raj kaj

अब पैराशूट प्रत्याशी नहीं

कमलनाथ सरकार द्वारा नगरीय निकाय चुनाव में महापौर और अध्यक्ष पद के सीधे चुने जाने की प्रक्रिया समाप्त करने के फैसले से गली-मोहल्लों की नेतागिरी करने वाले नेताओं के चेहरे चमक गए हैं। इसके साथ ही महापौर-अध्यक्ष की उम्मीदवारी की सीधी चाह रखने वाले निराश हो गए हैं। वजह यह हैं कि अब उन्हें पहले अपने वार्ड के मतदाताओं का समर्थन हासिल करना होगा। फिर जोड़-तोड़ की गणित भिड़ानी होगी, तब वे इस पद को पा सकेंगे। फिलहाल इस फैसले से वर्ष 2003 के पहले की दिग्विजय सरकार के जमाने का पैटर्न लौट गया है।
राजनीतिक जानकारों की माने तो 15 साल पहले प्रदेश में भाजपा सरकार आने के बाद महापौर-अध्यक्ष का सीधे चुनाव की प्रणाली लागू की गई थी। लेकिन कमलनाथ सरकार ने इस व्यवस्था को बदल दिया है। ऐसे में उन नेताओं को झटका लगा है जो अपने नाम या रसूख के दम पर महापौर बनने का सपना संजोए थे। गौरतलब है कि प्रदेश के नगर निगमों में महापौर के दावेदार अपने जन्मदिन या अन्य अवसरों पर पर बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर अपनी राजनीतिक हैसियत प्रदर्शित कर रहे थे तो कुछ सीधे पैराशूट दावेदारी यानी पिछले दरवाजे से अचानक टिकट घोषणा कराने की तैयारी में जुटे थे। ऐसे दावेदारों को फिलहाल कमलनाथ सरकार के फैसले से झटका लगा है। इससे अब यह होगा कि उन्हें पहले अपने वार्ड के मतदाताओं के सामने नेतागिरी का इम्तहान देना होगा। फिर पार्षदों का दो तिहाई समर्थन हासिल करना होगा। फिर अपने राजनीतिक आकाओं का आर्शीवाद लेना होगा। इस प्रक्रिया में जो मेहनती होगा, वहीं महापौर बन सकेगा। फिलहाल ऐसे पैराशूट नेताओं के चेहरे लटक गए हैं।
प्रदेश में महापौर के लिए सीधा चुनाव नहीं कराने के राज्य सरकार के फैसले से अब महापौर बनने का सपना देख रहे कांग्रेस-भाजपा के कई दिग्गजों को पहले पार्षद बनने के लिए वार्ड की जंंग जीतना होगी। भले ही सरकार के इस फैसले का भाजपा विरोध कर रही है, पर उसके महापौर पद के उम्मीदवारों को पार्षदी की राह से ही आगे बढऩा होगा। 20 साल से महापौर के प्रत्यक्ष चुनाव होने से पार्टी वरिष्ठ नेता को ही मैदान में उतारती थी। दूसरी-तीसरी लाइन के नेता पार्षद चुनाव लड़ते थे, पर अब बड़े नेताओं को भी जोर-आजमाइश करना होगी।
जानकार बताते हैं कि कांग्रेेस ने अपने हिसाब से महापौर का चुनाव तय करवाकर भाजपा के पूरे गणित बिगाड़कर रख दिए हैं। नवम्बर-दिसम्बर में चुनाव होने को लेकर भाजपा के बड़े नेताओं ने अपने प_ों को टिकट देने का आश्वासन तक दे दिया था, लेकिन बदले समीकरण से अब क्षेत्र में जो मजबूत होगा, वही चुनाव जीत सकेगा। वैसे इसको लेकर भाजपा ने चुनाव समिति बनाई थी, जो लोगों में जाकर इसके खिलाफ जनआंदोलन करने की बात कह रही है।
जिस हिसाब से चुनाव की तैयारी की जा रही है, उससे नगरीय निकाय चुनाव अप्रैल और मई में होंगे। कांग्र्रेस जो ताना-बाना बुन रही है उस हिसाब से भाजपा की रणनीति पूरी तरह फेल हो जाएगी। भाजपा यह मानकर चल रही थी कि जिस तरह लोकसभा चुनाव में चारों ओर पार्टी को बहुमत मिला था, उसका फायदा नगरीय निकाय चुनावों में मिलेगा। वैसे भाजपा के नगरीय निकाय चुनाव के सारे गणित गड़बड़ा गए हैं, क्योंकि परिसीमन के इंतजार में पूरी प्रक्रिया ही बदल दी गई है। परिसीमन के बाद तो और भी बदलाव हो जाएगा। जिसे महापौर बनना है उसे सुरक्षित सीट से पार्षद का चुनाव लड़वाना होगा, नहीं तो महापौर बनाने में ही भाजपा को पसीने आ जाएंगे। वैसे कई नेता खुद अपने क्षेत्र से ही पार्षद बनने का सपना संजोए चल रहे थे जो गड़बड़ होने वाला है। उधर, राज्य सरकार के फैसले पर भाजपा ने ऐतराज जताया है।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि कांग्रेस राज्य भर में अप्रत्यक्ष रूप से मेयर चुनाव के लिए जा रही है क्योंकि वह जानती है कि प्रत्यक्ष चुनाव उसके लिए महंगे साबित होंगे। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में प्रदेश की 29 में से 28 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस की हार हुई है। इसलिए लोकतंत्र को कमजोर करने के लिए वे येनकेन प्रकारेण अपने लोगों के लिए नगरीय निकायों के प्रमुख या मेयर का पद हासिल करना चाहते हैं। भाजपा इसे लेकर एक जनआंदोलन खड़ा करने का मन बना रही है। इसके विरोध में बनाई गई भाजपा की नगरीय निकाय चुनाव समिति वरिष्ठ नेताओं से विचार कर रही है कि क्या किया जाए। हालांकि भाजपा कुछ भी कर लें, कैबिनेट में एक बार सहमति बनने के बाद अब कुछ नहीं हो सकता।
वार्ड परिसीमन के लिए भी मिला समय
सरकार द्वारा वार्ड परिसीमन के लिए समय नगरीय निकाय चुनाव से दो माह पहले तक करना सुनिश्चित कर दिया है। यह प्रक्रिया फिलहाल नगरीय प्रशासन विभाग के तय कार्यक्रम के मुताबिक 17 अक्टूबर से नवम्बर के बीच होनी थी। इसको लेकर कांग्रेस द्वारा वार्ड पार्षदों से लेकर बूथ कार्यकर्ताओं से भी रायशुमारी की जा रही थी। फिलहाल 48 की बजाय 54 वार्ड करने की योजना भी बनाई गई है। सरकार के फैसले के बाद कांग्रेस नेताओं को वार्ड परिसीमन के लिए वक्त मिल जाएगा। नगर निगम का पिछला चुनाव वर्ष 2015 में जनवरी-फरवरी में हुआ था। इस बार यह चुनाव अप्रैल-मई 2020 में होना संभावित बताया गया है।
– अरविंद नारद