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नेतृत्व की जंग

इन दिनों देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में क्या हो रहा है और वह किधर जा रही है, यह शायद कोई भी और यहां तक कि कांग्रेसी नेता भी नहीं जानते। इस पर हैरान ही हुआ जा सकता है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों की घोषणा होने के चंद दिन बाद राहुल गांधी विदेश यात्रा पर चले गए। पता नहीं राहुल इन राज्यों में चुनाव प्रचार करने जाएंगे या नहीं, लेकिन ऐन मौके पर उनके विदेश जाने से आम कार्यकर्ताओं के बीच तो यही संदेश गया कि वह इन चुनावों को महत्व नहीं दे रहे हैैं। भले ही सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर फैसले करने में लगी हुई हों, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं लगता कि वह अपने नेताओं एवं कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और उन्हें दिशा दिखाने की जरूरत समझ रही हैैं। वास्तव में इसी कारण पार्टी के नेता एक ही मसले पर अलग-अलग बयान देने में लगे हुए है।
होता तो अब तक यही रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व बोलता रहा और पार्टी के बाकी नेता चुपचाप सुनते रहते थे। अब तो कांग्रेस में उलटी बयार बह रही है। नेतृत्व खामोश है-और नेता बोलते चले जा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व की खामोशी से तो ऐसा लगता है जैसे वो चुपचाप सुन रहा है, लेकिन रिएक्ट नहीं कर रहा है। एकतरफा संवाद हमेशा ही खतरनाक होता है। चाहे वो नेतृत्व की तरफ से हो या फिर बाकी नेताओं की ओर से। ऐसी परिस्थितियां या तो तानाशाही के दायरे में आती हैं या फिर अराजकता के। दोनों ही हालात किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरनाक होते हैं और उसका असर देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर देर सवेर पड़ता ही है।
एक तरफ राहुल गांधी कह रहे हैं कि उन्हें चुप कराने की कोशिश हो रही है, दूसरी तरफ वो कुछ बोल भी नहीं रहे हैं। हो सकता है विरोधी दलों के नेता ऐसा कर रहे हों या फिर राहुल गांधी को लग रहा हो, लेकिन कांग्रेस के नेताओं का तो कतई ऐसा इरादा नहीं होना चाहिए। फिर ऐसा क्यों हो रहा है कि एक बाद एक कांग्रेस नेताओं के बयान आ रहे हैं जिनमें निशाने पर कांग्रेस नेतृत्व ही होता है। पहले तो बगावती तेवर वाले ऐसे नेताओं के निशाने पर सोनिया गांधी हुआ करती रहीं, लेकिन सलमान खुर्शीद ने जब से राहुल गांधी को छोड़कर चले जाने वाले की संज्ञा दे डाली है जिससे कोहराम मच गया है। कांग्रेस का हाल ये है कि पूरी पार्टी में कन्फ्यूजन बढ़ता जा रहा है। अब अगर आगे आकर कोई ऑल इज वेल नहीं कहता तो तरह तरह की बातें तो चलती ही रहेंगी। ऐसे में तो पूरा दारोमदार सोनिया गांधी और नहीं तो राहुल गांधी पर ही आ जाता है कि आगे आएं और बताएं कि स्टेटस अपडेट क्या है।
अक्सर उजागर होती गलतियों को न्यूट्रलाइज करने के लिए ऐसा करने वालों को ही गलत ठहरा दिए जाने की कोशिश होती है। विरोधी राजनीतिक दलों की तो छोडि़ए, कांग्रेस के नेता आपस में ही ऐसा कर रहे हैं। मालूम तो उन्हें भी होगा ही कि ये उपाय पेन किलर की तरह है जो तत्काल राहत भले दे दे लेकिन उसके साइड इफेक्ट बड़े खतरनाक होते हैं। अव्वल तो ऐहतियाती उपाय ऐसे होने चाहिए कि बीमारी ही न हो। अगर बीमारी हो जाए तो जल्द से जल्द उसका इलाज होना चाहिए और साधारण इलाज से बात न बने तो सर्जरी का रास्ता अख्तियार करना ही चाहिए। ऐसा कुछ भी न हो तो आखिरकार बीमारी लाइलाज हो जाती है और कांग्रेस की मुश्किलें अब ऐसी ही लगने लगी हैं। अच्छी बात बस ये है कि कैंसर का भी इलाज होने लगा है जिसमें और कुछ नहीं तो मरीज की उम्र तो बढ़ाई ही जा सकती है।
हाल फिलहाल कांग्रेस के कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व को सवालों के कठघरे में खड़ा किया है। खास बात ये है कि ये नेता कांग्रेस नेतृत्व पर ऐसे सलाहकारों से घिरे होने की बात कर रहे हैं जो गलत राय देकर पार्टी को हर संभव नुकसान पहुंचा रहे हैं। अशोक तंवर, संजय निरूपम, सलमान खुर्शीद के बाद अब इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शुमार हो गए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया कभी राहुल गांधी के बेहद करीबी हुआ करते रहे, लेकिन बदले समीकरणों के बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया को महाराष्ट्र चुनाव का काम दे दिया गया है। सलमान खुर्शीद इस हद तक निराश हैं कि महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर पूरी तरह नाउम्मीद हैं। जब सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के इस्तीफे को ‘छोड़कर चले जाने जैसा’ महसूस किया और कह दिया तो राशिद अल्वी ने घेर लिया। ऐसे ही जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस में आत्मावलोकन की बात कह दी तो अधीर रंजन चौधरी गलत साबित करने पर आमादा हो गए।
पश्चिम बंगाल से लाकर लोकसभा में कांग्रेस के नेता बनाये गये अधीर रंजन चौधरी का कहना है अगर कुछ मुद्दे हैं तो उन्हें पार्टी स्तर पर उठाया जाए न कि सार्वजनिक रूप से। क्या अधीर रंजन को नहीं लगता कि जो दवा वो पिलाना चाहते हैं उसकी एक्सपायरी डेट कबकी बीत चुकी है। इससे पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जम्मू कश्मीर को लेकर धारा 370 पर कांग्रेस के स्टैंड को सीडब्ल्यूसी की मीटिंग में भी उठाया था। नतीजा क्या हुआ? सिंधिया को भी जवाब उसी अंदाज में मिला-हुआ तो हुआ! मध्य प्रदेश की उठापटक से दूर करने के लिए कभी सिंधिया को यूपी तो कभी महाराष्ट्र भेजकर बहलाया जा रहा है। ऐसा होने की वजह भी एक ही है, राहुल गांधी कुर्सी छोड़ चुके हैं और सिंधिया के विरोधी मौजूदा नेतृत्व को अपने तरीके से समझा बुझाकर फायदे के हिसाब से फैसले को प्रभावित कर रहे हैं।
सुना तो ये भी गया कि अशोक तंवर भी हरियाणा कांग्रेस की समस्या पार्टी फोरम पर ही उठाना चाहते थे, लेकिन मौका नहीं मिला। अब ये मौका नेतृत्व ने नहीं मुहैया करना चाहा या बीच के लोगों ने ही खेल कर दिया और अशोक तंवर को पार्टी ही छोडऩी पड़ी। अशोक तंवर भी सिंधिया की ही तरह 23 मई से पहले राहुल गांधी के करीबी खांचे में फिट हुआ करते थे, लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है।
सलमान खुर्शीद और सिंधिया को लेकर अधीर रंजन का कहना है, कई मौकों पर, राहुल गांधी ने साफ तौर पर कहा है कि उन्हें लगता है कि कांग्रेस की हार की जिम्मेदारी कांग्रेस अध्यक्ष की नैतिक जवाबदेही है और इसीलिए उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी को त्याग देना उचित समझा। राशिद अल्वी तो सलमान खुर्शीद की बातों पर शायर बन जा रहे हैं-अब कांग्रेस की ऐसी स्थिति हो गई है कि इसे दुश्मनों की जरूरत नहीं है। घर को आग लग गई, घर के चिराग से। राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर राशिद अल्वी का कहना है कि राहुल गलत नहीं थे, उन्हें कुछ नेताओं का समर्थन नहीं मिला, इसलिए राहुल ने इस्तीफा दे दिया। महाराष्ट्र कांग्रेस से संजय निरूपम ने मल्लिकार्जुन खडगे जैसे नेताओं पर भड़ास निकाली थी। अब मल्लिकार्जुन खडगे कह रहे हैं कि जब सत्ता नहीं होती, तो बोलने वालों की बाढ़ आ जाती है। मल्लिकार्जुन खडगे के नजरिए से सोचें तो नेताओं को बगैर सत्ता हासिल किए चुप नहीं कराया जा सकता और सत्ता हासिल करने की तो अभी दूर-दूर तक कोई संभावना नजर भी नहीं आ रही है।
बगावती तेवर अख्तियार किए नेताओं पर दूसरे खेमे से जो रिएक्शन आ रहे हैं वे सिर्फ गुमराह करने वाले लगते हैं और ऐसा लगता है जैसे गुमराह करके वे नेताओं की बातों को सच साबित कर रहे हों। बेबुनियाद विरोध भी हकीकत को झुठलाने की नाकाम कवायद होती है जो आरोपों की अपनेआप पुष्टि कर देती है। सवाल ये है कि ऐसी बातों पर फाइनल कॉल कौन लेगा? कौन स्थिति स्पष्ट करेगा? कौन आगे आकर कहेगा भी और सुनिश्चित भी करेगा-ऑल इज वेल?
अब तो सोनिया या राहुल ही स्थिति साफ कर सकते हैं
कांग्रेस नेतृत्व को लेकर अब तक दो तरह की बातें सामने आई हैं और दोनों ही मामलों में राहुल गांधी ही केंद्र बिंदु हैं। एक, राहुल गांधी के भरोसेमंद लोगों को किनारे लगाने की कोशिश हो रही है। कहने का मतलब ये कि सोनिया गांधी के तात्कालिक तौर पर ही सही कुर्सी संभाल लेने के बाद सभी पुराने और बुजुर्ग नेता सक्रिय हैं जो राहुल राज में शनि की साढ़ेसाती की तरह जैसे-तैसे वक्त गुजार रहे थे या बुरे वक्त के गुजर जाने का इंतजार कर रहे थे। दो, राहुल गांधी के जाने के बाद जो अस्थायी समाधान निकला है वो किसी काम का नहीं है। कांग्रेस में फैसले वैसे ही हो रहे हैं जैसे अंतरिम अध्यक्ष के चुनाव से पहले हुआ करते रहे। ये फैसले बीच में सीडब्ल्यूसी की एक कोर कमेटी लेती रही और तकरीबन वही नेता अब भी सलाहकार बने हुए हैं। सोनिया गांधी के पास ही फिलहाल ऐसी सारी शक्तियां हैं, इसलिए वही ऐसा कर सकती हैं। सोनिया गांधी भी तो हर हालात से वाकिफ होंगी ही। सोनिया गांधी से बेहतर इसे कौन समझ सकता है कि ऐन चुनावों के बीच ऐसी बातों का क्या मतलब और कहां तक असर होता है।
कांग्रेस नेतृत्व अपनों के निशाने पर
कांग्रेस नेतृत्व फिलहाल अपने ही नेताओं के निशाने पर है। सीधे-सीधे न सही, लेकिन सभी नेता परोक्ष रूप से सोनिया गांधी को ही टारगेट कर रहे हैं। भाषा में थोड़ी तमीज या तहजीब भले हो, लेकिन कांग्रेस को लेकर अब तक जो भी बातें सामने आई हैं इससे साफ-साफ कहा जा रहा है कि जो कुछ हो रहा है वो ठीक नहीं है। सवाल ये है कि ये सब किसके इशारे पर हो रहा है? जिन नेताओं के भी ऐसे बयान आ रहे हैं उसमें राहुल गांधी की बात जरूर हो रही है। कांग्रेस नेताओं के ताजा बयानों में काफी गुस्सा झलक रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे वे बड़ी मुश्किल से कुछ कह पा रहे हैं। समझा जा रहा है कि ये जो भी बातें हैं वे सिर्फ बोलने वाले नहीं, बल्कि खामोश रहने वाले नेताओं के भी मन की बात है। आखिर क्यों राहुल गांधी को जबरदस्ती फिर से उसी सड़ी हुई पॉलिटिक्स में घसीटने की कोशिश हो रही है जिससे एक दशक से ज्यादा जूझने के बाद वो निजात पाने की कोशिश कर रहे हैं? ये तो होने से रहा कि कांग्रेस के असरदार नेता वो सब होने देने से रहे जैसा राहुल गांधी चाहते हैं। राहुल गांधी की मर्जी के मुताबिक सिस्टम तो बदलने से रहा। आखिर यह क्यों न माना जाए कि कांग्रेस जानबूझकर आत्ममंथन से बच रही है? सच जो भी हो, लोकसभा चुनावों में 11 करोड़ से अधिक वोट पाने और चार प्रमुख राज्यों में शासन करने वाली कांग्रेस अपनी दयनीय दशा से उबरने की कोशिश न करके केवल अपना ही नहीं, भारतीय लोकतंत्र का भी अहित करने में लगी हुई है।
– इन्द्र कुमार