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मिड-डे मील में झोल

छात्रों के लिए अनेकों योजनाएं चलाकर भले ही सरकार खुश हो रही हो, लेकिन आज भी मिड-डे मील जैसी योजना में ‘झोल’ किया जा रहा है। कई प्रदेशों में इसका लाभ सभी बच्चों को नहीं मिल पा रहा है और जिन्हें मिल भी रहा है उन्हें भी खाने योग्य खाना नहीं दिया जा रहा है। देश के विभिन्न स्कूलों में नामांकन या एडमिशन लेने वाले लगभग 3 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील यानी मध्याह्न भोजन योजना का लाभ नहीं मिल पाता है। मिड-डे मील की सरकारी वेबसाइट पर दिए वार्षिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2018-19 में देश में कुल 11.93 करोड़ बच्चों का दाखिला विभिन्न स्कूलों में हुआ है लेकिन इनमें से 9.036 करोड़ बच्चों को ही मिड-डे मील दिया गया है।
मिड-डे मील की मॉनीटरिंग करने वाली बॉडी पीएबी (प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड) ने ही स्कूलों में भर्ती कुल छात्रों की संख्या को दरकिनार करते हुए करीब 9.58 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील का आंवटन किया। यानी पीएबी ने ही करीब 2.40 करोड़ बच्चों का मिड-डे मील अप्रूव (स्वीकृत) नहीं किया। इतना ही नहीं जिन 9.58 करोड़ बच्चों को मिड-डे मील का अप्रूवल मिला है उनमें से भी लगभग 55 लाख बच्चों को मिड-डे मील वित्तीय वर्ष 2018-19 में नसीब नहीं हुआ है। यानी मिड-डे मील को लेकर सरकार भले ही लाख दावे कर ले, वास्तविकता उससे बहुत दूर है। अब भी बड़ी संख्या में बच्चों को गर्म खाना मुहैया नहीं कराया जा सका है। ये सरकारी और अब तक के नवीनतम आंकड़े हैं। अगर हम राज्यों के आंकड़े देखें और उदाहरण के तौर पर राजस्थान को लें तो यहां पर 2018-19 में लगभग 62 लाख बच्चों का दाखिला हुआ लेकिन पीएबी ने 45 लाख बच्चों के लिए ही मिड-डे मील अपू्रव किया है।
बच्चों को मिड-डे मील मुहैया करा पाने में नाकाम रहने वाले बड़े राज्यों में उत्तर प्रदेश पहले नबंर पर आता है। यहां पर सिर्फ 57.08 प्रतिशत नामांकित बच्चों को ही मिड-डे मील मिल पा रहा है। इसके बाद बिहार का नंबर आता है। यहां पर 59.39 प्रतिशत बच्चों को मिड-डे मील मिलता है। तीसरे नंबर पर झारखंड है। यहां के 61.45 प्रतिशत बच्चों को दोपहर का गर्म खाना मिलता है। चौथे नंबर पर मध्य प्रदेश और पांचवें पर राजस्थान हैं। यहां क्रमश: 71.45 और 73.80 प्रतिशत नामांकित बच्चों को मिड-डे मील दिया जा रहा है। बच्चों को मिड-डे मील देने में पूर्वोत्तर के राज्यों का प्रदर्शन अच्छा हैं। अगर हम पांच बड़े राज्यों की बात करें तो उनमें अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल, केरल, असम और कर्नाटक आते हैं जहां 90 प्रतिशत से ज्यादा बच्चों को मिड-डे मील मुहैया कराया जा रहा है। मिड-डे मील में सरकार द्वारा प्रति छात्र खर्च की जाने वाली रकम भी बहुत कम है। यह योजना वैसे तो पूरी तरह से केंद्र सरकार की है, लेकिन इसको तैयार करने पर होने वाले खर्च में केंद्र और राज्यों दोनों की हिस्सेदारी रहती है। इसका फैसला केंद्रीय फंडिंग पैटर्न के आधार पर तय होता है। हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों में दोपहर के खाने पर तैयार करने वाली कीमतों में जो बढ़ोत्तरी की है। इसके तहत प्राइमरी तक के लिए प्रति छात्र 13 पैसे की बढ़ोत्तरी की गई है, जबकि अपर प्राइमरी यानी छठी से आठवीं तक के लिए प्रति छात्र 20 पैसे की बढ़ोत्तरी की गई है। इसके तहत प्राइमरी स्तर के प्रति छात्रों के खाना तैयार करने का खर्च अब 4.48 रुपए हो गया है, इनमें केंद्र 2.69 रुपए देगा, जबकि राज्य 1.79 रुपए का खर्च उठाएगा। वहीं बढ़ोत्तरी के बाद अपर प्राइमरी स्तर के प्रति छात्र खाना बनाने का खर्च 6.71 रुपए कर दिया गया है। इनमें से 4.03 रुपए केंद्र देगा, जबकि 2.66 रुपए राज्य को देना होगा।
भोजन के अधिकार और मिड-डे मील जैसे मसलों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सिराज दत्ता कहते हैं, ‘सरकार का यह हमेशा तर्क रहता है कि स्कूल में पहुंचने वाले बच्चों की संख्या के आधार पर पीएबी से अपू्रवल दिया जाता है लेकिन पिछले साल आधार की अनिवार्यता जैसी बात सामने आई थी। जिसके विरोध के बाद सरकार को सफाई देने पड़ी थी। दूसरी बात सरकार प्रति छात्र खाना बनाने का खर्च इतना कम देती है कि इसमें उन्हें पौष्टिक भोजन उपलब्ध करा पाना ही मुश्किल है। अब अगर 3 करोड़ छात्रों को नामांकन के बावजूद मिड-डे मील नहीं मिल पा रहा है तो यह सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें पौष्टिक भोजन मुहैया कराए।
मिड-डे मील योजना में विसंगतियां
पौष्टिक भोजन उपलब्ध करा कर बच्चों में शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता को विकसित करने, विद्यालयों में छात्र संख्या बढ़ाने, प्राथमिक कक्षाओं में विद्यालय में छात्रों के रुकने की मानसिकता विकसित करने, बच्चों में भाईचारे की भावना विकसित करने और विभिन्न जातियों एवं धर्मों के बीच के अंतर को दूर किया जा सके, इसके लिए मध्याह्न भोजन प्राधिकरण का गठन अक्टूबर 2006 मे किया गया। इस योजना के अंतर्गत विद्यालयों में मध्यावकाश में बच्चों को स्वादिष्ट भोजन दिये जाने का प्रावधान है। प्राथमिक विद्यालयों में उपलब्ध कराये जा रहे भोजन में कम से कम 450 कैलोरी ऊर्जा व 12 ग्राम प्रोटीन एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कम से कम 700 कैलोरी ऊर्जा व 20 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध होना चाहिए। आपको यह भी बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सरकारी स्कूलों, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों, स्थानीय निकाय के स्कूलों, मदरसा और मकतब तक में पढऩे वाले सभी बच्चों को गर्म भोजन दिए जाने की बात कही है।
– श्याम सिंह सिकरवार