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सियासी उलझन

राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव तीन चरणों में होंगे, पहले चरण में 52 निकायों के चुनाव नवम्बर में होंगे। स्थानीय निकाय निदेशक उज्ज्वल राठौड़ द्वारा इस आशय की अधिसूचना जारी होने के साथ ही चुनावी घमासान तेज हो गया है। लेकिन बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही सियासी उलझन में हैं। जहां विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस ने बीजेपी को मात दे दी थी, वहीं लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी ने जीत दर्ज करवाई थी। जाहिर है, इन चुनावों में स्थानीय मुद्दे ज्यादा असरदार रहेंगे, लिहाजा दोनों ही प्रमुख दलों को अनेक सियासी समस्याओं का सामना करना होगा। ज्यादातर जगहों पर बीजेपी का कब्जा है, इसलिए बीजेपी के सामने स्थानीय सत्ता बचाने की बड़ी चुनौती है।
राजस्थान में नवंबर में होने वाले निकाय चुनाव में जीत हासिल करने के लिए प्रदेश भाजपा बड़े स्तर की योजना बना रही है। इसके तहत हर निकाय के लिए प्रत्याशी चयन से लेकर चुनाव प्रबंधन तक की अलग रणनीति बनेगी। प्रस्तावित निकाय चुनाव में जयपुर नगर निगम सहित 51 निकायों के चुनाव होंगे। लोकसभा चुनाव में मिली जीत के बाद प्रदेश में यह पहला बड़ा चुनाव होगा। मौजूदा कांग्रेस सरकार ने नगरीय निकायों का नए सिरे से परिसीमन कर हर निकाय में वार्ड बढ़ाए हैं और यह परिसीमन ही भाजपा के लिए कुछ परेशानी खड़ी कर रहा है, क्योंकि निकाय चुनाव के परिसीमन में अक्सर सत्ताधारी दल के नेताओं का वर्चस्व रहता है।
वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा ने भी यही किया था और अब कांग्रेस ने भी इसी राजनीतिक पैंतरे को अपनाया है। बताया जा रहा है कि भाजपा की निकाय चुनाव प्रबंधन कार्यशाला में भी वार्डों के परिसीमन पर काफी देर तक चर्चा हुई और इसकी काट ढूंढने के उपायों पर भी विचार किया गया। जयपुर जैसे बड़े शहर में तो सरकार ने एक साथ 60 वार्ड बढ़ा दिए हैं। वार्ड परिसीमन के साथ ही निकाय प्रमुख का सीधा चुनाव भी इस बार के निकाय चुनाव को बड़ा चुनाव बना रहा है। भाजपा इस चुनाव को लोकसभा चुनाव जितना ही अहम मान रही है। पार्टी ने इसकी अभी से तैयारी शुरू कर दी है। बड़े नेताओं को अलग-अलग निकायों की जिम्मेदारी दी जाएगी और हर निकाय का चुनाव अलग रणनीति से लड़ा जाएगा।
पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता और विधायक सतीश पूनिया ने बताया कि अभी हमारा जोर घर-घर संपर्क पर रहेगा। हम अपनी बूथ समितियों को सक्रिय कर हर परिवार से संपर्क करेंगे और राज्य सरकार की विफलताओं तथा केंद्र सरकार की उपलब्धियों को उन तक पहुंचाएंगे। इसके अलावा हमारी पिछली सरकार के जो काम मौजूदा सरकार ने रोक दिए हैं, उनके बारे में भी लोगों को बताया जाएगा। इसके लिए हम साहित्य भी तैयार करवा रहे हैं। इसके अलावा हर निकाय के लिए अलग समन्वय समिति बनाई जाएगी। इसमें वहां के स्थानीय विधायक या विधायक का चुनाव लड़ चुके नेता, स्थानीय जिला अध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी रहेंगे। प्रत्याशियों का चयन इस समन्वय समिति के माध्यम से ही किया जाएगा। इसके साथ ही चुनाव प्रबंधन समिति भी बनेगी। उन्होंने बताया कि हम इस चुनाव को लोकसभा चुनाव जैसी तैयारी के साथ ही लड़ रहे हैं।
दूसरी तरफ सत्तारूढ़ कांग्रेस ने भी निकाय चुनाव के लिए मोर्चा संभाल लिया है। कांग्रेस राज्य सरकार के कामकाज के दम पर निकाय चुनाव में जीत का दांव खेल रही है। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पूर्व किए गए वादे के मुताबिक निकाय चुनाव लडऩे के लिए शैक्षणिक योग्यता का बैरियर पहले ही हटा दिया है। वह इसको भुनाने के साथ ही बजट की घोषणाओं को भी निकाय चुनाव में जनता के बीच लेकर जाएगी। निकाय चुनाव के लिए दोनों पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से तैयारियां शुरू जरूर कर दी है, लेकिन शहरी सरकार का सेहरा जनता किसके सर बांधेंगी यह तो चुनाव परिणाम आने पर ही पता चल पाएगा।
-जयपुर से आर.के. बिन्नानी