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हाथी चला हाथ के साथ

2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में सत्ता मिली। लेकिन राजस्थान में पार्टी की स्थिति कमजोर थी। अब बसपा के 6 विधायकों के आने से कांग्रेस मजबूत हो गई है।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बसपा के सभी छह विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है। अब तक कांग्रेस सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे इन विधायकों ने विधानसभाध्यक्ष सीपी जोशी का अनुमोदन पाने के बाद गत दिनों अपने विधानमंडल दल के कांग्रेस में विलय की घोषणा की। राजस्थान में मायावती के खिलाफ विद्रोह नई बात नहीं है। 2009 में भी मौजूदा बसपा विधायकों के नेता राजेंद्र गुड्डा के ही नेतृत्व में बसपा विधायकों ने गहलोत का हाथ थामा था। कुछ ही दिन पहले गुड्डा ने एक सेमिनार में कहा था कि उन्हें और उनके साथियों को विधानसभा टिकट खरीदने पड़े थे।
दलों का यह विलय दिल्ली में गहलोत और उनके नायब तथा प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष सचिन पायलट की सोनिया गांधी से मुलाकात के तुरंत बाद हुआ। गहलोत ने राजस्थान में अपनी सरकार को आराम से पांच साल चलाना सुनिश्चित करने और मध्य प्रदेश की तरह भाजपा को सरकार गिराने की कोशिश का कोई मौका न देने के बारे में अपनी योजनाओं से सोनिया गांधी को अवगत कराया था। इस विलय के बाद 200 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस सदस्यों की संख्या 100 से बढ़कर 106 हो गई है जबकि निर्दलियों और अन्य को मिलाकर सरकार के पास 120 सदस्यों का समर्थन है।
यह भाजपा के लिए निराशाजनक है, जिसके पास कुल 73 विधायक हैं। उसके नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया जमीनी कार्यकर्ता हैं, जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और उसके बाद युवा मोर्चा से होकर यहां तक पहुंचे हैं। ताकतवर जाट समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले पूनिया की इज्जत और समर्थन पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच ज्यादा है, लेकिन इसकी संभावना कम ही है कि वे मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे। बसपा विधायकों का अपने दल में विलय कराकर सरकार को ज्यादा सुरक्षित करने के गहलोत के कदम के पीछे बड़ा कारण यह भी है कि केंद्र ने हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेता कलराज मिश्र को राजस्थान का राज्यपाल बनाकर भेजा है। इस कदम से अपनी पार्टी की आंतरिक राजनीति में भी पायलट के मुकाबले गहलोत की अपनी स्थिति सुदृढ़ हुई है।
पायलट के विरोधी चाहते हैं कि अगले एक साल के दौरान होने जा रहे स्थानीय निकाय, पंचायती राज और दो विधानसभा क्षेत्रों में उप चुनाव के पहले वे दो में से एक पद छोड़ें। इसी बीच पायलट ने पहले बीती जून में अपने पिता राजेश पायलट की पुण्यतिथि पर, फिर 7 सितंबर को उनके जन्मदिन पर दो भव्य आयोजन करके अपना प्रभाव दिखाने की कोशिश की है। अगर पायलट प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष पद छोड़ते हैं तो वे सरकार में वित्त और गृह जैसे महत्वपूर्ण विभागों के लिए सौदेबाजी कर सकते हैं। ये विभाग अभी मुख्यमंत्री गहलोत के पास हैं जबकि पायलट के पास सार्वजनिक निर्माण विभाग और पंचायती राज विभाग हैं।
समझा जाता है कि सोनिया गांधी के साथ बैठकों के दौरान पायलट ने कानून और व्यवस्था के मोर्चे पर गहलोत की विफलता और नौकरशाही में फेरबदल तथा राजनैतिक नियुक्तियों जैसे मामलों में भरोसे में न लिए जाने की शिकायत की है। दूसरी ओर, गहलोत ने कथित तौर पर सोनिया को सूचित किया है कि पायलट पार्टी और अपने विभागों को पर्याप्त समय नहीं देते और पंजाब के नवजोत सिंह सिद्धू जैसा व्यवहार कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री की निगाह अब आगामी चुनावों पर है और वे भ्रष्ट तथा अक्षम लोगों के खिलाफ सख्ती बरतने वाले प्रशासक के रूप में भी दिखना चाहते हैं। इसके अतिरिक्त, सामाजिक कार्यकर्ताओं अरुणा रॉय और निखिल डे की सलाह पर उन्होंने एक सार्वजनिक सूचना पोर्टल तैयार कराया है जो आरटीआई अधिनियम के तहत मांगी गई अधिकांश जानकारी ऑनलाइन उपलब्ध कराता है। अगले साल तक वे सार्वजनिक जवाबदेही और स्वास्थ्य के अधिकार पर नया कानून लाने पर विचार कर रहे हैं। इससे आंदोलनकारियों से किए वादे पूरे हो जाएंगे। ऑनर किलिंग और मॉब लिंचिंग पर वे पहले ही कानून पारित करवा चुके हैं, जिन पर केंद्र की मंजूरी का इंतजार है। यह सब करते हुए उन्हें पायलट से खींचतान में होने वाले उस नुक्सान का ध्यान रखना होगा जिसकी छाया सरकार की उपलब्धियों पर पड़ती है। बसपा के सभी विधायकों के कांग्रेस में आने से सदन में पार्टी की सदस्य संख्या 106 हो गई है।
– जयपुर से आर.के. बिन्नानी