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तमसो मा ज्योतिर्गमय

वृ हदारण्यकोपनिषद में दिया संदेश ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ यही है कि ‘अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ें’। भारतीय संस्कृति का तेजोमय रूप है यह, जो समूची मानवता में समाहित होकर अखिल विश्व को शांति, सद्भाव और कल्याण का मार्ग दिखाता है। दीपोत्सव इसी की अभिव्यक्ति है। दीपावली निराला प्रकाश पर्व है। दिवस श्रम है, रात्रि विश्रम। रात्रि प्रकाशहीनता है। चंद्र सूर्य से प्रकाशित हैं। वे रात्रि में प्रकाश देने का प्रयास करते हैं। घटते-बढ़ते हुए। पूर्णिमा पूर्ण है। पूर्वजों ने पूर्णिमा में उल्लासपूर्ण प्रकाश अनुभूति देखी। शरद पूर्णिमा उत्सव हो गई। ठीक 15 दिन बाद पूर्ण अंधकार वाली कार्तिकी अमावस्या। तब अंधकार भी अंधकार में अदृश्य था। पूर्वजों ने इसी अमावस्या को झमाझम प्रकाश पर्व बनाया। भारत का शाब्दिक अर्थ ‘प्रकाशरत’ है। भा का अर्थ ‘प्रकाश’ और रत का अर्थ ‘संलग्नता’। दीपपर्व का मुख्य आयोजन अमावस्या की रात्रि होता है, लेकिन मान्यताओं ने इसे पांच दिवसीय मधुमय आयोजन बनाया है। लंका विजय कर अयोध्या लौटे श्रीराम का स्वागत सहस्त्र दीपों द्वारा हुआ। 12 वर्ष के वनवास व एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद पांडवों की वापसी हुई। कुछ लोग इसे भी दीपपर्व से जोड़ते हैं। दीपपर्व का उल्लेख पद्म पुराण व स्कंद पुराण में भी है। लगभग 3500 वर्ष ईसापूर्व कठोपनिषद में यम और नचिकेता के मध्य सांसारिक धन संपदा व वास्तविक ज्ञान पर प्रश्नोत्तरों की स्मृति को भी दीपपर्व से जोड़ा जाता है। इतिहासकार अलबरूनी ने भी दीपावली का उल्लेख किया है।
दीपपर्व का प्रकाश आनंद अचानक नहीं खिला। भारतीय परंपरा में दीपपर्व की निरंतरता है। सातवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक नागनंद में इसे ‘दीपप्रति पादुत्सव’ कहा गया है। नौवीं शताब्दी में राजशेखर ने काव्य मीमांसा में इसे दीपमालिका कहा है। इस पर्व की देवी लक्ष्मी हैं। कहा जाता है कि उन्होंने इसी रात पति रूप में विष्णु का वरण किया। लक्ष्मी और विष्णु का रूपक बड़ा प्यारा है। दोनों क्षीर सागर में शेष शैय्या पर हैं, लेकिन शांत हैं। ‘शान्ताकारं भुजग शयनं’ आश्चर्यजनक है। सांप पर लेटना और शांत रहना। इसीलिए धन की देवी लक्ष्मी रिद्धि-सिद्धि, समृद्धि के विवेकाधीन कोष की स्वाभिमानी हैं।
प्रकाश राष्ट्रधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संधान है। धन समृद्धि और ज्ञान प्रकाश पर भारत के प्रत्येक जन का अधिकार है, लेकिन विषमताएं गहरी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के प्रत्येक गांव तक विद्युत प्रकाश पहुंचाया है। प्रत्येक घर को प्रकाशित करने का उनका ध्येय स्वागत योग्य है। उद्यमी को 59 मिनट में ऋण उपलब्ध कराने की घोषणा दीपावली का गिफ्ट है। ऐसी तमाम योजनाएं और भी हैं, लेकिन जीवनदृष्टि में प्रकाश भरने का काम सरकारें ही नहीं कर सकतीं। अलगाववादी बयान देने वाले प्रकाश धर्म पर आक्रामक हैं। संसदीय मर्यादा हृासमान है। विभाजक सामाजिक अस्मिताएं और मजबूत हुई हैं। हम सब अपना सामाजिक दायित्व क्यों नहीं निभाते? पर्व, उत्सव और संगमन सांस्कृतिक उदात्त भाव में ही प्रकट होते हैं। किसी अमंगल मुहूर्त में दीपपर्व के साथ आतिशबाजी जुड़ी। वायु प्रदूषण जानलेवा है बावजूद इसके पटाखे हवा में जहर घोल रहे हैं। जुआ भी इस पर्व का हिस्सा बना है। गणेश-लक्ष्मी निश्चित ही आहतमन होंगे। उत्स मूल है। उत्सव इसी मूल उत्स में व्यापक होता है। आनंद का अतिरेक बढ़ता है।
आनंद सबको आवृत्त करता है, तब उत्सव बनता है। दीप राग का मूल है-अप्प दीपो भव। स्वयं दीप बनो। बुद्ध ने ढाई हजार वर्ष पहले यही कहा था। तुलसीदास रामचरितमानस में ‘विज्ञानदीप’ प्रतीक लाए। वह सात्विक आस्तिकता को गाय कहते हैं। आस्तिकता की गाय से धर्ममय दूध दुहते हैं। धर्म से ठंडा करते हैं। फिर दही को विचार से मथते हैं-मुदिता मथै विचार मथानी। योग अग्नि पर तपाकर ज्ञान घृत निकालते हैं। चित्त के दीप में ज्ञान घृत डालते हैं फिर जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति की बाती। तब विज्ञानमय दीप बनता है-एहि विधि लेसै दीप/तेज राशि विज्ञानमय। फिर विज्ञानमय बुद्धि पर समता का आधार बनाएं-समाता दिअटि बनाई। आधुनिक भारत में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की महत्ता है, लेकिन समता-समरसता का अभाव है। गरीबी की खाई गहरी है। यहां अंधकार ही अंधकार है। समृद्धि के शिखर पहाड़ से भी ऊंचे हैं। हिंसा के विश्वासी समूह संप्रभु गणतंत्र को चुनौती देते हैं। यहां उनके पक्षकार बुद्धिजीवी कहे जाते हैं।
कृति बहुरूपवती है। यह सदा से है। प्रतिपल नए रूप में होती है, लेकिन इसकी श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति प्रकाश है। छांदोग्य उपनिषद के अनुसार ‘प्रकृति का समस्त सर्वोत्तम प्रकाश रूप है।’ सूर्य प्रकृति का भाग हैं। वैदिक वांग्मय में देवता हैं। सहस्त्र आयामी प्रकाशदाता हैं। वैदिक पूर्वज प्रकृति में भरी पूरी प्रकाश ऊर्जा का केंद्रक न्यूक्लियस जानना चाहते थे। इस जिज्ञासा के उत्तर में कठोपनिषद मुंडकोपनिषद व श्वेताश्वतर उपनिषद में एक ही बात कही गई है ‘उस केंद्र पर सूर्य प्रकाश नहीं, चंद्र किरणों का भी नहीं। न विद्युत है और न अग्नि, लेकिन उसी एक ज्योति केंद्र से यह सब प्रकाशित है।
प्रकाश प्राचीन भारतीय दर्शन व विज्ञान की सनातन प्यास है। वृहदारण्यक उपनिषद में ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय यानी अंधकार से प्रकाश व असत से सत की ओर चलने का संदेश है।’ गीता में अर्जुन ने विराट रूप देखा, बोला ‘दिव्य सूर्य सहस्त्राणि यानी सहस्त्रो सूर्यों का प्रकाश देख रहा हूं। ऋग्वेद के अनुसार, ‘जन-जन को प्रकाश से भरने के लिए ही अग्नि ने अमर सूर्य को आकाश में बिठाया है।’ भारत की इसी सनातन ज्योतिर्गमय आकांक्षा का सांस्कृतिक आयोजन दीपावली है।
– ओम