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फिर वही नीति

छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने वादा किया था कि सभी मुठभेड़ों की जांच कराएंगे, निर्दोष आदिवासियों को जेलों से रिहा करेंगे और छत्तीसगढ़ में फर्जी मुठभेड़ नहीं होने देंगे। यही नहीं चुनाव प्रचार के समय कांग्रेस नेता राज बब्बर ने कहा था कि ‘नक्सलवादी के सवालों का जवाब देना पड़ेगा जो लोग क्रांति के लिए निकले हुए हैं उनको डराकर या लालच देकर रोका नहीं जा सकता। जब ऊपर के लोग उनका अधिकार छीनते हैं तो गांव के आदिवासी अपना अधिकार पाने के लिए अपने प्राणों की आहूति देते हैं। बंदूकों से फैसले नहीं होते हैं।’
सरकार बनने के बाद भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 1 जून, 2019 को सुकमा जिले के पोलमपल्ली पहुंचे और घोषणा की कि जेल में बंद आदिवासियों के लिए जांच कमेटी गठित की जाएगी। इससे पहले जनवरी में भी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कह चुके हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में पांच या उससे अधिक विशेषज्ञ वाली कमेटी गठित की जाएगी जिसमें सेवानिवृत्त डीजीपी भी होंगे।
इस घोषणा के 10 माह बाद भी आदिवासियों की रिहाई को लेकर सरकार सोती रही तो आदिवासी नेता सोनी सोरी आदिवासियों के साथ सरकार के घोषणा पत्रों और वादों को याद दिलाने के लिए 6 अक्टूबर को जब दंतेवाड़ा जिले के पलनार में इकट्ठा हुईं तो आदिवासियों पर लाठीचार्ज किया गया और सोनी सोरी को गिरफ्तार कर लिया गया। प्रशासन के डराने-धमकाने के बावजूद दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा जिले से पहुंचे हजारों आदिवासी जब तीन दिन तक खुले आसमान के नीचे डेरा डाले रहे तो प्रशासन ने नकुलनार के खेल मैदान में 6 हजार लोगों तक की सभा करने की अनुमति दे दी। इस पर चिंता जाहिर करते हुए भूतपूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने कहा कि मुख्यमंत्री ने पोलमपल्ली जनसभा को संबोधित करते हुए जो घोषणाएं की थी उन घोषणाओं को अमल में लाना मुश्किल प्रतीत हो रहा है, कहीं इन घोषणाओं का हाल भी निर्मला बुच कमेटी जैसा ना हो जाए।
दरअसल कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन की रिहाई के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकार और माओवादियों की तरफ से मध्यस्थता करने वाले लोगों को लेकर निर्मला बुच की अध्यक्षता में कमेटी का निर्माण किया था जिसमें निर्दोष आदिवासियों को जेलों से छोड़े जाने से लेकर आदिवासियों की जमीनों को कॉर्पोरेट को दिए जाने तक की बात करनी थी।
सितंबर, 2014 तक बुच कमेटी ने कई बैठकें की जिसमें 650 से अधिक केसों पर विचार करने के बाद 350 से अधिक मामलों में जमानत दिए जाने की सिफारिश की लेकिन एक भी सिफारिश लागू नहीं हुई। इस कमेटी के अध्यक्ष निर्मला बुच सहित कमेटी के सदस्य बीडी शर्मा की मृत्यु भी हो गई लेकिन कमेटी की सिफारिशों को सरकार ने कूड़े दान में फेंक दिया। क्या बघेल सरकार भी अपने चुनावी घोषणा पत्र और जनवरी व जून में किए गए अपने घोषणा को भूल जाना चाहती है?
पुलिस ने 26 मई को किरंदुल क्षेत्र के हिरोली के जंगलों में पुलिस के साथ मुठभेड़ में हार्डकोर नक्सली के मारे जाने की बात कही थी। एसपी डॉ. अभिषेक पल्लव ने कहा कि ‘हिरोली के जंगल में माओवादियों के होने की खबर पर डीआरजी और पुलिस के जवान सर्चिंग पर गए थे। सर्चिंग के दौरान माओवादियों और जवानों की मुठभेड़ हुई जिसमें विधायक भीमा मांडवी की हत्या में शामिल गुड्डी मारा गया वह 40 से अधिक घटनाओं में नामजद था।’ सोनी सोरी बताती है कि गुड्डी सरकारी योजना के तहत सड़क बनाने के काम में मजदूरी करता था और नंदराज पहाड़ को बचाने कि लड़ाई लड़ रहा था। पुलिस ने काम करते समय गुड्डी को दौड़ाकर गोलीमार दी और मुठभेड़ में माओवादी के मारे जाने की घोषणा कर दी। वह कहती हैं कि प्रदेश में नक्सलियों के नाम पर कई बेगुनाह लोगों को भी जेल में डाल दिया गया है। सोनी सोरी कहती हैं कि जमीन लौटाने और किसानों के कर्जमाफ करने से यह नहीं कहा जा सकता है कि सरकार अच्छा कर रही है। उन्होंने बताया कि जिन महिलाओं ने पहले सुरक्षा बलों द्वारा बलात्कार की शिकायत कि थी पुलिस उनको जाकर मारती-पीटती है। पहले छत्तीसगढ़ सरकार जन सुरक्षा अधिनियम के तहत केस दर्ज करती थी अब यूएपीए कानून के तहत केस दर्ज कर रही है जिससे कि बेकसूर आदिवासी जल्दी जेल से बाहर न आ सके।
सरकार बदली, लेकिन नीयत नहीं बदली
बघेल सरकार के शासन काल में भी आदिवासियों के लिए कुछ नहीं बदला है। आदिवासी कहते हैं कि भूपेश बघेल एक तरफ सामाजिक मंचों पर कहते हैं कि ‘संविधान के द्वारा हमें बोलने, काम करने कि आजादी प्राप्त है, जो जिसका हक है उसको मिलना चाहिए’। दूसरी तरफ वे आदिवासियों के संवैधानिक हकों पर डाका डालते हैं उनकी बोलने की आजादी को छीन रहे हैं। कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में ‘संविधान बचाओ संघर्ष समिति’ के द्वारा छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को ‘सामाजिक न्याय रत्न’ से जिस मंच पर सम्मानित किया गया, उसी मंच से भूपेश बघेल के पिता नंदकुमार बघेल कहते हैं कि माओवादी सही कर रहे हैं। पुलिस को माओवादियों के तरफ से लडऩा चाहिए। आखिर क्या बात है कि सरकार के बाहर रहते हुए माओवादी के क्रियाकलाप को सही बताया जाता है, तो सरकार में आते ही दुश्मन नं. 1 मान लेते हैं? यह दुश्मन नं. 1 किसके फायदे के लिए माना जाता है? बघेल सरकार को अपने चुनावी वादों को पूरा करना चाहिए और एक स्थायी समाधान का रास्ता खोजना चाहिए।
– रायपुर से टीपी सिंह