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महिलाएं अधिक कर्मठ

भारत भले ही एक पुरुष प्रधान देश है, लेकिन यहां महिलाएं किसी भी मायने में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। घर हो या बाहर वे पुरुषों से अधिक काम करती हैं। इसका खुलासा कई रिपोर्टों में हो चुका है।  फिर भी भारतीय समाज में महिलाओं को पुरुषों के समान महत्व नहीं दिया जाता है।
महिलाएं पुरुषों के मुकाबले ज्यादा काम करती हैं। इसकी जानकारी वल्र्ड इकनॉमिक फोरम की ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट से मिलती है। इसके मुताबिक महिलाएं रोजाना पुरुषों से 50 मिनट ज्यादा काम करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस काम के बदले महिलाओं को कोई पैसा नहीं मिलता है, उनकी सूची बढ़ रही है। महिला और पुरुष के बीच असामनता दूर करने के लिए जिस रफ्तार से कोशिश हो रही है, उससे इस काम में 170 साल लग सकते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2008 के बाद से अब तक आर्थिक अवसर के मामले में यह भेद सबसे अधिक हो गया है। वल्र्ड इकनॉमिक फोरम की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले एक दशक में ग्लोबल वर्कफोर्स में कम से कम 30 करोड़ महिलाएं शामिल हो चुकी हैं। बावजूद इसके पुरुषों को महिलाओं की तुलना में 34 फीसदी ज्यादा पेड वर्क मिलते हैं। महिलाएं अब भी अपना ज्यादातर समय अनपेड वर्क जैसे घर के काम, बच्चों की देखभाल और दूसरे लोगों की सेवा में लगाती हैं। अगर इन्हें भी शामिल कर लिया जाए, तो वल्र्ड इकनॉमिक फोरम का अनुमान हैं कि महिलाएं हर साल पुरुषों की तुलना में एक महीने ज्यादा काम करती हैं। भारत, पुर्तगाल और एस्तोनिया में महिलाएं पुरुषों से हर साल 50 दिन ज्यादा काम करती हैं। छह देशों में पुरुष महिलाओं से ज्यादा समय काम करते हैं, इनमें से तीन देश ऐसे हैं जहां पैरेंटल लीव महिला-पुरुष के बीच बांटा जा सकता है।
देश में लंबे समय से लिव-इन रिलेशनशिप पर बहस छिड़ी हुई है। कोई इसका विरोध करता है तो कोई इसके पक्ष में खड़ा रहता है। आरएसएस से जुड़े एनजीओ ‘धृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबंधन केंद्र’ ने अपने सर्वे में दावा किया है कि जो महिलाएं शादीशुदा हैं, वे ज्यादा खुश हैं, जबकि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाएं कम खुश रहती हैं। सर्वे में दावा किया गया कि है कि शादीशुदा महिलाओं की जिदंगी ज्यादा स्थाई और खुशहाल है। सर्वे में यह भी कहा गया है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाए ज्यादा खुश रहती हैं। एनजीओ ने महिलाओं पर एक सर्वे किया है, जिसमें कई आंकड़े पेश किए गए हैं।
एनजीओ ने अपने सर्वे में दावा किया है कि महिलाओं की खुशी के पीछे पैसा नहीं, बल्कि उम्र, शिक्षा और मैरिटल स्टेटस है। एनजीओ ‘धृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबंधन केंद्र’ के सर्वे में कहा गया है कि साल 2017-18 के बीच देश के 29 राज्यों के 465 जिलों में रहने वाली 43,255 महिलाओं पर अध्ययन किया गया। इसके साथ ही 5 राज्यों के 282 जिलों में रहने वालीं 7,675 लड़कियों पर भी अध्ययन किया गया। इस अध्यक्ष के आधार पर एनजीओ ने इन बातों का दावा किया है। सर्वे में कहा गया है कि दो तिहाई तलाकशुदा और पति से अलग रहने वालीं या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वालीं ज्यादातर महिलाएं नौकरी करती हैं।
हर क्षेत्र में महिलाएं निकल रहीं आगे
पढ़ाई हो या नौकरी, महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से आगे निकल रही हैं। खासकर निजी क्षेत्रों में तो महिलाओं का वर्चस्व देखने को मिल रहा है। आज बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने यहां पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को अधिक महत्व दे रही हैं। लेकिन महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन या अन्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। इस विसंगति के कारण महिलाओं में निराशा का भाव देखने को मिल रहा है। इस भेदभाव का असर महिलाओं की कार्य क्षमता पर भी देखा गया है। इसलिए महिलाओं को महत्व देने के साथ ही उनके कार्यों का ठीक से मूल्यांकन भी होना चाहिए, ताकि उन्हें पुरुषों के बराबर पारिश्रमिक मिल सके।
– ज्योत्सना अनूप यादव