samasya

कुपोषण का दंश

भारत लंबे समय से विश्व में सर्वाधिक कुपोषित बच्चों का देश बना है। हालांकि कुपोषण के स्तर को कम करने में कुछ प्रगति भी हुई है। गंभीर कुपोषण के शिकार बच्चों का अनुपात वर्ष 2005-06 के 48 प्रतिशत से घट कर वर्ष 2015-16 में 38.4 प्रतिशत हो गया। इस अवधि में कम वजन वाले बच्चों का प्रतिशत 42.5 प्रतिशत से घट कर 35.7 प्रतिशत हो गया। साथ ही शिशुओं में रक्ताल्पता (एनीमिया) की स्थिति 69.5 प्रतिशत से घट कर 58.5 प्रतिशत रह गई, पर इसे अत्यंत सीमित प्रगति ही मान सकते हैं। भारत के लिए यह चिंताजनक बात है कि यह अपने पड़ोसी बांग्लादेश से भी शिशु मृत्यु दर में आगे है। भारत में शिशु मृत्युदर प्रति हजार 67 है, जबकि बांग्लादेश में यह प्रति हजार 48 है। भारत में पांच साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चे 35 प्रतिशत हैं। इनमें भी बिहार और उत्तर प्रदेश सबसे आगे हैं। उसके बाद झारखंड, मेघालय और मध्यप्रदेश का स्थान है। मध्यप्रदेश में पांच साल से छोटी उम्र के 42 फीसदी बच्चे कुपोषित हैं, तो बिहार में यह फीसद 48.3 है।
मप्र में पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के विकास के दावों की परतें लगातार खुलती जा रही है। शिवराज सरकार ने विधानसभा चुनाव के दौरान दावा किया था कि पिछले तीन सालों (2016 से 2018) के दौरान प्रदेश में कुपोषण तेजी से कम हुआ है। सरकार की योजनाओं और प्रयासों के कारण ऐसा हो पाया है। सरकार ने इसके लिए 19,000 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। लेकिन 18 सितंबर को पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन की ओर से सभी राज्यों में कुपोषण पर एक रिसर्च रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में साल 2018 में पांच साल तक के बच्चों की मौत का बड़ा कारण कुपोषण रहा और 68.2 फीसदी बच्चों की मौत का कारण कुपोषण पाया गया। कुपोषण, सभी उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरा बना हुआ है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन ने अपनी रिपोर्ट में केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल खड़े किए गए हैं। गौरतलब है कि इससे पहले सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी एसआरएस ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मप्र में हजारों करोड़ रुपए खर्च होने के बाद भी कुपोषण हर 1000 में से 47 बच्चों को लील लेता है।
वर्ष 2016 और 2018 के संदर्भ में जो रिपोर्ट आई है उसके अनुसार मप्र में कुपोषण बच्चों के लिए काल का रूप ले चुका है। राज्य नवजात बच्चों की कुपोषण के कारण मौत के मामले में पहली पायदान पर है, वो भी तब जब 2016 से 2018 तक कुपोषण मिटाने के नाम पर करीब 19 हजार करोड़ रुपए खर्च करने का दावा किया गया। श्योपुर के कराहल में रहने वाले सहरिया जनजाति के लोग तो कुपोषण के लिए फोटो फीचर बन गए हैं। जिले में 1226 आंगनवाड़ी केंद्र हैं। सरकार हर महीने 40 लाख रुपए आंगनवाड़ी केन्द्रों को देने की बात कहती है। लेकिन इसका कोई असर देखने को नहीं मिल रहा है। श्योपुर में सहारिया, तो शहडोल में बैगा आदिवासी बच्चों की हालत एक जैसी है। पूरे संभाग में 45,000 बच्चे कुपोषित बताए जा रहे हैं। मंदसौर में 1,22,259 बच्चों में कुपोषण के लक्षण पाए गए हैं। छतरपुर में 32 हजार से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। ये हालात तब हैं जब जिले में 2058 आंगनवाड़ी केन्द्रों में लगभग दो लाख बच्चे हैं। रिपोर्ट के अनुसार कुपोषण दूर करने में केंद्र सरकार की योजनाएं जमीन पर दम तोड़ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि प्रदेश में एक भी एनआरसी सेंटर ऐसा नहीं है, जहां 100 फीसदी कुपोषित बच्चे पोषित हुए हैं। सागर में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. मधु जैन कहती हैं- कुपोषण का सबसे मुख्य कारण है पहले घंटे में मां का दूध नहीं मिल पाना, 6 महीने तक स्तनपान न कराना, पौष्टिक आहार मां को भी लेना पड़ता है लेकिन वो मिल नहीं पाता, इसलिए हमारे यहां कुपोषित बच्चे ज्यादा हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों से बहुत ज्यादा है।
नीति आयोग भी जता चुका है चिंता
मप्र में कुपोषण की स्थिति पर नीति आयोग भी चिंता जता चुका है। राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार मप्र में जन्म लेने वाले 1000 बच्चों में 32 बच्चे 29 दिन के पहले और 55 बच्चे जिंदगी का पांचवां साल नहीं देख पाते। देश के 21 बड़े राज्यों में यह मृत्यु दर सबसे ज्यादा है। स्वास्थ्य से जुड़े 23 इंडिकेटर्स के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट में मप्र 17वें स्थान पर है। इसमें सबसे पीछे यूपी, बिहार, उड़ीसा हैं। नीति आयोग ने ‘हेल्दी स्टेट्स प्रोग्रेसिव इंडिया’ नाम से जारी रिपोर्ट के अनुसार, नवजात बच्चों (29 दिन के पहले) की मौत के मामले देखे तो 21 राज्यों में मध्यप्रदेश 55 बच्चों के साथ आखिरी पायदान पर है। यानी प्रति 1000 बच्चों में से 55 की मौत 5 साल के पहले हो जाती है। शिशु की मृत्यु दर की गणना करते समय उन बच्चों को शामिल किया जाता है जिनकी मौत जन्म के 29 दिन के भीतर हो जाती है। यहां भी प्रदेश, 32 की शिशु मृत्यु दर के साथ स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में सबसे कमजोर माने जाने वाले उड़ीसा के साथ बराबरी पर है। नवजात शिशु के लिए मानक 2500 ग्राम रखा गया है।
– बृजेश साहू