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लक्ष्य पूरा, मिशन अधूरा!

2 अक्टूबर को भारत पूरी तरह खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) होने का दावा करने जा रहा है। अब देखना यह है कि ओडीएफ का यह स्वयंभू दर्जा कितना टिकाऊ होगा। सरकार ने 5 साल पहले देश में 10 करोड़ शौचालय बनाने का जो लक्ष्य निर्धारित किया था, उसे पूरा कर लिया गया है। लेकिन स्थिति यह है कि आज भी लोग खुले में शौच करते देखे जा रहे हैं। सितंबर के आखिरी दिन तक देशभर में जो नजारा देखने को मिला उससे यही कहा जा सकता है कि लक्ष्य तो पूरा कर लिया गया है, लेकिन स्वच्छ भारत मिशन अभी भी अधूरा ही है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती पर 2 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश को खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित कर सकते हैं। सरकार ने जब पांच साल पहले स्वच्छ भारत मिशन शुरू किया था तो लक्ष्य रखा गया था कि 2 अक्टूबर 2019 तक देश में 10 करोड़ शौचालय बनाए जाएंगे और देश में कोई भी खुले में शौच नहीं करेगा। सरकार का दावा है कि यह लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। 2 अक्टूबर को स्वयं प्रधानमंत्री इसकी घोषणा करेंगे। भारत जैसे देश के लिए इसे बहुत बड़ी सफलता माना जा रहा है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या केवल शौचालय बना देने से स्वच्छ भारत मिशन पूरा हो गया है? इस सवाल के तह में जाने पर यह तथ्य सामने आता है कि कागजों पर भले ही कई राज्य, कई जिले, कई गांव खुले में शौचमुक्त हो चुके हैं, लेकिन मैदानी स्थिति अलग है। आज भी मुंबई, दिल्ली, भोपाल जैसे बड़े शहरों में लोग खुले में शौच करते देखे जा सकते हैं। इससे गांवों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
क्या हम गर्व करें?
देश में 5 साल के दौरान 10 करोड़ शौचालय बना दिए गए हैं। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश खुले में शौच से मुक्ति की दहलीज पर खड़ा है। तो क्या हम इस पर गर्व करें? सवाल इसलिए उठ रहा है कि जिस देश में पीने के लिए पानी की समस्या सालभर बनी रहती है, उस देश में लोग शौचालय का उपयोग किस तरह कर पाएंगे। मप्र, महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़ सहित दक्षिण भारत के कई ऐसे राज्य हैं, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी के लिए लोगों को कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि इन गांवों के लोग शौचालय का उपयोग करते होंगे। सरकारी आंकड़ों के अनुसार फरवरी 2019 तक देश के 93 फीसदी ग्रामीण घरों में शौचालय बन चुके थे, जबकि इनमें से 96 फीसदी ग्रामीण इनका इस्तेमाल भी कर रहे थे, जिससे पता चलता है कि व्यवहार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। तब, 99 फीसदी शौचालयों को बिल्कुल अच्छी तरह बनाया गया था, जो साफ सुथरे थे और 100 फीसदी शाचौलयों में मल को ‘सुरक्षित’ तरीके से निपटाया जा रहा था। वहां कोई प्रदूषण नहीं था और यहां तक कि 95 फीसदी गांवों में कहीं पानी खड़ा नहीं था, कोई गंदा पानी नहीं था और गंदगी थी भी पर बहुत कम। यह आश्चर्यजनक स्थिति है।
दरअसल, मप्र सहित अन्य राज्यों में जिस तरह की स्थिति देखने को मिली है, उससे यह साफ है कि स्वच्छ भारत मिशन को सफल बनाने के लिए अभी सरकार को बहुत काम करने होंगे। अफसरों ने कागजों पर गांवों को ओडीएफ घोषित तो कर दिया है, लेकिन गांवों में निर्मित शौचालयों में सामान रखे हुए हैं। मप्र का कोई भी ऐसा गांव नहीं है, जहां यह तस्वीर न देखने को मिली हो। फिर ऐसे में गर्व कैसे किया जा सकता है।
शौचालय वाले भी जाते हैं खुले में शौच
यह सही है कि लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता जगी है। अब लोग अपने आसपास को स्वच्छ रखने पर जोर दे रहे हैं। सरकार के निर्देशों का पालन हो रहा है, लेकिन भारत को खुले में
शौच मुक्त देश बनने में अभी और वक्त लगेगा। क्योंकि अभी तक जितने भी सर्वे हुए हैं, उसमें लगातार खामियां सामने आई हैं। हर सर्वे के बाद ये सवाल उठे हैं, कि क्या गांवों में शौचालय बना देना ही काफी है? क्या इसका इस्तेमाल करना भी मायने रखता है या नहीं? क्या सिर्फ शौचालय बना कर गांवों को खुले में शौच मुक्त यानी ओडीएफ घोषित किया जा रहा है? हाल ही में एक सर्वे रिपोर्ट आई है कि उत्तर भारत के गांवों में जिनके घर शौचालय बन भी गए हैं उनमें से 23 फीसदी लोग खुले में ही शौच करते हैं। यानी जिनके घर शौचालय नहीं बने हैं उनकी तो बात ही दूर है। ऐसे घरों के लोग जाहिर तौर पर खुले में ही शौच करते हैं और उन घरों की महिलाओं को रात के अंधेरे का इंतजार करना पड़ता होगा। ऐसे में गांवों, पंचायतों, जिलों और राज्यों को खुले में शौच मुक्त यानी ओडीएफ कैसे घोषित किए जा रहे हैं?
केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के मुताबिक, शौचालय के इस्तेमाल पर ही ओडीएफ घोषित किया जा सकता है। यानी जब तक किसी गांव या पंचायत के सभी घरों के सभी सदस्य शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते हैं तब तक उस गांव को ओडीएफ घोषित नहीं किया जा सकता। तो क्या सरकार इस नियम के आधार पर खुले में शौच मुक्त घोषित कर रही है? स्वच्छ भारत कार्यक्रम को लेकर कराए गए एक सर्वेक्षण से तो ऐसा नहीं लगता। भले ही सरकार द्वारा शौचालय बना दिए गए हों, लेकिन लोगों द्वारा इनका पूरा इस्तेमाल अभी भी नहीं किया जा रहा है। स्वच्छ भारत मिशन का मुख्य उद्देश्य देश को खुल में शौच से मुक्त करना है।
27 प्रतिशत करते हैं खुले में शौच
भारतीय सांख्यिकी संस्थान में एक विजिटिंग रिसर्चर यानी अतिथि शोधकर्ता डायने कॉफे के नेतृत्व में एक टीम ने आंकड़ों का विश्लेषण किया है। टीम 2014 से स्वच्छता योजना की प्रगति की निगरानी कर रही है। इनकी रिपोर्ट के अनुसार बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में कम से कम 27 प्रतिशत लोग ‘सांस्कृतिक और अन्य कारणों’ से खुले में शौच करते हैं। इन 27 प्रतिशत लोगों में वैसे लोग भी शामिल थे जिनके घर में शौचालय बने हुए थे और वैसे लोग भी थे जिनके घर में शौचालय थे ही नहीं। करीब 23 प्रतिशत लोग ऐसे थे जिन्हें स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय उपलब्ध कराया गया था, लेकिन फिर भी वे खुले में शौच करना पसंद करते थे।
ओडीएफ की हकीकत
देश खुले में शौच मुक्त हो रहा है। यह हमारे लिए गर्व की बात है। लेकिन क्या गर्व करने की स्थिति है। क्या इस देश में वो शहरी मलिन बस्तियां शामिल हैं, जो देश की सफाई व्यवस्था को बनाए रखने में सबसे अधिक योगदान देती हैं। घर-घर से, सड़क-सड़क से, कबाड़ बीनकर अपनी अवैध कही जाने वाली कॉलोनियों में ले जाने वालों की मलिन बस्तियां, क्या इस देश में शामिल हैं। इन मलिन बस्तियां के हालात गैर-मानवीय होते हैं। एक ओर चांद पर जाता देश है और दूसरी तरफ लाखों की आबादी समेटे मलिन बस्तियां। ऋषिकेश में गंगा तट से कुछ ही दूरी पर गोविंदनगर मलिन बस्ती है। काली प्लास्टिक की चादरों से बनी छोटी-छोटी झुग्गियां और उनके अंदर ढेर सारा कबाड़ का सामान। यहां कपड़ों की घेरेबंदी से बना शौचालय भी था। बस्ती की महिलाओं के लिए घेरकर ये शौचालय बनाया गया है। जबकि बस्ती की पुरुष आबादी सहित अधिकांश लोग शहर का कचरा समेटने वाले नाले में शौच के लिए जाते हैं। यह लगभग हर शहर की किसी न किसी बस्ती की तस्वीर है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये मलिन बस्तियां हमारे राज्य, हमारे देश का हिस्सा हैं? जब रहने के लिए एक अदद छत ही नहीं है तो शौचालय कैसे होगा। फिर खुले में शौच करने वाले अपराधी नजर आने लगेंगे। ओडीएफ होने के लिए न्यू इंडिया के नक्शे से मलिन बस्तियों को रबर से घिस-घिस कर मिटाना होगा।
यूनाइटेड नेशन्स, डिपार्टमेंट ऑफ इकोनॉमिक्स एंड सोशल अफेयर्स, 2014 के मुताबिक इस समय विश्व की आधी से अधिक आबादी शहरी क्षेत्र में रह रही है, जिसमें से 31.2 प्रतिशत मलिन बस्तियों में रहते हैं, इसमें 43 प्रतिशत मलिन बस्तियां विकासशील देशों में हैं। ओडीएफ के साथ ये भी दिक्कत है कि पानी की आपूर्ति हर घर तक नहीं है। जलस्त्रोतों के प्रदूषित होने और भूजल में गिरावट के साथ ही जल संकट भी गहराता जा रहा है। इसलिए जहां शौचालय बन भी गए हैं, वे इस्तेमाल में आएं, इसके लिए पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करानी होगी। पेयजल और स्वच्छता विभाग के आंकड़ों के मुताबिक इस वर्ष अप्रैल तक 18.3 प्रतिशत घरों तक पाइप के जरिए पानी पहुंच रहा है। जबकि 54 प्रतिशत घरों तक पानी के पाइप लगे हैं।
आंकड़ों में सब बेहतर
दरअसल, भारत में विकास को आंकड़ेबाजी के पैमाने पर आंका जाता है। इसी कड़ी में स्वच्छ भारत मिशन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए आंकड़ों का सहारा लिया गया। अफसरों ने आंकड़ेबाजी करके लक्ष्य तो हासिल कर लिया, लेकिन मिशन अभी भी पूरा नहीं हो पाया है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा दो निजी कंसलटेंसी एजेंसियों आईपीई ग्लोबल और कंटर द्वारा कराए गए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि शौचालय कार्यक्रम की वजह से स्वास्थ्य संकेतकों में काफी सुधार हुआ है। खासकर जिन जिलों में जहां शौचालयों की संख्या काफी बढ़ गई है, वहां पांच साल तक के बच्चों में डायरिया और मलेरिया के मामलों में बड़ी तेजी से कमी आई है।
यहां किंतु-परंतु की बात नहीं है। प्रमाण बताते हैं कि देश ने एक लगभग असंभव लक्ष्य को हासिल कर लिया है। भारत की यह उपलब्धि दुनिया को एक राह दिखाएगी, ताकि मलमूत्र के सुरक्षित निपटान और शौचालय कवरेज के सतत् विकास लक्ष्यों को हासिल किया जा सके। हालांकि, इस सफलता को चिरस्थायी बनाना होगा, जो अंत तक जारी रहे। यह वह जगह है, जहां बड़ा जोखिम निहित है। इसलिए, भले ही हम जश्न मनाने के लिए एक क्षण लेते हैं, हमें शौचालय की चुनौती को थामना नहीं होगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है और बहुत कुछ गलत हो सकता है।
पहला, यह स्पष्ट है कि लगभग सभी कार्यक्रमों में एक समय के बाद गिरावट आती है। ऐसे में, अगर शौचालय बने हैं और लोगों ने इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, तब यह भी हो सकता है कि यह उल्टा हो जाए। देश के अलग-अलग जिलों में की गई पड़ताल में अच्छी और बुरी खबर दोनों मिली। कुछ समय पहले तक शौचालयों की भारी कमी झेल रहे उत्तर प्रदेश के कई जिलों में लोगों, खासकर महिलाओं में शौचालयों का इस्तेमाल बढ़ा है और वे अधिक शौचालयों की मांग कर रहे हैं। लेकिन 2017 में खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) घोषित हरियाणा में लोगों की आदत नहीं बदली है। यह भी तब हो रहा है, जब हरियाणा ने लोगों के व्यवहार में बदलाव के लिए अच्छा खासा पैसा खर्च किया है। दूसरा, मल-मूत्र के निपटान का मुद्दा है। एनएआरएसएस 2018-19 सर्वेक्षण में ‘सुरक्षित निपटान’ की जो परिभाषा दी गई है, वह न केवल अपर्याप्त है, बल्कि दोषपूर्ण है। इस परिभाषा में कहा गया है कि सुरक्षित निपटान से आशय है कि शौचालय किसी सेप्टिक टैंक, एकल या दोहरे गड्ढ़े या किसी नाले से जुड़ा हुआ है।
हकीकत यह है कि यह केवल मल-मूत्र को फैलने से रोकने की व्यवस्था भर है, इसे मल-मूत्र का सुरक्षित निपटान नहीं कहा जा सकता। एनएआरएसएस 2018-19 के मुताबिक, लगभग 34 फीसदी शौचालय एक गड्ढ़े (सोक पिट) वाले सेप्टिक टैंक से जुड़े हैं, जबकि 30 फीसदी शौचालय दोहरे गड्ढ़े (लीच पिट) वाले सेप्टिक टैंक से जुड़े हैं और शेष 20 फीसदी शौचालय एकल गड्ढ़े वाले सेप्टिक टैंक से जुड़े हुए हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि शौचालयों से निकलने वाले मल का वहीं सुरक्षित तरीके से निपटान किया जा रहा है।
लेकिन यहां यह उल्लेख नहीं किया गया है कि क्या यह पूरी तरह से शौचालय के निर्माण की गुणवत्ता पर निर्भर करेगा, जो समस्या की जड़ है। यदि सेप्टिक टैंक या दोहरे गड्ढ़े (लिच पिट) वाले शौचालय के डिजाइन से बनाए गए हैं- उदाहरण के लिए, अगर दोहरे लिच पिट में शहद के छत्ते जैसे ईंटों से बनाया गया है तो मल-मूत्र सुरक्षित तरीके से मिट्टी में मिल जाएगा और जब उसे हटाया जाएगा तो उसका इस्तेमाल मिट्टी में सुरक्षित तरीके से दोबारा किया जा सकेगा। हालांकि यह सब ‘अगर’ के दायरे में आता है। सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट द्वारा शहरी क्षेत्रों में कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि सेप्टिक टैंक की गुणवत्ता काफी खराब है। टैंकर चालकों द्वारा जमीन पर मल-मूत्र का निपटान सुरक्षित नहीं किया जाता, खासकर जलाशयों में बुरे तरीके से निपटान किया जाता है। तो, क्या ग्रामीण भारत में बने ये शौचालय डिजाइन से बने हैं? या ये एक और चुनौती बनने वाले हैं, जब एक गड्ढ़ा भर जाएगा और उसे किसी जलाशय या खेत में खाली कर दिया जाएगा? तब ये शौचालय न केवल संक्रमण का कारण बनेंगे, बल्कि इनसे मिट्टी और पानी भी दूषित होगा, जिससे स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है।
लेकिन यह भी सच है कि 99 फीसदी से अधिक सफलता की कहानियां पूरी तरह सही या गलत नहीं होती। ऐसे में, इन संगठनों का अलग-अलग नजरिए से अध्ययन अवश्य करने की जरूरत है। जब हम शौचालय के बारे में अच्छी खबर बता रहे हैं तो हमें यह भी बात याद रखनी चाहिए कि अगर हम सब चीयरलीडर्स बन जाएंगे तो तालियां बजाने वाली टीम नहीं बचेगी। यह सारे सवाल इसलिए मौजूद हैं क्योंकि 10 करोड़ से अधिक शौचालय वाला यह देश नहीं जानता है कि 2019 में कितना मल कीचड़ (फीकल स्लज) पैदा हो रहा है और उसके निस्तारण की क्या व्यवस्था है। यह भी देश के सामने एक बड़ी समस्या बनकर खड़ा होने वाला है।
सवालों के घेरे में तकनीक
स्वच्छ भारत मिशन के तहत तय लक्ष्य के मुताबिक 5 साल में 10 करोड़ शौचालय बन तो गए, लेकिन शौचालय के तकनीक पर शुरू से सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 2019 में 3आईई की ओर से किए गए अध्ययन में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह लोगों में शौचालय की टंकी भरने व खाली करवाने को लेकर एक चिंता है, जिससे शौचालयों के इस्तेमाल में कमी आई है। इस सिलसिले में उन्होंने वर्ष 2016-2017 में 60 प्रतिशत घरों का अध्ययन किया। इसमें उन्होंने पाया कि महज 17 प्रतिशत घरों में ही शौचालय थे, लेकिन जागरूकता की कमी और गलत तकनीक से शौचालय बने होने के कारण इनमें से महज 10 प्रतिशत घरों के लोग ही शौचालय का इस्तेमाल कर रहे हैं। देश में शौचालय जिस तरह से बनाए गए हैं उसमें जलापूर्ति का ध्यान नहीं रखा गया है। दरअसल, 55 लीटर प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन जलापूर्ति होनी है लेकिन 40 लीटर से भी कम जलापूर्ति हो रही है। यह दर्शाता है कि शौचालयों तक पानी की पहुंच संदेहजनक है और शौचालयों के इस्तेमाल का दावा बिना इस काम के विफल हो सकता है। शौचालयों का जलसंकट भविष्यगत एक बड़ी चुनौती भी साबित हो सकता है।
शिवपुरी के एक गांव ने स्वच्छ भारत मिशन पर खड़े किए सवाल
शिवपुरी जिला मुख्यालय से महज 17 किलोमीटर दूर बसा भावखेड़ी गांव इस वक्त स्वच्छता अभियान और खुले में शौच से मुक्ति को लेकर पूरे देश का ध्यान खींच रहा है। इसकी वजह है गत दिनों हुई वह घटना जिसमें दो लोगों ने मिलकर इस गांव के दो बच्चों की हत्या कर दी जब वे बच्चे खुले में शौच कर रहे थे। स्वच्छ भारत मिशन के तहत आगामी 2 अक्टूबर को 100 फीसदी ओडीएफ यानी खुले में शौच से मुक्त होने का जश्न पूरे देश में मनाया जाना है, लेकिन इस गांव की घटना के बाद खुले में शौच से मुक्ति के इस दावे पर सवाल उठने लगे हैं। भावखेड़ी गांव को 4 अप्रैल 2018 में ही खुले में शौच में मुक्त घोषित किया जा चुका है। गांव में स्वच्छ भारत मिशन के दावों की पड़ताल की गई तो सच सामने आया। सरकारी दावों के मुताबिक इस गांव को खुले में शौच से मुक्त गांव घोषित किया गया है लेकिन गांव में प्रवेश करते ही इसकी हकीकत सामने आने लगती है। लगभग 1100 लोगों की आबादी वाले इस गांव में तकरीबन 260 घर हैं, जिसमें से लगभग सभी में यानी 250 से अधिक घरों में शौचालय का निर्माण हो चुका है। कहने को तो हर घर में शौचालय सुविधा है, लेकिन गांव में प्रवेश करते ही यहां का पंचायत भवन इस दावे की पोल खोलता है। पंचायत भवन में शौचालय बना तो है लेकिन यह उपयोग करने लायक नहीं है। पंचायत भवन के सामने ही गत दिनों शौच करने पर दो बच्चे अविनाश और रोशनी की हत्या कर दी गई थी। ठीक यही हाल गांव के स्कूल का भी है जहां का शौचालय बंद पड़ा हुआ है। लड़कियों के लिए बने शौचालय में प्लास्टिक के झोले ठूंसे हुए मिले तो लड़कों के शौचालय में दरवाजा ही नहीं लगा हुआ है। गांव में घटना के दो दिनों तक पुलिस का डेरा रहा। गांव के कोतवाल कल्याण परिहार बताते हैं कि पंचायत भवन का शौचालय खराब होने की वजह से पुलिस वालों को भी खुले में ही जाना पड़ा। पीडि़त परिवार से बातचीत करने पर गांव के खुले में शौच से मुक्ति की हकीकत सामने आई।
सीवेज के शोधन की व्यवस्था नहीं
स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश में 10 करोड़ शौचालय बना दिए गए हैं, लेकिन इनके सीवेज के शोधन की व्यवस्था नहीं है। अनुमानित सीवेज निकासी का बहुत ही थोड़ा सा हिस्सा शोधित किया जाता है अन्यथा वह जल और जमीन को प्रदूषित करता है। सीवेज शोधन प्लांट (एसटीपी) भी सीधे सीवेज नेटवर्क से नहीं जोड़े जा रहे। बल्कि ऐसी नालियां जो नदियों और जलाशयों से जाकर मिल जाती हैं, उनके पानी को रोककर एक इंटरसेप्टर बनाया जाता है और एसटीपी में डायवर्ट कर दिया जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक देश में प्रति व्यक्ति प्रतिदन औसतन 250 ग्राम मलत्याग करता है। इस हिसाब से देश की करीब 1 अरब 33 करोड़ 92 लाख आबादी प्रतिदिन 3.69 लाख टन मलत्याग कर रही है। यह सेप्टिक टैंक, ट्विन टैंक और गड्ढ़ों में जमा हो रहा है। लेकिन इनका निष्पादन कैसे होगा, इसकी सरकार के पास कोई नीति ही नहीं है। इसलिए आने वाले समय में यह बड़ी समस्या बन सकता है।
खुले में शौच, अपराध या बुराई?
बेशक खुले में शौच करना एक बुराई है, लेकिन क्या यह अपराध भी है। 25 सितंबर 2019 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में खुले में शौच करते दो बच्चों की मौत के बाद यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है। इसके लिए काफी हद तक सरकार द्वारा किया जा रहा प्रचार भी जिम्मेवार माना जा रहा है। आपने खुले में शौच के खिलाफ बहुप्रचारित विज्ञापन देखा होगा, जिसमें अमिताभ बच्चन खेतों में शौच करते लोगों के ऊपर पत्थर फेंकते हैं और वे भाग जाते हैं। क्या अब यही पत्थर आम जनता की जान ले रहा है? 25 सितंबर, 2019 को मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में एक ऐसा ही दर्दनाक मंजर देखने में आया। वैसे यह पहला मंजर नहीं है। इससे पहले भी कई मामले सामने आ चुके हैं। स्वच्छता अभियान के दौरान बीते पांच सालों में सरकारी अधिकारियों द्वारा अपनाए जा रहे कुछ हथकंडे तो आम नागरिकों के संविधान प्रदत्त अधिकारों का हनन तक किया। मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के कपासी गांव में सीसीटीवी कैमरे लगे हैं जो खुले में शौच कर रहे लोगों पर नजर रखा जाता था। अब भला ग्राम पंचायत क्यों पीछे रहे। खुले में शौच करने वाले अपराधियों पर 500 रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया। यही नहीं, ऐसी घटनाओं के बारे में जानकारी देनेवाले पुरस्कार के भी हकदार होते हैं।
एक शौचालय, 12 हजार छात्र और छात्राएं
2 अक्टूबर को देश खुले में शौच मुक्त घोषित होने जा रहा है। उधर, मध्यप्रदेश में अब भी 12 हजार प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल ऐसे हैंं जहां पर आज भी अलग-अलग शौचालयों के अभाव में बालक-बालिकाओं को एक ही शौचालय का उपयोग करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। यही नहीं इन स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का हाल तो यह है कि जिनमें पीने के पानी का भी अभाव है। ऐसे स्कूलों की संख्या 14 हजार है। यह खुलासा हुआ है उस रिपोर्ट से जो हाल ही में सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं को लेकर मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एमएचआरडी) को राज्य सरकार की ओर से भेजी गई है। इसके बाद राज्य शिक्षा केंद्र को सभी कलेक्टर और जिला मिशन संचालक को लिखित आदेश जारी कर स्कूलों में शौचालय व पीने के पानी की व्यवस्था करने के लिए कहना पड़ा है। राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा एमएचआरडी को सौंपी रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 6957 प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में लड़कों के लिए और 5253 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं। साथ ही 96343 स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। वहीं, रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 14 हजार सरकारी स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा तक नहीं है। बच्चों को घर से पानी लेकर आना पड़ता है। पानी के अभाव में इन स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था पूरी तरह से ठप है। स्वच्छ विद्यालय अभियान के अंतर्गत वर्ष 2015-16 में जिले की मांग के आधार पर सरकारी स्कूलों में बालक एवं बालिकाओं के लिए शौचालय निर्माण के कार्य स्वीकृत किए गए थे, लेकिन यह योजना प्रदेश में पूरी तरह फेल है। एमएचआरडी ने सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं नहीं होने पर नाराजगी जताते हुए पत्र लिखकर व्यवस्था दुरुस्त करने को कहा है। भोपाल के स्कूलों की स्थिति भी कुछ ज्यादा बेहतर नहीं है। यहां पर 109 प्राइमरी व मिडिल स्कूलों में लड़कों के लिए और 56 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। वहीं, राजधानी के 177 स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है।
– राजेंद्र आगाल