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दलबदलुओं की चांदी

महाराष्ट्र चुनाव में इस बार दलबदलुओं की चांदी ही चांदी है। भाजपा और शिवसेना ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं पर जमकर मेहरबानी दिखाई है, वहीं अपनी पार्टी के कई दावेदारों को टिकट न देकर भितरघात की संभावना को बढ़ा दिया है। प्रदेश में फिर से सरकार बनाने की भाजपा-शिवसेना की राह में बगावत बड़ी समस्या बन सकती है। अब देखना है पार्टियां इससे कैसे निपटती हैं।
महाराष्ट्र में 21 अक्टूबर को होने वाले 288 सदस्यीय विधानसभा चुनाव के लिए कुल 3,239 उम्मीदवार मैदान में हैं। यहां मुख्य मुकाबला भाजपा नीत राजग और कांग्रेस-राकांपा गठबंधन के बीच है। लेकिन इस चुनाव में यह देखने को मिल रहा है कि सभी पार्टियों ने दागी और बागी प्रत्याशियों पर जमकर दांव लगाया है। खासकर सत्तारूढ़ भाजपा और शिवसेना ने तो अपनों को दरकिनार कर दलबदलुओं पर सबसे अधिक दांव खेला है।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और शिवसेना ने कांग्रेस-एनसीपी सहित क्षेत्रीय दलों को छोड़कर भाजपा और शिवसेना में शामिल होने वाले नेताओं को दोनों पार्टियों ने निराश नहीं किया है। विधानसभा चुनाव से पहले बड़ी तादाद में कांग्रेस, एनसीपी और प्रकाश अंबेडकर की बहुजन अघाड़ी पार्टी के विधायकों ने अपनी-अपनी पार्टी से नाता तोड़कर भाजपा और शिवसेना का दामन थामा था। ऐसे में दोनों पार्टियों ने दल बदल करने वाले विधायक और नेताओं को निराश नहीं किया है। ऐरोली सीट से एनसीपी के विधायक संदीप नाइक, अकोले से विधायक वैभव पिचड़, सतारा से विधायक शिवेंद्र सिंह भोसले, तुलजापुर से विधायक राणा जगजीत सिंह, केज सीट से नमिता मुंदडा को भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है। इन सारे विधायकों ने एनसीपी से नाता तोड़कर भाजपा का दामन थामा था।
कांग्रेस से भाजपा में आए विधायक कालीदास कोलाम्बकर को वडाला, राधाकृष्ण विखे पाटिल को शिरडी, जयकुमार गोरे को माण सीट से, इंदापुर से हर्षवर्धन पाटिल और वाई सीट से मदन भोसले को पार्टी ने टिकट दिया है। 2014 में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीते शिरीश चौधरी को अमलनेर, महेश लांडगे को भोसरी, विनायक पाटिल को अहमदपुर से भाजपा उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं, वंचित बहुजन आघाडी से बीजेपी में आए गोपीचंद पडलंकर को बारामती से टिकट दिया है। इसके अलावा नितेश राणे को भी बीजेपी टिकट दे सकती है।
भाजपा की तरह शिवसेना ने भी दूसरे दलों से आए नेताओं के साथ पूरी ईमानदारी बरती है। कांग्रेस से शिवसेना में शामिल होने वाले नेताओं को टिकट किया है। सिल्लोड सीट से विधायक अब्दुल सत्तार, इगतपुरी सीट से निर्मला गावाते और चंदगड़ सीट से संग्राम कुपेकर को शिवसेना ने टिकट दिया है। ऐसे ही एनसीपी से शिवसेना में शामिल होने वाले नेताओं की उम्मीद पर खरी उतरी है। गुहानगर से भाष्कर जाधव को उम्मीदवार बनाया है। इसके अलावा श्रीवर्धन सीट से एनसीपी के अवधूत तटकरे को शिवसेना टिकट दे सकती है। इसी तरह से बहुजन विकास आघाडी से शिवसेना मे आए विलास तरे को बोईसर सीट से टिकट दिया गया है।
इस बार भाजपा और शिवसेना मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। साल 2014 के विधानसभा चुनाव में दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। भाजपा को 122 जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिलीं। पूर्ण बहुमत से 20 सीट दूर रहने की वजह से भाजपा ने शिवसेना की मदद से सरकार बनाई। दोनों के बीच तनावपूर्ण संबंध साल 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ सामान्य हुए जब दोनों पार्टियों ने राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 24-24 सीटें बांटने का फैसला किया। तब विधानसभा चुनाव में भी बराबर सीटें लडऩे पर बात हुई थी लेकिन भाजपा के दबाव के आगे इस बार शिवसेना को झुकना पड़ा।
केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दावा किया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना गठबंधन 200 से ज्यादा सीटें जीतेगा। जावड़ेकर ने कहा, भाजपा ऐसी पार्टी है जो सातों दिन, 24 घंटे काम करती है। जब 2019 लोकसभा चुनाव खत्म हुआ, भाजपा ने अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी। जावड़ेकर ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि कांग्रेस दो महीने तक अपने अध्यक्ष का विकल्प नहीं ढूंढ पाई थी। इन दो महीनों में हमें नया कार्यकारी अध्यक्ष भी मिल गया। उन्होंने कहा, इस बीच हमारे 19 करोड़ सदस्य हो गए। हम लोगों के बीच 24 घंटे रहते हैं, जिसका हमें फायदा मिल रहा है।
भाजपा फिर बड़े भाई की भूमिका में
पिछला चुनाव अलग-अलग लडऩे वाली भाजपा और शिवसेना इस बार मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं। शिवसेना ने भाजपा को बड़ा भाई मान ही लिया। इस बार विधानसभा की 288 सीटों में से भाजपा 164 और शिवसेना 124 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 2014 के विधानसभा चुनाव से पहले तक भाजपा हमेशा 110 से 115 जबकि शेष सीटों पर शिवसेना अपने उम्मीदवार खड़े करती रही है। 2014 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने अलग-अलग लड़ा था। शिवसेना पहले बराबर सीटों पर चुनाव लडऩे पर अड़ी हुई थी लेकिन भाजपा ने उसकी इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया था। शुक्रवार देर रात दोनों ही दलों ने सीटों के गठबंधन का ऐलान किया था। एनडीए के अन्य सहयोगी दलों के उम्मीदवार भाजपा के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ेंगे। इससे छोटे दलों का महत्व लगभग खत्म हो जाएगा क्योंकि वे भाजपा को छोड़कर अन्य किसी का समर्थन करने के बारे में सोच भी नहीं सकते हैं।
– बिन्दु माथुर