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उम्मीदों का कानून

कुछ असमंजस के बीच एक सितंबर से पूरे देश में नया मोटर वाहन कानून प्रभाव में आ गया है और सड़कों पर वाहन चलाते समय ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन बहुत भारी भरकम जुर्माना और सजा दिला सकता है। जानकारों का मानना है कि भारी भरकम प्रावधानों से पहले एक जागरूकता अभियान भी चलाया जाता तो ज्यादा असर पड़ता। कांग्रेस शासित पंजाब, मध्यप्रदेश और राजस्थान ने बिल के प्रावधानों पर पुनर्विचार कर संशोधन करने और जुर्माने की राशियों को कम करने की बात कही है, पश्चिम बंगाल ने भी इससे नाराजगी जताई है, उधर बीजेपी शासित गुजरात में भी कानून को लेकर दुविधाएं और सवाल हैं। गुजरात सरकार मानती है कि जुर्माने की निर्धारित रकम बहुत ज्यादा है और ये व्यवहारिक नहीं है। यही नहीं आरटीओ की रिपोर्ट के बाद गुजरात ने नये प्रावधानों को लागू कर दिया है। राजस्थान का कहना है कि कुछ मामलों में तो पेनल्टी वाहन की कीमत से भी ज्यादा रखी गई है।
1988 के मोटर वाहन कानून में संशोधन के साथ ये बिल 2017 में लोकसभा में पेश किया गया था। राज्यसभा में पास न होने और 16वीं लोकसभा भंग हो जाने के बाद ये लैप्स हो गया। मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में दोबारा इस बिल को लेकर आई। सड़क हादसों की दर 2020 तक आधा करने के लक्ष्य वाले एक प्रस्ताव पर 2015 में ब्राजीलिया की बैठक में हस्ताक्षर करने वाले देशों में भारत भी है। इसी बैठक के बाद मोटर वाहन कानून में संशोधन पर जोरदार ढंग से काम शुरू हुआ। भारत में पहला मोटर वाहन कानून 1914 में बना था। उसके बाद 1939 का मोटर वाहन कानून आया जिसकी जगह 1988 के मोटर वाहन अधिनियम ने ली थी। तबसे यही कानून अमल में था।
सन 2000 से सड़कों की लंबाई अगर 39 प्रतिशत बढ़ी है तो मोटर वाहनों की संख्या में 158 प्रतिशत का उछाल आया है। 1950 के दशक में भारत में सड़कों की लंबाई चार लाख किलोमीटर थी। 2015 में ये 55 लाख किलोमीटर हो चुकी थी। कुल सड़क नेटवर्क में राष्ट्रीय राजमार्ग दो प्रतिशत, राज्यों के हाइवे तीन प्रतिशत हैं। लेकिन 52 प्रतिशत मौतें इन्हीं राजमार्गों पर होती है। जाहिर है वाहनों की संख्या के मुकाबले सड़कों का सुधार कहीं नहीं था और रही-सही कसर लचीले और सुस्त ट्रैफिक नियमों ने पूरी कर दी, जो थे भी उनकी अनदेखी और अनुपालन में ढिलाई हुई।
राज्यों में गठित आरटीओ का काम ड्राइविंग लायसेंस जारी करने का है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया और वाहनों के पंजीकरण, पहाड़ी इलाकों में परिवहन, पुराने वाहनों को अनापत्ति और अन्य किस्म के सर्टिफिकेशन और प्रमाणीकरण के काम के इर्दगिर्द भ्रष्टाचार भी खूब पनपा। लाख ऐक्शन हुए लेकिन दलालों ने अपने ठिकाने जमाए और चमकाए। सरकार के मुताबिक देश में जारी होने वाले 30 प्रतिशत ड्राइविंग लायसेंस बोगस यानी फर्जी हैं।
हर साल पूरी दूनिया में 10 लाख से कुछ ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। इनमें से 11 प्रतिशत मौतें भारत में होती हैं जबकि भारत में पूरी दुनिया के दो प्रतिशत वाहन ही हैं। इस लिहाज से देखें तो सड़क हादसों में भारत का ग्राफ बहुत बुरा है। भारत में हर साल करीब डेढ़ लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। हर रोज औसतन 411 मौतें, और हर चार मिनट में एक मौत। कैंसर जैसी घातक और अन्य जानलेवा बीमारियों और कथित आतंकी हमलों से होने वाली मौतों से ये आंकड़ा कहीं अधिक है। भारत में जन स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा ही नहीं सड़क सुरक्षा एक आर्थिक चिंता का कारण भी है। सड़क हादसों में हर साल भारत अपनी जीडीपी का तीन फीसदी गवां देता है।
-कुमार विनोद