चलाने से लेकर, व्यापक पैमाने पर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जारी दिशा-निर्देश में प्रदेश में वृहद पौधरोपण अभियान से हरियाली बढ़ाने तथा वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए कहा गया है। सड़कों की टूट-फूट से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए सड़कों के निर्माण कार्य, पैचवर्क व मरम्मत को प्राथमिकता दी गई है। वायु प्रदूषण रोकने के लिए मेकेनिकल स्ट्रीट स्वीपर और वाटर फॉगर्स शीघ्र क्रय करने को कहा गया है। प्रदेश में रियल टाइम मॉनीटरिंग स्टेशन की संख्या बढ़ाने को कहा गया है।
देश के सबसे प्रदूषित शहरों में भोपाल भी
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल देश की सबसे स्वच्छ राजधानी है, लेकिन यहां की हवा लगातार प्रदूषण हो रही है। दीपावली से कुछ दिन पहले भोपाल देश में 11वां सर्वाधिक प्रदूषित शहर बन गया था। यहां एम्बिएंट एयर क्वालिटी इंडेक्स 241 पर पहुंच गया है, जबकि सांस लेने योग्य शुद्ध हवा के लिए इसे 50 से कम होना चाहिए। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की देशभर के 200 शहरों की निगरानी रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली-एनसीआर, हावड़ा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश लखनऊ, मेरठ, मुरादाबाद के बाद भोपाल देश में सर्वाधिक प्रदूषित शहर रहा। यह इस बात का संकेत है कि हरियाली से भरपूर इस शहर में वायु प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। हालांकि सुखद बात यह रही कि दीपावली के बाद हुई आतिशबाजी के बाद भी शहर का एक्यूआई 156 ही रहा।
– राजेंद्र आगाल