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बढ़ेगा नाथ का कुनबा

झाबुआ उपचुनाव में जीत के बाद कमलनाथ कैबिनेट में फेरबदल संभव है। सीएम कमलनाथ अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर सकते हैं, लेकिन कैबिनेट विस्तार का अंतिम फैसला कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और कमलनाथ की 4 नवंबर को होने वाली बैठक में तय होगा। सूत्रों का कहना है कि मध्यप्रदेश में 5 राज्यमंत्री बनाए जा सकते हैं। कमलनाथ की कैबिनेट में अभी 28 मंत्री हैं और वो सभी कैबिनेट मंत्री हैं। वहीं, कांतिलाल भूरिया की भूमिका को लेकर संशय बना हुआ है।
कमलनाथ कैबिनेट में फेरबदल होता है तो कई मंत्रियों के विभागों में कटौती की जा सकती है तो कई नए चेहरे शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह ठाकुर, केदार डाबर, विक्रम सिंह राणा, समाजवादी पार्टी के विधायक राजेश शुक्ला, बसपा के संजीव कुशवाहा और रामबाई अभी सरकार को समर्थन दे रहे हैं। माना जा रहा है कि इनमें से किसी को मंत्री बनाया जा सकता है। वहीं, कांग्रेस विधायकों की बात करें तो केपी सिंह, एंदल सिंह कंसाना और राज्यवद्र्धन सिंह दत्तीगांव को कमलनाथ कैबिनेट में मंत्रालय मिल सकता है। बता दें कि निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह और बसपा विधायक रामबाई लंबे समय से मंत्रिमंडल में जगह को लेकर मांग कर रही हैं। इन विधायकों ने कई बार सरकार पर दबाव बनाने की भी कोशिश की है।
कमलनाथ अपने मौजूदा कैबिनेट मंत्री के विभागों में कटौती भी कर सकते हैं। सूत्रों का कहना है कि जिन मंत्रियों के पास दो या तीन विभागों की जिम्मेदारी है उनके विभागों में कटौती की जा सकती है। वहीं, कुछ मंत्रियों के पास बेमेल विभाग हैं उन में भी कटौती की जा सकती है। विजयलक्ष्मी साधौ के पास संस्कृति और चिकित्सा विभाग है। सज्जन सिंह वर्मा के पास लोक निर्माण विभाग के साथ पर्यावरण, बाला बच्चन के पास गृह के साथ साथ जेल और तकनीकी शिक्षा का मंत्रालय है वहीं, गोविंद सिंह राजपूत के पास परिवहन के साथ राजस्व विभाग है। ऐसे मंत्रियों के विभागों में कटौती की जा सकती है।
मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने सत्ता में 10 महीनों से ज्यादा का समय भले पूरा कर लिया हो, लेकिन इस दौरान सरकार ने विपक्ष के साथ-साथ सरकार-समर्थक विधायकों के तेवर भी कम नहीं झेले हैं। जिन निर्दलीय विधायकों ने कमलनाथ सरकार को बाहर से समर्थन दिया है, उनके बागी तेवरों से कांग्रेस पार्टी बुरी तरह परेशान रही है। लेकिन अब जबकि झाबुआ विधानसभा उपचुनाव का परिणाम कांग्रेस के पक्ष में आ गया है और विधानसभा में संख्याबल के मामले में भी पार्टी मजबूत हो गई है, इन तेवरदार विधायकों के सुर ढीले पडऩे लगे हैं। अब तक सरकार को निशाना बनाने वाले विधायकों ने सरकार के साथ खड़े होने का दावा करना शुरू कर दिया है।
झाबुआ उपचुनाव का रिजल्ट आते ही कांग्रेस के खाते में आई एक सीट के बाद विधानसभा में पार्टी का संख्याबल अब 115 हो गया है। वहीं एक निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल को मंत्री बनाकर कांग्रेस ने बहुमत के लिए जरूरी 116 का आंकड़ा भी हासिल कर लिया है। यही वजह है कि अब तक सरकार को बाहर से समर्थन देते हुए भी जब-तब ‘तेवरÓ दिखाने वाले विधायकों के सुर बदल गए हैं। अब तक मंत्री बनाने को लेकर सरकार पर दबाव बनाने वाले निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह ठाकुर ने कहा है कि कांग्रेस को जरूरत के समय सभी सपा, बसपा और निर्दलियों ने साथ दिया है। अब जबकि सरकार ने बहुमत का आंकड़ा हासिल कर लिया है, तो उसे इन विधायकों के योगदान को नहीं भूलना चाहिए। ठाकुर का यह बयान आने के बाद भी कांग्रेस पार्टी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। सूत्र बताते हैं कि इस मामले में कांग्रेस खुलकर बोलने से बच रही है, लेकिन संकेत साफ है कि अब सरकार में विधायकों के बागी तेवर बर्दाश्त नहीं होंगे।
झाबुआ उपचुनाव का परिणाम आने के साथ ही कमलनाथ सरकार की अस्थिरता को लेकर उठ रहे सवाल भी फिलहाल खामोश हो गए हैं। हालांकि बीजेपी के नेता उमाशंकर गुप्ता ने कहा है कि सरकार ने संख्याबल में आंकड़ा भले ही हासिल कर लिया हो, लेकिन कांग्रेसियों में आपसी मतभेदों से अस्थिरता बढ़ गई है। वहीं, राज्य के विधि मंत्री पीसी शर्मा ने कहा है कि कांग्रेस के पास 116 विधायकों का स्पष्ट बहुमत है। बसपा-सपा और निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी सरकार को हासिल रहेगा, सरकार पूरे पांच साल चलेगी।

भूरिया पीसीसी संभालेंगे या बनेंगे सत्ता में भागीदार
झाबुआ में बड़ी जीत हासिल करने वाले कांतिलाल भूरिया की कांग्रेस में नई भूमिका को लेकर बड़ी बहस छिड़ गई है। झाबुआ उपचुनाव में भूरिया को डिप्टी सीएम तक प्रोजेक्ट करने वाली कांग्रेस अब उनकी ताजपोशी को लेकर परेशान है। भूरिया को सत्ता या संगठन में जगह देने की मजबूरी पर मंथन तेज हो गया है। उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया को डिप्टी सीएम प्रोजेक्ट करने के बाद कांग्रेस में नवनिर्वाचित विधायक को सत्ता में जगह देने को लेकर चर्चाएं गरम हैं। मंत्री सज्जन सिंह वर्मा के कांतिलाल भूरिया को पीसीसी चीफ के लिए परफेक्ट बताने के बयान के बाद नेताओं के रिएक्शन तेज हो गए हैं। मंत्री पीसी शर्मा पार्टी में भूरिया की नई भूमिका को लेकर सीधे तौर पर कुछ भी बोलने से बचते दिखे। तो वहीं पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा है कि इस बारे में फैसला मुख्यमंत्री कमलनाथ को करना है। बहरहाल झाबुआ में जीत हासिल कर कांग्रेस ने संख्या गणित में भले ही मजबूती हासिल कर ली हो लेकिन भूरिया की नई पारी को लेकर कांग्रेस में संकट के हालात जरूर खड़े हो गए हैं। यदि कांग्रेस नेताओं के झाबुआ में दिए गए बयानों पर अमल होता है तो कांतिलाल भूरिया को सत्ता में भागीदार बनाया जाएगा। लेकिन यदि सिंधिया और दूसरे नेताओं की पीसीसी चीफ को लेकर की जा रही दावेदारी को कमजोर किया जाना है तो भूरिया को प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी जा सकती है।
– कुमार राजेंद्र