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चुनावी छूट!

देश में आर्थिक मंदी का दौर चल रहा है। ऐसे में महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव का बिगुल बज चुका है। लेकिन इस चुनावी बिगुल से पहले ही केंद्र सरकार ने कार्पोरेट टैक्स में कटौती की घोषणा करके एक बड़ी चुनावी चाल चली है। जानकारों का कहना है कि इस घोषणा से जनता का मोदी सरकार के प्रति एक बार फिर से विश्वास मजबूत हुआ है।
देश की लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाने के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का जो बूस्टर डोज दिया है उससे बाजार झूम उठा है। उद्योगपतियों और विशेषज्ञों ने आर्थिक वृद्धि और निवेश को बढ़ावा देने के लिए कंपनी कर में कटौती के सरकार के कदम की सराहना की। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मोदी सरकार ने चुनावी बूस्टर डोज दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार की इस घोषणा का कोई दीर्घकालीन लाभ नहीं मिलने वाला है। यह एक तरह से चुनावी छूट है।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव भाजपा के लिए काफी मायने रखते हैं। लोकसभा चुनाव के बाद देश में आर्थिक मंदी छाई हुई है। बेरोजगारी दिन पर दिन बढ़ रही है। ऐसे में माना जा रहा है कि मोदी सरकार के खिलाफ माहौल है। ये चुनाव जनता के मूड का संकेत देंगे। इसलिए आरोप लगाया जा रहा है कि विधानसभा चुनावों को देखते हुए केंद्र सरकार ने कार्पोरेट टैक्स में छूट का दांव खेला है।
गौरतलब है कि अब घरेलू कंपनियों और नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स में कमी की जाएगी। घरेलू कंपनियां अगर अन्य कोई छूट नहीं लेती हैं तो उन्हें सिर्फ 22 प्रतिशत टैक्स देना होगा। सरचार्ज और सेस मिलाकर प्रभावी टैक्स दर 25.17 प्रतिशत होगी। फिलहाल कॉर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत है जबकि सेस और सरचार्ज मिलाकर कंपनियों को 34.94 प्रतिशत टैक्स देना पड़ता है। यानी नई दरों के मुताबिक कंपनियों की टैक्स देनदारी करीब 10 प्रतिशत तक घट जाएगी। इसी तरह एक अक्टूबर के बाद बनने वाली घरेलू मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए टैक्स की दर 15 फीसदी होगी। सरचार्ज और सेस मिलाकर प्रभावी टैक्स दर 17.01 प्रतिशत होगी। उन्हें भी अन्य कोई इन्सेंटिव नहीं मिलेगा। नई कंपनियों के लिए पहले टैक्स की दर 25 प्रतिशत थी जबकि सेस, सरचार्ज मिलाकर प्रभावी दर 29.12 प्रतिशत थी। यानी नई कंपनियों की टैक्स देनदारी 12 प्रतिशत घटेगी। लेकिन क्या इसका फायदा आम उपभोक्ता को होगा? सरकार की इस रहमदिली से कॉर्पोरेट जगत की निराशा दूर होगी और उनमें एक विश्वास पैदा होगा। इन उपायों से हम मंदी से निपटने में सफल होंगे। लेकिन इस खुशफहमी के बीच एक छोटी सी बात दबकर रह गई कि सरकार की इस घोषणा से सरकार को सालाना 1.45 लाख करोड़ का राजस्व घाटा होगा।
लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था को मिले बूस्टर डोज से बाजार खुश है। दस साल में शेयर बाजार एक दिन में इतना नहीं उछला था। करीब 2000 अंकों का उछाल आया। बाजार में 7 लाख करोड़ पैसा आ गया। 2015 में वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने कहा था कि आने वाले चार साल में कॉर्पोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 25 कर दिया जाएगा। वो हो गया। पहले कंपनियों को 34 प्रतिशत से अधिक टैक्स देने पड़ते थे अब 25 प्रतिशत ही देने होंगे। फिक्की, सीआईआई और बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, एसोचैम, और ऑटोमोबिल सेक्टर के संगठन सियाम ने स्वागत किया है। सैद्धांतिक रूप से कम कॉर्पोरेट टैक्स के कारण औसत भारतीय उपभोक्ता को फायदा मिलना चाहिए। सरकार को उम्मीद होगी कि कंपनियां अपने वस्तुओं और सेवाओं को सस्ती कर अपने बचत का कुछ हिस्सा उपभोक्ताओं के साथ साझा करेंगी। लेकिन ऐसा होना अभी मुश्किल नजर आ रहा है। यह हमें मान कर चलना चाहिए कि इस साल सरकार का राजकोषीय संतुलन पटरी से उतरने वाला है। सरकार का अनुमान है कि कॉर्पोरेट टैक्स में करीब 10 फीसदी कमी करने से राजस्व पर 1.45 लाख करोड़ रुपए का बोझ बढ़ेगा, जो जीडीपी के 0.7 फीसदी के बराबर है। तमाम तरह के कर प्रोत्साहन और रियायतें बढ़ाने से राजस्व घट रहा है। ऐसा भी नहीं है कि इंडस्ट्री को पहले छूट नहीं दी जाती थी। विभिन्न प्रकार की इंडस्ट्री को समय-समय पर छूट दी जाती रही। ऐसी छूट देने से सरकारी अनुमानों से 2016-17 में 12 प्रतिशत कम राजस्व आया था। सरकार को 2017-18 में 8.7 प्रतिशत और 2018-19 में 16 प्रतिशत राजस्व गंवाना पड़ा था, इस बार 2019-20 में यह घाटा कही बड़ा होने जा रहा है।
दरअसल आर्थिक मंदी की आहटों और पांच फीसदी पर जीडीपी रेट पहुंचने के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आगामी दो महीने बेहद संकटपूर्ण हैं। यह अंदेशा 30 अगस्त को जारी किए जीडीपी डेटा के आधार पर लगाया गया है। इकनॉमी में संभावित सुधार के लिहाज से आने वाले दो माह कई व्यापारों और कारोबारियों के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। आमतौर पर फेस्टिव सीजन में कंज्यूमर डिमांड बढ़ जाती है, इसलिए कम्पनियों को एक बूस्टर डोज दिया गया है लेकिन देखना यह है कि कंपनियों की तो दीवाली मन गई है लेकिन उपभोक्ताओं की दीवाली सही तरीके से मन पाती है या नही? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खराब है। बात रोजगार की हो रही थी। मांग की हो रही थी कि लोगों के पास पैसे नहीं हैं। इस फैसले से कॉर्पोरेट को लाभ तो मिला है लेकिन लोगों को क्या मिला। उनके पास मांग को बढ़ाने के लिए पैसा कहां से आएगा। क्या कॉर्पोरेट टैक्स में जो कमी आएगी उसका लाभ सैलरी में वृद्धि के रूप में देखने को मिलेगा। मांग बढ़ाने के लिए जरूरी है कि कॉर्पोरेट अपने कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाएं। लेकिन उन पर दबाव निवेश बढ़ाने का भी है ताकि नया रोजगार पैदा हो। सैलरी पर क्या असर पड़ेगा, इस पर ठोस रूप से कहना मुश्किल है। क्या सरकार कॉर्पोरेट का टैक्स घटाने के बाद आम लोगों के लिए भी इनकम टैक्स में राहत देगी। यह जानने के लिए हमें 27 सितंबर का इंतजार करना होगा।
2007-08 में मंदी आई थी तब मनमोहन सिंह सरकार ने उद्योग जगत के लिए कई पैकेज दिए थे। उसका क्या रिजल्ट निकला, कोई प्रमाणिक अध्ययन नहीं है। इस बार कॉर्पोरेट टैक्स घटाया गया है। कर्ज के लिए भी सरकार ने 70,000 करोड़ का पैकेज दिया है। क्या सरकार वित्तीय घाटे की चिंता छोडऩे के लिए तैयार हो गई है। 2015 में 4.1 प्रतिशत हो गया था वित्तीय घाटा। सरकार कहती है कि 2020 तक 3.3 प्रतिशत तक लाना है। कहा जा रहा है कि 1 लाख 45 हजार का राजस्व छोडऩे से वित्तीय घाटा 4 प्रतिशत तक जा सकता है। तो क्या सरकार अपना खर्च घटाएगी, उसकी योजनाओं पर असर पड़ेगा, गांवों में मांग कम है। लोगों के पास खरीदने की क्षमता नहीं है। बहरहाल सरकार ने जोखिम भरा साहसिक फैसला उठा लिया है जिसका कॉर्पोरेट और शेयर बाज़ार में स्वागत हो रहा है। अब कॉर्पोरेट को दिखाना होगा कि वह इस छूट का लाभ किस तरह से सरकार और आम आदमी को देता है।
भाजपा की होगी अग्निपरीक्षा
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए सबसे अहम है। क्योंकि इन दोनों राज्यों में उसकी सरकार है। महाराष्ट्र में भाजपा मजबूत नजर आ रही है, वहीं हरियाणा में भी उसकी स्थिति कमजोर नहीं है, लेकिन आर्थिक मंदी के कारण देशभर के लोगों में निराशा का भाव है। ऐसे में माना जा रहा है कि इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में इसका व्यापक असर पडऩे वाला है। महाराष्ट्र में भाजपा को घेरने के लिए सभी विपक्षी पार्टियां दांव लगा रही हैं। वहीं हरियाणा में सरकार के खिलाफ जनआक्रोश है। ऐसे में आर्थिक मंदी और क्षति दायक होगी। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी का आभा मंडल देश की जनता पर इस कदर हावी है कि उनकी हर एक बात पर लोग विश्वास कर रहे हैं। अब देखना यह है कि महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता भाजपा पर कितना विश्वास फिर से जताती है। उधर, विपक्षी कांग्रेस सहित अन्य पार्टियां मोदी सरकार की नाकामियों को विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनाने में जुट गई हैं।
परिवारों की बचत घटी और कर्ज बढ़ा
आर्थिक विकास में लगातार गिरावट, बड़ी संख्या में जा रही नौकरियां (पहले से ही मौजूद बेरोजग़ारी की बदतर स्थिति में इज़ाफ़ा होते हुए) और कामकाजी लोगों की कम होती आमदनी के चलते जारी आर्थिक संकट में कुछ छिपे हुए घटक हैं जो भविष्य में लंबे समय तक असर डालेंगे। भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार परिवारों को अपनी ज़रूरत को पूरा करने के लिए उन्हें बचत की हुई रक़म का इस्तेमाल करने और कर्ज़़ लेने के लिए मजबूर किया जा रहा है। स्पष्ट तौर पर इसका मतलब यह है कि भविष्य का ख़र्च – जिसके लिए बचत की गई थी – प्रभावित होगा और भविष्य में होने वाली आय, लिए गए कर्ज़़ को चुकाने में ख़र्च करनी होगी। दूसरे शब्दों में कहें तो ये मंदी न सिफऱ् वर्तमान में जीवन को प्रभावित कर रही है बल्कि भविष्य के जीवन स्तर को भी प्रभावित कर रही है। जीडीपी के हिस्से के रूप में घरेलू बचत 2011-12 में 23.6त्न से लगातार घटकर 2017-18 में 17.2त्न हो गई है। इस संबंध में आरबीआई का पिछले साल का डाटा उपलब्ध है। [नीचे दिया गया चार्ट देखें] ऐसा माना जाता है कि 2018-19 के आंकड़ों में मंदी के प्रभाव के चलते इसी तरह की गिरावट जारी रहेगी। वास्तविक (मुद्रास्फ़ीति-समायोजित) गिरावट को उजागर करने के लिए जीडीपी के हिस्से के रूप में बचत (सेविंग्स) को शामिल करना आवश्यक है। ये घरेलू बचत वित्तीय बचत (जैसे बैंक जमा आदि), वस्तुगत संपत्ति (जैसे मकान) में बचत और सोने व चांदी के आभूषणों के रूप में बचत से इक_ा होते हैं। बैंक ऋण जैसे परिवारों की वित्तीय देनदारियों को सकल वित्तीय बचत के लिए घटाया जाता है।
– इन्द्र कुमार