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दांव पर साख

झाबुआ उपचुनाव भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए साख का सवाल बना हुआ है। इसलिए दोनों पार्टियों ने विधानसभा क्षेत्र में पूरी ताकत झोंक दी है। इस बार भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही दिवाली खास रहने वाली है। 24 अक्टूबर को झाबुआ विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आएंगे और 27 अक्टूबर को दिवाली है। ऐसे में विजय होने वाले के यहां जमकर आतिशबाजी होगी। झाबुआ की जनता तय करेगी कि दिवाली पर पटाखे भाजपा के भानू या कांग्रेस के भूरिया के यहां फूटेंगे।
झाबुआ उपचुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस में घमासान शुरू चुका है। कांग्रेस से पूर्व सांसद कांतिलाल भूरिया मैदान में है, वहीं भाजपा ने युवामोर्चा जिलाध्यक्ष भानू भूरिया को अपना चेहरा बनाया है। अब चुनावी शोर और तेज हो जाएगा। भाजपा-कांग्रेस के नेता अपने-अपने प्रत्याशी की जीत के लिए चुनावी चक्रव्यूह बनाने और युद्ध स्तर पर प्रचार में जुट गए। 21 अक्टूबर को मतदान होगा और 24 अक्टूबर को मतगणना के साथ ही यह स्पष्ट हो जाएगा कि सूबे की सत्ता पर जनता ने किसे काबिज किया है। नतीजों के ठीक दो दिन बाद 27 अक्टूबर को दिवाली है। जीतने वाले उम्मीदवार के यहां जश्न होगा और मिठाई बंटेगी। चुनावी मौसम के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि इस बार झाबुआ की जनता ही तय करेगी की भानू या कांतिलाल भूरिया कहां दिवाली पर पटाखे फूटेंगे। अब तक अपनी-अपनी जीत के दावे दोनों ही दलों की ओर से किए जा रहे हैं।
झाबुआ का किला फतह करने के लिए दोनों ही दल जी-जान से जुट गए हैं। लोगों के बीच चर्चा है कि झाबुआ विधानसभा उपचुनाव में साल 2015 में हुए लोकसभा उपचुनाव जैसी स्थिति भी बन गई है। इसे संयोग ही कहा जाएगा कि तब (लोकसभा उपचुनाव) प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। पूरी सरकार अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए आदिवासी अंचल में लग गई थी। इसके बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं रहा था और कांग्रेस प्रत्याशी ने जीत हासिल की थी। फिलहाल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। उपचुनाव जीतना कांग्रेस उम्मीदवार के साथ-साथ सरकार के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। सरकार ने झाबुआ में पूरी ताकत झोंक दी है। चुनाव में कई मंत्री यहां तैनात रहेंगे। विधायकों की भी लंबी फे हरिस्त है। अब जनता लोकसभा उपचुनाव की तरह चौंकाएगी या सरकार के साथ रहेगी, ये वक्त ही बताएगा। आदिवासी अंचल में यदि भाजपा जीतती है, तो इसका श्रेय सिर्फ आरएसएस को ही जाता है, क्योंकि कांग्रेस के गढ़ में भाजपा को खड़ा करने के लिए संघ ने ही जमीन तैयार की और अब झाबुआ उपचुनाव में भी संघ जमीनी स्तर पर जीत का रास्ता बनाने में जुटा है। सूत्रों के मुताबिक बीते करीब एक माह से संघ कार्यालय पर भी आवाजाही तेज हुई है और इसे उपचुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा उम्मीदवार घोषित होने से पहले ही उसकी जीत के लिए संघ में काम शुरू हो गया था।
झाबुआ विधानसभा सीट पर होने वाले उपचुनाव में जीतने के लिए कांग्रेस-भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। कांग्रेस जहां एक तरफ अपने उम्मीदवार कांतिलाल भूरिया के लिए भरपूर समर्थन जुटाने में लग गई है, वहीं अंतरकलह से लडऩे का भी पुख्ता इंतजाम किया जा रहा है। उधर, प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने झाबुआ की चुनावी बिसात पर एक युवा चेहरे को उतारकर कांग्रेस की राह में बाधा करने का प्लान बना लिया है। दोनों पार्टियों की जोर-आजमाइश से यह उपचुनाव कांग्रेस और भाजपा, दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन चुका है। प्रदेश के मंत्री सुखदेव पांसे के मुताबिक सत्ता पर काबिज होने के बाद कमलनाथ सरकार ने आदिवासियों को वन अधिकार कानून के तहत पट्टे देने और साहूकारी कर्जमाफी की सौगात देकर आदिवासी हित में कई फैसले किए हैं। चुनाव में इसका प्रतिफल कांग्रेस सरकार को मिलेगा। उधर, मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि छिंदवाड़ा की तरह झाबुआ का विकास करूंगा और झाबुआ से आजीवन रिश्ता रखूंगा। उन्होंने कहा कि पंद्रह साल में भाजपा सरकार ने खजाना खाली कर दिया है। फिर भी हम प्रदेश में विकास कर रहे हैं।
वहीं भाजपा अपने प्रत्याशी को जिताने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में मोर्चा संभाल चुकी है। यहां इंदौर संभाग के सभी विधायकों और सांसदों ने महीनों से जमीनी जमावट की है। शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि कांग्रेस ने अपने अब तक शासनकाल में ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे यह कहा जाए कि प्रदेश की जनता उससे खुश है। उनका कहना है कि इसका प्रभाव विधानसभा उपचुनाव में दिखेगा। कांग्रेस ने विधानसभा में विधायक दल की संख्या बढ़ाने के लिए झाबुआ उपचुनाव की जीत पर पूरा ध्यान लगा रखा है। जीत की इस राह में पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी आड़े न आए, इसके लिए पार्टी के भीतर रुठों को मनाने की कवायद तेज कर दी गई है। इसी क्रम में झाबुआ के प्रभारी मंत्री सुरेंद्र सिंह बघेल को रूठों को मनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यदि कांग्रेस पार्टी इस चुनौती से निपट पाती है तो तय है कि कांग्रेस यहां पर मजबूती के साथ खड़ी हो सकेगी।
कांग्रेस के लिए झाबुआ विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव जीतना कितना जरूरी है, इसका अंदाजा यहां पर सरकार के मंत्रियों की तैनाती और पार्टी की सक्रियता से लगाया जा सकता है। पार्टी आलाकमान ने झाबुआ सीट को कांग्रेस-मय बनाने के लिए एक दर्जन मंत्रियों को मोर्चा संभालने का निर्देश दिया है. सरकार ने आधे दर्जन से ज्यादा मंत्रियों की ड्यूटी झाबुआ में लगाई है। इनमें सुरेंद्र सिंह बघेल, विजयलक्ष्मी साधौ, प्रियव्रत सिंह, जीतू पटवारी, जयवद्र्धन सिंह, ओमकार सिंह मरकाम और हर्ष यादव का नाम शामिल हैं। ये मंत्री झाबुआ में डेरा डालकर कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने का काम करेंगे। झाबुआ में मुख्यमंत्री कमलनाथ एवं उनकी सरकार की साख दांव पर होगी। इसलिए उप चुनाव में कमलनाथ के चेहरे को आगे रखकर ही कांग्रेस चुनाव लड़ेंगी। इस सीट पर चुनाव में कांग्रेस की ओर से जहां मुख्यमंत्री कमलनाथ तो भाजपा की ओर से पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह एवं नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की साख दांव पर है। दोनों पार्टियों ने अब तक प्रत्येक प्रत्याशी घोषित नहीं किए है, लेकिन प्रचार की रूपरेखा को अंतिम रूप देने का काम जरूर शुरू कर दिया गया है। बताया जा रहा है कि दोनों दल ब्लॉक एवं पंचायत स्तर पर समूह बनाकर आदिवासी नेताओं को पार्टी को जीत दिलाने की जवाबदारी सौंपने वाले हैं। भाजपा केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते के नेतृत्व में ही झाबुआ में मोर्चा संभालने की तैयारी कर रही है।
झाबुआ सीट पर कांग्रेस नेता जेवियर मेड़ा का भी नाम रेस में शामिल था लेकिन पार्टी ने भूरिया पर भरोसा जताते हुए उन्हें टिकट दिया है। अभी तक मेड़ा की ओर से किसी भी तरह का विरोध नहीं किया गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस मेड़ा को भूरिया का साथ देने के लिए बड़ी सौगात देगी। निगम मंडलों में फिलहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ ने नियुक्तियां नहीं की हैं। बताया जा रहा है मेड़ा को जल्द ही बड़े पद से नवाजा जा सकता है।
राज्य कांग्रेस अनुसूचित जनजाति (एसटी) सेल अध्यक्ष अजय शाह ने बताया कि मेड़ा ने कांतिलाल भूरिया के नाम का प्रस्ताव पार्टी के सामने रखा था। प्रदेश में आदिवासी नेताओं में भूरिया से कोई भी बड़ा चेहरा नहीं है। भूरिया के नाम की घोषणा बीते हफ्ते की गई थी और उन्होंने अपना नामांकन दाखिल कर दिया है। जहां तकत मेड़ा की बात है उन्होंने अभी तक इस संबंध में कोई भी बात पार्टी के सामने नहीं रखी है। अगर मेड़ा भूरिया के लिए उप चुनाव में समर्थन करते हैं तो पार्टी उन्हें निगम मंडल में नियुक्ति दे सकती है। उप चुनाव के बाद निगम मंडल में सीएम नियुक्ति करेंगे। इनमें से किसी भी जगह मेड़ा को भी नियुक्ति दी जा सकती है।
भाजपा कांग्रेस में सीधी जंग
भाजपा विधायक जीएस डामोर के सांसद बनने के बाद यह सीट खाली हुई है। भाजपा एक बार फिर से यह सीट जीतना चाहेगी। भाजपा इस चुनाव में कांग्रेस सरकार के खिलाफ उपजी नाराजगी, बारिश में बर्बाद हुई फसलों और केन्द्र सरकार के 370 जैसे निर्णयों के दम पर चुनाव जीतने की तैयारी कर रही है। वहीं कांग्रेस कर्जमाफी और आदिवासियों को लेकर की गई घोषणाओं को भुनाने के प्रयास में है। इस सीट से जेवियर मेढ़ा भी दावेदारी जाता रहे थे। पिछली बार जब उन्हें टिकट नही मिला तो वे निर्दलीय मैदान में उतर गए थे। जिसका नुकसान कांग्रेस को हुआ। अब एक बार फिर वही स्थिति है, देखना होगा मेढ़ा क्या रुख दिखाते हैं। वही टिकट को लेकर चल रहे मंथन के बीच ऐसी खबरें भी सामने आई थी की नाराज चल रहे जेवियर मेडा को पार्टी अपना उम्मीदवार घोषित कर कांतिलाल भूरिया को राज्यसभा भेजने का आश्वासन देकर संतुष्ट कर सकती है। लेकिन भूरिया के नाम की घोषणा से इन अटकलों पर भी विराम लग गया। झाबुआ विधानसभा उपचुनाव को लेकर दोनों ही प्रमुख दलों ने मैदान संभाल लिया है। 30 सितंबर को कांग्रेस और भाजपा ने शक्ति प्रदर्शन के साथ अपने प्रत्याशियों कांतिलाल भूरिया और भानू भूरिया के नामांकन दाखिल करवाए। मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान झाबुआ का किला जीतने के लिए सड़कों पर उतरे।
झाबुआ में होगी राजनीतिक परीक्षा
कमल नाथ के सामने अब पहली राजनीतिक परीक्षा झाबुआ उपचुनाव को जीतने की है और इस परीक्षा में खरा उतरने के बाद वे यह भी सिद्ध कर देंगे कि राजनीतिक मोर्चे पर वे किसी से कम नहीं हैं। आज तक तो भाजपा तथा उसके नेता कमलनाथ की घेराबंदी के लिए जो प्रयास कर रहे हैं और उसका जिस प्रकार कमलनाथ सामना करते रहे हैं उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि विपक्ष डाल-डाल तो कमलनाथ पात-पात। झाबुआ की आधी लड़ाई तो उन्होंने पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और पूर्व विधायक जेवियर मेढ़ा को एकसाथ लाकर जीत ली है अब कमलनाथ के सामने यही चुनौती है कि जेवियर को न केवल संभाल कर रखें बल्कि उन्हें पूरी निष्ठा से भूरिया के पक्ष में सक्रिय करें। पूर्व मुख्यमंत्री सांसद दिग्विजय सिंह ने भी दोनों को एकजुट करने में अपने प्रभाव का उपयोग किया और इसके बाद ही भूरिया के टिकट की घोषणा हुई। भूरिया ने भी दावा किया है कि उनके प्रस्तावक जेवियर ही हैं। यदि भूरिया और जेवियर के हाथ ही नहीं दिल भी मिल गए तो फिर भाजपा को अपनी सीट बचाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। कांतिलाल भूरिया 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद रिक्त हुई सीट पर हुए उपचुनाव में दिलीप सिंह की बेटी निर्मला भूरिया को भारी मतों से पराजित फिर लोकसभा जा पहुंचे थे। इस बार लोकसभा का चुनाव भाजपा के गुमान सिंह डामोर से भूरिया हार गए लेकिन दिलचस्प पहलू यह है कि डामोर उस विधानसभा क्षेत्र झाबुआ में अपनी बढ़त कायम नहीं रख पाये जहां से वे विधायक थे। अब देखने वाली बात यही होगी कि इस उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया जीतने की अपनी पिछली परम्परा को कायम रख पाते हैं या नहीं।
– सुनील सिंह