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कमजोर हुई भाजपा

मध्यप्रदेश की राजनीति में मालवा का अहम रोल रहता है। प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर की राजनीति के इर्द-गिर्द पूरे मालवा की राजनीति घूमती है। इंदौर पिछले कई सालों से भाजपा का गढ़ रहा है। यहां भाई यानी कैलाश विजयवर्गीय और ताई यानी सुमित्रा महाजन के बीच वर्चस्व की जंग छिड़ी रहती है। लेकिन अब दोनों की निष्क्रियता से यहां भाजपा कमजोर होती जा रही है।
भाजपा की राजनीति में इन दिनों अंदर ही अंदर कुछ पक रहा है। ताई और भाई की इंदौर में पकड़ ढीली होते ही कांग्रेस अपनी पकड़ मजबूत करने में जुट गई है। हालांकि दोनों नेताओं की कमी को दूर करने के लिए अचानक पूर्व संगठन मंत्री कृष्णमुरारी मोघे सक्रिय हो गए हैं और रोज किसी न किसी बहाने कार्यालय में बैठकर कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। यही नहीं अब तो उन्हें हर कार्यक्रम में देखा जा सकता है।
पिछले 15 सालों में भारतीय जनता पार्टी की इंदौर की राजनीति का जो हाल हुआ है, वो किसी से छुपा नहीं है। उमाशशि शर्मा को महापौर का टिकट देने से शुरू हुई भाजपा की अंदरूनी राजनीति की हलचल अभी तक नहीं थमी है। एक समय ऐसा था जब इंदौर के वरिष्ठ भाजपा नेताओं की राय सभी बड़े मामलों में ली जाती थी और चाहे मुख्यमंत्री हो या कोई बड़ा नेता इंदौर की राजनीति से डरता था और यहां के नेताओं को भोपाल में बराबर प्रतिनिधित्व मिलता था, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के संगठन में पैर जमाने के बाद सबसे पहले भाई यानी कैलाश विजयवर्गीय को केन्द्रीय संगठन में भेजने के बहाने उनकी प्रदेश से रवानगी की गई और शहर तथा आम कार्यकर्ताओं की आवाज उठाने वाला गुट कमजोर होता गया। भाई के साथ-साथ ताई गुट भी शहर में सक्रिय था, लेकिन उसमें इतनी ताकत नहीं थी, फिर भी ताई के नाम पर शहर में गुटबाजी चलती रही और पार्टी की 8 बार की सांसद तथा बाद में लोकसभा स्पीकर बनने के बाद संगठन में ताई का हस्तक्षेप बढ़ता गया और इंदौर से किसी भी नेता को न तो प्रदेश और न ही केन्द्र स्तर पर तवज्जो मिल पाई। अब ताई किसी भी पद पर नहीं है और न ही उनके गुट का कोई नेता बड़ा पदाधिकारी है। ऐसे में अब भाजपा के पूर्व संगठन मंत्री और पूर्व महापौर कृष्णमुरारी मोघे की शहर की राजनीति में सक्रियता लगातार बढ़ते जा रही है। दोनों गुट कमजोर होने के चलते मोघे आजकल हर आयोजन में नजर आ रहे हैं, ताकि वे अपने समर्थकों की संख्या बढ़ा सकें।
इंदौर को सरकार में प्रतिनिधित्व नहीं मिलना भी बड़ा कारण
शिवराजसिंह सरकार में कैलाश विजयवर्गीय ही आखिरी मंत्री रहे, लेकिन जब से उन्हें केन्द्रीय टीम में भेजा गया है, उसके बाद इंदौर से किसी को भी सरकार में मंत्री के रूप में नहीं लिया गया। बार-बार चौहान ने घोषणा की कि इंदौर से दो मंत्री बनाए जाएंगे, लेकिन आखिरी तक किसी को भी तवज्जो नहीं दी और इंदौर जैसे बड़े शहर का राजनीतिक नेतृत्व खत्म कर दिया।
ये हाल है विधानसभा के नेताओं के
विधानसभा 1- ताई से जुड़े गुप्ता की विधायकी जाने के बाद 1 नंबर में कोई बड़ा नेता नहीं बचा है। कई छोटे-छोटे नेता हैं जो अलग-अलग गुट से हैं। विधायक उषा ठाकुर का भी एक तरह से यहां से वर्चस्व खत्म हो गया है और उन्हें शहर से बाहर कर दिया है। सत्तन गुरू को सक्रिय राजनीति से मतलब नहीं है। वे तो उस समय प्रकट होते हैं, जब उन्हें लगता है कि भाजपा की राजनीति ठीक नहीं चल रही है।
विधानसभा 2- दो नंबर में रमेश मेंदोला वहीं के वहीं हैं। विजयवर्गीय के केन्द्रीय नेतृत्व में जाने के बाद उन्होंने उनकी विरासत को वैसा ही रखा है। दो नंबर में किसी और बड़े नेता के बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भाजपा की राजनीति में कितना भी भूचाल आया, लेकिन दो नंबर अपनी जगह से डिगा नहीं। वैसे दो नंबर के बारे में मशहूर है कि वहां एक ही आदेश चलता है और सब उस आदेश के पीछे।
विधानसभा 3- यहां से आकाश विजयवर्गीय के विधायक बनने के बाद उषा ठाकुर और अन्य गुट के समर्थक भी उनके साथ हो गए हैं। गोपी नेमा यहीं से विधायक का टिकट चाह रहे थे, लेकिन नहीं मिला। उन्होंने अपने आपको संगठन तक सीमित कर लिया है। उनकी नजर अब महापौर के टिकट पर है, लेकिन ये भी दूर की कौड़ी नजर आ रहा है।
विधानसभा 4- 4 नंबर को अयोध्या की तरह मजबूत किए हुए महापौर मालिनी गौड़ अभी तक अपने क्षेत्र से बाहर नहीं निकल पाई। महापौर के रूप में उन्हें पूरे शहर की बड़ी शक्ति के रूप में उभरने का मौका मिला था, लेकिन वे अपना दायरा नहीं बढ़ा पाई। उनके पुत्र एकलव्य हिन्द रक्षक तक सीमित हो गए। चार नंबर में एक और नेतृत्व था जो सांसद के रूप में बाहर निकल गया। वैसे मोघे भी यहीं से हैं, लेकिन वे क्षेत्रीय राजनीति की बजाय शहर और प्रदेश की राजनीति में सक्रिय हैं।
विधानसभा 5- विधायक महेन्द्र हार्डिया जब से विधायक हैं, तब से यहां से कोई बड़ा नेता बनकर नहीं उभरा है। पांच नंबर का आधा क्षेत्र 2 नंबर विधानसभा से टूटकर बना है तो यहां के आधे नेता दो नंबर में हाजिरी भराते हैं। भंवरसिंह शेखावत जैसे नेता भी यहीं रहते हैं, लेकिन वे भी विधायक का चुनाव हारने के बाद भाजपा की सक्रिय राजनीति से दूर हैं। ऐसे में दूर-दूर तक कोई बड़ा नेता यहां से भी नहीं है।
विधानसभा राऊ- राऊ में जिस तरह से मधु वर्मा सक्रिय हैं, वे भी महापौर के टिकट की दावेदारी में हैं। जिराती भी समय-समय पर क्षेत्र में सक्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन दोनों में ही बड़ा गुट चलाने की क्षमता नहीं है। जिराती हैं तो प्रदेश उपाध्यक्ष, लेकिन वे भी अपना दायरा बढ़ाने में सफल नहीं हो पाए, जबकि विधानसभा हारने के बाद वर्मा पार्टी के कार्यक्रमों में भीड़ लाकर अपना वर्चस्व कायम रखे हुए है।
– नवीन रघुवंशी