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कांग्रेस में फिर भाईगिरी

देश की सबसे बड़ी पार्टी का तमगा गंवाने वाली कांग्रेस में अब भाई की वापसी हो गई है। जो लोग कांग्रेस को करीबी से देखते आए हैं वो जानते हैं कि ‘भाई’ किसे कहते हैं। लेकिन हम आपको बता देते है कि भाई का रुतबा कांग्रेस पार्टी में अहमद पटेल को दिया गया है। पार्टी के भीतर सभी उन्हें भाई के नाम से ही जानते हैं।
राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने के साथ ही युवाओं को अपनी कमेटी में शामिल किया। इस कमेटी का नेतृत्व कहीं न कहीं प्रियंका गांधी के हाथों में था वह पार्टी को पीछे से चलाती थी और राहुल सामने से। सोनिया गांधी के सबसे विश्वासपात्र नेता अहमद पटेल का दबदबा तो हमेशा ही देखा गया है लेकिन राहुल के कमान संभालने के बाद वह हाशिए पर चले गए। हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष के विश्वासपात्र के तौर पर अशोक गहलोत को देखा जाने लगा था।
चाहे कोई भी मुद्दा हो या विषय राहुल गांधी अपनी नई टीम के साथ राय-मशविरा करने के बाद ही निर्णय लेते थे और ऐसा कभी भी नहीं देखा गया कि वह अहमद पटेल को महत्व दे रहे हो। लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम सामने आने के बाद राहुल गांधी ने हार की जवाबदारी लेते हुए जैसे ही अध्यक्ष पद छोड़ा, मानो अहमद पटेल की साख वापस लौटने लगी।
कांग्रेस अध्यक्ष पद खाली रहा। वरिष्ठ नेता सीडब्ल्यूसी की बैठक बुलाते रहे और चर्चाएं हुईं। लेकिन अध्यक्ष नहीं मिला जो गांधी परिवार का विश्वसनीय हो और साथ ही सभी नेताओं को एकजुट करके रख सकें। ऐसे में सभी ने मिलकर निर्णय लिया कि अंतरिम अध्यक्ष नियुक्त किया जाए। ऐसे में इसकी जिम्मेदारी कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपी गई। जैसे ही सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनीं ठीक वैसे ही अहमद पटेल की पावर वापस आ गई। कांग्रेस सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक अब पार्टी में अहमद पटेल की राय और मर्जी के बिना एक पत्ता भी डोलते हुए नहीं दिखता। सबसे ज्यादा दहशत में तो वह लोग हैं जो राहुल गांधी के बेहद करीबी थे और ऐसा इसलिए है क्योंकि वह लोग अहमद पटेल को नजरअंदाज करने लगे थे।
सोनिया गांधी के नेतृत्व संभालते ही पुरानी टीम के अहमद पटेल, मोतीलाल बोरा, गुलाम नबी आजाद, अंबिका सोनी, मुकुल वासनिक, माधवन, बी. जार्ज, अशोक गहलोत, चौधरी भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, दिग्विजय सिंह एक बार फिर से 10 जनपथ में सक्रिय हो गए हैं। कुल मिलाकर सोनिया गांधी को एक बार फिर से उन्हीं नेताओं पर विश्वास जताना पड़ा है जो अब पुराने पड़ गए हैं, जिनके कारण कांग्रेस की यह दुर्गति है, जर्जर हैं और कई प्रकार की विसंगतियों के शिकार हैं।
राहुल गांधी कांग्रेस में परिवर्तन की लड़ाई हार चुके हैं। उन्होंने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से न केवल इस्तीफा दिया है अपितु अब वे कांग्रेस के प्रति उदासीन रवैया भी अपनाते दिख रहे हैं। कांग्रेस में ऐसा पहली बार हुआ है। इससे पहले ऐसे मौके तीन बार आए लेकिन तीनों बार कांग्रेस का नया नेतृत्व जीता और पुराना हार गया।
याद कीजिए जब पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद कांग्रेस में नेतृत्व का संकट पैदा हुआ था तो के. कामराज ने पहले लचीले मिजाज के कांग्रेसी लाल बहादुर शास्त्री का नाम प्रधानमंत्री के लिए आगे किया और बाद में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस की कमान नवीन विचारों वाले युवाओं के हाथ में सौंप दिया था।
कामराज ने मोरारजी भाई देसाई को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया क्योंकि वे दक्षिणपंथी सोच एवं हिन्दू राष्ट्रवाद के समर्थक थे। मोरारजी के बारे में यह भी प्रचलित था कि वे कठोर पूंजीवादी व्यवस्था के हिमायती हैं। यह पहला मौका था जब कांग्रेस के अंदर नवीन और प्रगतिशील विचारधारा की जीत हुई थी। हालांकि, पंडित जवाहरलाल नेहरू और गांधी के बीच भी इसी प्रकार का अंतरविरोध था और उस समय भी नेहरू के चिंतन की जीत हुई थी न कि गांधी के विचारों की जीत हुई। दूसरा मौका इंदिया गांधी के कालखंड में ही आया। उन दिनों इंदिरा गांधी कई मोर्चों पर लड़ रही थी। इंदिरा गांधी कठोर और समावेसी राष्ट्रवाद के एक नए विचारधारा पर काम कर रही थी। याद रहे जो लोग इंदिरा गांधी को साम्यवादी रुझान के नेता मानते हैं वे गलत हैं क्योंकि केरल की चुनी हुई बहुमत की साम्यवादी सरकार को अपदस्थ करने में इंदिरा गांधी की ही सबसे बड़ी भूमिका थी।
प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा गांधी को ऐसे युवाओं की जरूरत पड़ी जो आने वाले समय में उसकी खुद की विचारधारा को देश में स्थापित करे। इसके लिए इंदिरा गांधी ने नया प्रयोग किया और युवातुर्क का चिंतन लेकर आई। अपनी टीम में समाजवादी चिंतक आचार्य नरेन्द्र देव के चिंतन से प्रभावित युवा नेता चन्द्रशेखर को जोड़ा, मोहन धारिया आए और कृष्णकांत व रामधन कांग्रेस के साथ जुड़े। आरके धवन इंदिरा गांधी के निकटस्थों में एक हो गए। इस प्रयोग के बाद एक बार फिर पुराने कांग्रेस के पुराने नेता हासिए पर ढकेल दिए गए और पूरे देश में कांग्रेस का डंका बजने लगा।
तीसरा मौका राजीव गांधी के समय में आया। उस समय भी पुराने नेतृत्व को पीछे ढकेला गया और राजीव गांधी अपनी टीम में राजेश पायलट, दिग्विजय सिंह, गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरेन्द्र सिंह, माधव राव सिंधिया जैसे नए एवं ऊर्जावान युवाओं को जोड़ा। इस टीम ने कांग्रेस और देश दोनों को लाभ पहुंचाया। इसी टीम के कारण राजीव गांधी सफलता के साथ शासन चलाने में कामयाब रहे। इसके बाद पीबी नरसिम्हा राव का दौर आया। राव ने गांधी परिवार को हासिए पर रखने की कोशिश की। कांग्रेस में गठबंधन का नया प्रयोग किया और पूरे पांच साल तक सरकार चलाते रहे। राव के दौर के बाद कांग्रेस में कमजोरी प्रारंभ हो गई लेकिन तुरंत सोनिया गांधी ने मोर्चा संभाल लिया और एक बार फिर से कांग्रेस को मजबूत कर दिया।
कांग्रेस 10 साल तक अजेय रही लेकिन इस 10 साल के दौरान कांग्रेस सांगठनिक पतन जारी रहा। नया और युवा नेतृत्व नहीं पनप पाया। जो पनपा वह प्रशिक्षित नहीं था साथ ही साथ वह कमजोर भी था। सत्ता जाने के बाद कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों ने राहुल के नेतृत्व में नया प्रयोग किया जो कांग्रेस करती रही है लेकिन राहुल इस प्रयोग में खड़े नहीं उतरे। राहुल बाएं चलते रहे और देश नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर से दक्षिणपंथ का रास्ता चुन लिया।
राहुल गांधी प्रयोग के तौर पर बिहार, झारखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात, दिल्ली आदि में नए और युवा नेतृत्व को मौका दिया लेकिन पुराने नेताओं ने राहुल की योजना पर पानी फेर दी। राहुल गांधी गुजरात में भारत सिंह सोलंकी को लेकर आए लेकिन अहमद पटेल गुट ने राहुल की एक न चलने दी। लेकिन सोनिया गांधी के कमान संभालते ही अहमद पटेल फिर पावरफुल हो गए हैं। ऐसे में एक बार फिर से कांग्रेस में पुराने नेताओं का रसूख बढऩा शुरू हो गया है।
एक तरफ कांग्रेस फिर से संगठित हो रही है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी के लिए फिलहाल महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव चुनौती बन गए हैं। हरियाणा में कांग्रेस दो मोर्चों पर जूझ रही है। पहला मोर्चा भाजपा के साथ है तो दूसरे मोर्चे पर खुद कांग्रेस नेता जमे हुए हैं। ऐसा ही हाल महाराष्ट्र में भी है। महाराष्ट्र में पार्टी के कई नेता बाहर हो चुके हैं। चुनावी घमासान जैसे-जैसे आगे बढ़ता जाएगा, नेताओं की आपसी लड़ाई सतह पर आती जाएगी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आगामी दिनों में कांग्रेस किस ओर जाती है।
2024 से पहले नहीं हो सकती राहुल की वापसी
2019 में हार की जिम्मेदारी लेने वाले राहुल ने स्वेच्छा से कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान छोड़ी थी। जिसके बाद पार्टी के सभी महत्वपूर्ण फैसलों का जिम्मा अब सोनिया गांधी ने उठाया है। आपको बता दें कि राहुल गांधी के बेहतर भविष्य के लिए पार्टी ने साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को सोनिया गांधी के नेतृत्व में लडऩे की बात कही है। अगर ऐसा हुआ तो राहुल गांधी को थोड़ा वक्त मिल जाएगा संभलने का और अपनी मजबूत वापसी करने का। कांग्रेस पार्टी के अंदर नए और पुराने के आपसी संघर्ष में इस बार नया हार गया और पुराना जीत गया। यदि यह कहें कि कांग्रेस में पहली बार युवा-तुर्क नेतृत्व वाली योजना असफल हुई है। कांग्रेस के इतिहास को देखेंगे तो दो ऐसे मौके आए जब नए और पुराने नेतृत्व में टकराव की स्थिति आई लेकिन उन दोनों टकराव में पुराना हारा और नया नेतृत्व जीता लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार सोनिया गांधी को अपना पैर पीछे करना पड़ा। राहुल गांधी को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा। यही नहीं उनके द्वारा बनाई गई तमाम योजनाओं को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है और उनके द्वारा खड़े किए गए नए नेतृत्व को हासिए पर ले जाकर छोड़ दिया गया है।
खाली खजाना, पस्त कार्यकर्ता
कांग्रेस का कोष पूरी तरह खाली होने की खबर है। हालात इतने खराब बताए जा रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रत्याशियों को चुनाव खर्च खुद करने के लिए कह दिया गया है। यानी पार्टी इस बार अपने प्रत्याशियों को केंद्रीय कोष से मदद दे पाने की स्थिति में नहीं है। हालांकि पिछले वित्त वर्ष में कांग्रेस को 146 करोड़ का चंदा मिला है। इससे पहले के वित्त वर्ष में उसे मात्र 26 करोड़ मिले थे। माना जा रहा है पार्टी के वर्तमान कोषाध्यक्ष अहमद पटेल के अथक प्रयास के चलते पार्टी को 146 करोड़ मिल पाए। पार्टी सूत्रों का कहना है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों को अहमद पटेल की तरह से पार्टी के लिए धन एकत्रित करने का भारी दबाव है। दअरसल पटेल को निर्देश है कि वे अधबने पार्टी मुख्यालय को तत्काल पूरा कराने के लिए धन की व्यवस्था करें। खबर यह भी है कि पार्टी के बड़े नेताओं की आपसी रार से खिन्न सोनिया गांधी अब एक नई टीम का गठन कर पस्त कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने का मुहिम शुरू करने जा रही है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इन दिनों बुरे हालात का सामना कर रही है। माना जा रहा है कि कांग्रेस के लिए बुरे दिन तो 16 मई 2014 से ही शुरू हो गया था। 2014 में कांग्रेस को मिली हार का सबसे बड़ा असर पार्टी की आमदनी पर पड़ा। कांग्रेस को कारोबारियों और उद्योगपतियों से मिलने वाले फंड में भारी गिरावट आई, जिसकी वजह से पार्टी खजाने में नकदी की भारी किल्लत पैदा हो गई। धीरे धीरे राज्यों से भी कांग्रेस का पत्ता साफ होता गया और फंडिंग बंद हो गई। 2019 लोकसभा चुनाव में भारी खर्चों के बाद भी पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा। कांग्रेस के गिरते रसूख की वजह से कंपनियों ने चंदा देना बंद कर दिया।
– दिल्ली से रेणु आगाल