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सत्य से साक्षात्कार

गीता हमें कोई उपदेश या मार्गदर्शन नहीं देती बल्कि जीवन के गहन सत्यों से भी हमारा परिचय कराती है। उन सत्यों से जिन्हें जानकर सब भ्रम, झूठ और अंधविश्वास निर्मूल हो जाते हैं। इस प्रकार गीता की भूमिका हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित असत्यों और भ्रमों से सजग करने तक है, इससे आगे का रास्ता तो स्वयं स्पष्ट हो जाता है। समस्या है कि हम अपने अस्तित्व को वस्तुत: स्वीकार नहीं कर पाते; क्योंकि जो झूठ हमारे व्यक्तित्व पर आरोपित हैं, वे आज के नहीं; जन्म-जन्मान्तर के हैं। उनके निराकरण के लिए केवल आईना दिखाना काफी नहीं रहता, बल्कि अनेक कोणों से सत्य की झलक दिखानी होती है। योगी अरविंद का अनुभव था कि ‘गीता के वक्तव्यों में सत्य की झलक इतनी स्पष्ट दिखती है कि एक बार इसके संपर्क में आने वाला सहज ही इसका कायल हो जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता जिसे सम्मान से गीतोपनिषद् भी कहा जाता है, भारतीय धर्म, दर्शन और अध्यात्म का सार है। जो वेदज्ञान नहीं पा सकते, दर्शन और उपनिषद् का स्वाध्याय नहीं कर सकते; भगवद्गीता उनके लिए अतुल्य सम्बल है। जीवन के उस मोड़ पर जब व्यक्ति स्वयं को द्वन्द्वों तथा चुनौतियों से घिरा हुआ पाता है और कर्तव्य-अकर्तव्य के असमंजस में फंस जाता है; भगवद्गीता उसका हाथ थामती है और मार्गदर्शन करती है। गीता नित्य और सनातन संदेश है, जिसकी महत्ता इतिहास के तमाम झंझावातों से गुजरती हुई आज तक यथावत् है। जब-जब कोई कर्तव्यनिष्ठ साधक व्यक्तिगत, पारिवारिक, व्यावसायिक या ऐसे किसी विचारव्यूह में उलझता है तो महात्मा गांधी की तरह उसे भी रास्ता इसी उपदेश से मिलता है। गांधीजी का कहना था कि ‘जब कभी संदेह मुझे घेरते हैं और मेरे चेहरे पर निराशा छाने लगती है; मैं क्षितिज पर गीता रूपी एक ही उम्मीद की किरण देखता हूं। इसमें मुझे अवश्य ही एक छन्द मिल जाता है जो मुझे सांत्वना देता है। तब मैं कष्टों के बीच मुस्कुराने लगता हूं।
गीता रणभूमि की विकट परिस्थितियों में अध्यात्म और कर्तव्य की प्रेरणा का अनूठा उपदेश है। इतिहास के जानकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार 18 फरवरी 5115 ई.पू. रविवार को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच कुल 45 मिनट बातचीत हुई थी, जिसे ‘जय’ नामक काव्य में 72 पद्यों के माध्यम से व्यक्त किया गया था। हालांकि आज इसके विस्तृत संस्करण ‘महाभारत’ में यह ज्ञान 18 अध्यायों और 700 श्लोकों में वर्णित हैं। भीष्मपर्व के अध्याय 25 से 42 में वर्णित इस उपदेश को ‘गीता’, ‘भगवद्गीता’ या ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ नामों से जाना जाता है। यद्यपि इस उपदेश का लक्ष्य अर्जुन को कर्तव्य पालन के लिए उत्प्रेरित करना था; लेकिन अपने उद्भव से आज तक यह अपने उपासकों को जीवन के तमाम संशयों से उबरने का रास्ता सुझाती रही है।
भगवद्गीता भारत की सभी धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक परंपराओं में सहज स्वीकार्य है। सांख्य, योग, वेदान्त के तो अनेक रहस्य इसके श्लोकों में समाहित हैं ही; न्याय, वैशेषिक और मीमांसा के सूत्रों की व्याख्या भी यहां उपलब्ध हो जाती है। यह वेद से लेकर दर्शनों के सिद्धांतों और उपनिषद् से पुराणों तक की कथावस्तु को अपने में समेटे हुए है। न इसका किसी मत से विरोध है और न किसी सिद्धांत से वैमनस्य। अपने तार्किक सिद्धांतों और व्यावहारिक उपदेशों से गीता भारत से बाहर भी मान्य और सम्मानित है। 1785 में चाल्र्स विल्किंस द्वारा पहले अंग्रेजी अनुवाद के बाद से 1982 तक गीता के 75 भाषाओं में 1982 अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। यही गीता की विश्वव्यापी स्वीकृति का प्रमाण है। विश्व जनमानस को भारतीय दर्शन  और अध्यात्म से परिचित कराने वाले इस काव्य का अध्ययन और अध्यापन आज ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड और बर्कले जैसे अग्रणी विश्वविद्यालयों में किया जा रहा है।
आत्मस्वरूप से परिचित होने के बाद भी मनुष्य के लिए सद्ज्ञान, सिद्धांत और विचारधारा पर चल पाना संभव नहीं होता। संसार और समाज की परिस्थितियों के कारण अनेक बार सत्य से समझौता करना पड़ता है। अपने से ज्यादा चुनौतियां उनके हित में सामने आती हैं, जिन्हें हम अपनत्व का अंग मानते हैं। ऐसे में कर्तव्यपथ पर चल पाना कभी-कभी तो असंभव हो जाता है। गीता इसी झिझक और असमंजस से उबरने का उपदेश है। यह उपदेश सिर्फ शाब्दिक नहीं बल्कि व्यावहारिक है। इसमें सलाहों से आगे बढ़कर तर्कों और शाश्वत मूल्यों का उल्लेख है, जिनके प्रकाश में सत्य का पालन संभव हो जाता है। इस उपदेश के माध्यम से श्रीकृष्ण केवल कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में हतोत्साहित अर्जुन को ही धर्मयुद्ध में प्रेरित नहीं करते; बल्कि मनुष्यमात्र को अपने कर्तव्यों को जानने और बिना शंका के उनकी पूर्ति में जुट जाने का आव्हान करते हैं। यही श्रीमद्भगवद्गीता की महती विशेषता है।
इस एक ही ग्रन्थ में धर्म, कर्म, योग, जीवन, जगत और इनके गहन रहस्यों का अद्भुत समावेश है। यह एकमात्र स्त्रोत है, जिसमें ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का अद्भुत समन्वय पाया जाता है। गीता का सबसे बड़ा संदेश है कि चाहे कुछ भी हो जाए; हमारा विश्वास उस परमात्मसत्ता से डिगना नहीं चाहिए। दुख में या चुनौतियों के बीच परमात्मा की कृपा का जितना आधार हो; सुख में उसकी कृपा के प्रति उससे भी अधिक आभार रहना चाहिए। परमात्मा की सर्वव्यापकता और सर्वशक्तिमत्ता को भुलाकर हम कर्मफल की व्यवस्था को अपने वश में कर लेना चाहते हैं। ऐसा अहंकार सामान्य जनों ही नहीं; महापुरुषों तक को ले डूबता है। भगवद्गीता की लगभग पचास प्रतिशत ऊर्जा अकेले इसी भ्रम को निर्मूल करने में लगी है। भगवान कृष्ण ज्ञान, कर्म और भक्तियोग के समन्वय से जो तथ्य साफ कर देना चाहते हैं उनमें प्रमुख हैं; निजरूप का परिचय, कर्तव्य का बोध, आत्मा की नित्यता, शरीर की परिवर्तनशीलता, कर्म के प्रति दृढता, कर्मफल की परवशता और परमात्मसत्ता के प्रति अनन्य आस्था।
ओम