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जनप्रतिनिधियों की तलाशी अनुचित

मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष सीताशरण शर्मा का मानना है कि जनप्रतिनिधियों की तलाशी लेना उचित नहीं है। बेहतर यही होगा कि वे स्वयं ही अपना आचरण सुधार लें। पाक्षिक अक्स के संपादक के साथ साक्षात्कार में सीताशरण शर्मा ने विभिन्न मुद्दों पर अपनी बेबाक राय रखी, जिसके मुख्यांश प्रस्तुत हैं-
संसद और विधानसभाओं में सदस्यों का अशोभनीय आचरण जारी है। मिर्च पाउडर फेंका जाता है। रिवाल्वर दिखाई जाती है, जूते चलते हैं। इसको लेकर आप कितने गंभीर है।
यह सब घटनाएं दुर्भाग्यपूर्ण हैं लोकतंत्र को कमजोर करने वाली हैं, और सदन लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा जैसे सदनों की मर्यादा कम करने वाली है। लोकतंत्र मूलत: अनुशासन से चलता है और वह अनुशासन आत्म अनुशासन होता है। विशेष बात यह है कि जो अन्य शासन की पद्धतियां हैं उनमें अनुशासन की गुंजाइश कम है और प्रशासनिक अनुशासन की गुंजाइश ज्यादा है, किंतु हमेशा ही ज्यादतियां होती है और हमने आपातकाल के समय इसको देखा है। जनता से हम यह अपेक्षा रखते हैं तो जनप्रतिनिधियों को इसका ध्यान रखना ही चाहिए। मैं ऐसा सोचता हूँ कि यह माननीय सदस्यों के स्वयं पर नियंत्रण रखने से ही संभव हो सकेगा। इसलिए उन्ही की भावनाओं को जागृत रखना होगा।
विपक्ष कहता है कि हमें अपनी बात कहने का मौका नहीं मिलता। अभी हाल में संपन्न विधानसभा सत्र के दौरान विपक्ष ने व्यापमं का मुद्दा उठाने की कोशिश की थी, लेकिन उन्हें अपनी बात कहने नहीं दी गई और जो कुछ कहा वह गंभीरता से नहीं सुना गया। इस बारे में आपका क्या कहना है।
जहां तक विपक्ष को अपनी बात कहने का प्रश्न है वे भी भरोसा रखें और आप भी कि उनको पूरी बात कहने का अवसर दिया जाएगा। किंतु उसमें दो-तीन बातों का ध्यान उनको भी रखना पड़ेगा। सदन ही नहीं कोई भी संस्था नियम और परंपराओं से चलती है। नियमों और परंपराओं की ही चिंता आपको भी हो रही है और मुझे भी तो आप से ज्यादा चिंता मुझे करनी पड़ेगी। जो भी विषय है उन सब पर चर्चा के नियम दिए गए हैं। आप उन चर्चाओं को उठाइए कोई ऐतराज नहीं है। परंतु चर्चा के बाहर कभी भी, किसी भी समय विषय को कैसे उठाने दिया जाए। क्योंकि सभी सदस्यों को समान अवसर देना जरूरी है। ये नियम इसलिए बनाए गए हैं। दूसरे कोई भी विषय उठाते समय भाषा की मर्यादा का ख्याल रखना पड़ेगा। ये दो ऐसी चीेजें हैं जिनका पालन होगा तो सभी को अवसर मिलेगा।
नेता प्रतिपक्ष ने पिछली बार व्यापमं को लेकर कुछ मंत्री और अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए थे। चर्चा के दौरान आपको कम से कम 10 बार आसंदी से यह कहना पड़ा कि इस बात को विलोपित कर दिया जाए। नेता प्रतिपक्ष जिस तरह की भूमिका अदा कर रहे हैं उसे देखकर आपको लगता है कि यह सदन गरिमामय तरीके से चलता रहेगा। ऐसा लगा कि नेता प्रतिपक्ष सदन और जनता को बताने के लिए या मीडिया को मैसेज देने के लिए ऐसा कर रहे थे।
मैं इस बात को उचित नहीं समझता कि नेता प्रतिपक्ष जी या माननीय के सदस्य के किसी आचरण पर व्यक्तिगत या सार्वजनिक टिप्पणी करो।
फिर भी मर्यादा का जब बहुत अधिक उल्लंघन हो तो फिर कैसे कठोर कार्रवाई करेंगे। क्योंकि बार-बार विपक्ष द्वारा व्यवधान और आपके द्वारा विलोपित करने को कहना उचित नहीं जान पड़ता।
सभी चीजें कठोर कार्रवाई से नहीं होती। समन्वय से भी होती हैं और इसीलिए चर्चा से भी इन बातों का हल होता है। कुछ सदन के अंदर कुछ सदन के बाहर कक्ष में। चर्चाओं से सारी बातों का हल निकल सकता है। इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। लोकतंत्र में तो यही तरीका है।
बजट सत्र आने वाला है यदि लोकसभा के चुनाव घोषित हो जाते हैं तो यह सत्र चालू रहेगा।
मैं सोचता हूं कि इसमें कोई नीति विषयक निर्णय नहीं होंगे। जहां तक सामान्य कामकाज की बात है उसमें आचार संहिता से कोई बाधा नहीं होगी।
बजट सत्र को इतना छोटा करने की क्या आवश्यकता है।
यह विषय भी मेरा नहीं है। उस पर मैं कैसे बोल सकता हूं।
विपक्ष ने 75 बैठकों की मांग की थी नेता प्रतिपक्ष ने चिट्ठी भी लिखी फिर भी इतना छोटा बजट सत्र 230 विधानसभा सीटों वाले प्रदेश में चर्चा के लिए इतने कम दिन आपकी भी कुछ व्यक्तिगत राय होगी?
स्पीकर की कोई व्यक्तिगत राय नहीं होती जो कुछ सदन में है उसे ही ठीक से संचालित करना हमारा कर्तव्य है। उसके बाहर जाना उचित नहीं है मैंने बहुत से पूर्व उदाहरण अभी पढ़े हैं और उसमें भी यही पाया है क्योंकि मैं कुछ भी कहूंगा तो इस या उस पक्ष में होगा जिससे संदेह गहराएंगे। इसलिए निजी राय रखते हुए भी उनको जाहिर नहीं करना यही हमारा धर्म है। 
आपने बहुत शालीनता से अपनी बात कही है, लेकिन अध्यक्ष कुछ भी नहीं बोलेंगे तो अखबारों की लाइनें बढ़ेंगी कैसे। सच तो यह है कि नियमों के मुताबिक न तो वह हाउस चलता है और ना सदस्य। आप कितना भी बुलाकर चर्चा करें होता वही है जो उन्हें करना है और मीडिया को बताना है।
जैसा मैंने पहले भी कहा कि विरोध का एक लोकतांत्रिक तरीका है। विरोध और बहिर्गमन की एक परंपरा है। जिस विषय के खिलाफ बहिर्गमन किया जाता है वह समाप्त हो जाता है। उस पर फिर बोला नहीं जाता। आसंदी को घेर लेना और कागज फेंकना गलत है। बहिर्गमन एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। इस विषय पर एक लेख सामने आया था कि यह हल्ला-गुल्ला कैसे रोकें। किसी समाजवादी सांसद ने लिखा था यह तो हमारा अधिकार है तो इसमें अलग-अलग विचार हैं। किंतु फिर भी इस अधिकार को बरकरार रखते हुए भी मर्यादा सबके लिए जरूरी है। दूसरे आपने कहा कि आप बोलेंगे नहीं तो काम कैसे चलेगा। तो मैं आपको स्पीकर का इतिहास बताता हूं। ब्रिटेन में राजा के खिलाफ कोई बोलता नहीं था और जो बोलता था उसे गोली मार दी जाती थी, गला रेत दिया जाता था। इसलिए यह स्पीकर शब्द बना। कालांतर में जब संसदीय प्रणाली बनी तो स्पीकर शब्द रह गया नाम तो वही है, लेकिन बोलते कुछ नहीं तो मैं कैसे बोलूंगा।
आपने कहा था कि लोकतंत्र थ्री-डी है। डिमेट डिस्कशन और डिसीजन से चलता है, किंतु जब सदन में काम का समय ही नहीं रहेगा तो यह कैसे संभव होगा।
इसीलिए दोनों पक्षों को और विशेष करके प्रतिपक्ष को यह समझना पड़ेगा कि जो चीजें चर्चा से हल हो सकती है वे हल्ले-गुल्ले से हल नहीं हो सकती। किंतु इसमें मुझको ऐसा लगता है कि मीडिया का बहुत बड़ा रोल होना चाहिए। देश के दो बड़े प्रतिष्ठित सांसद जिनमें से एक अब नहीं है ने कुछ बातें कही हैं। उनमें से एक ने कहा कि मैं जब भी सदन में जाता हूं अपने कक्ष में तैयारी करके जाता हूं। सुनता तो कोई है नहीं न मंत्री न सदस्य, बस लिखा जाता है और जो कुछ फालतू बातें होती है वे रेड लाइन में आ जाती हैं। हर व्यक्ति अपने क्षेत्र से चुनकर आता है और क्षेत्र के लोग यह सोचते हैं कि हमारे प्रतिनिधि ने कुछ कहा ही नहीं। ये जो चिल्ला रहे हैं बोल रहे हैं उनके बारे में कहा जा रहा है कि ये बड़े तेज हैं। ये लोकतंत्र की एक कमजोरी भी है पर इसके साथ ही अपने को जीना पड़ेगा और लोकतंत्र को जिंदा भी रखना पड़ेगा। इसके लिए सत्तापक्ष, आसंदी, प्रतिपक्ष और प्रेस को जवाबदारी समझनी पड़ेगी। इस पर एक गोष्ठी भी होनी चाहिए। दूसरे लीडर हैं वे सदन में चिल्लाकर अपनी बात कहकर खबर में बने रहते हैं। एक बार मैं भी जब प्रतिपक्ष में था तो धरने पर बैठ गया था और रात भर बैठा रहा। बाद में वरिष्ठ नेतृत्व ने कहा कि बहस करो यह बहस करने का स्थान है।
विधानसभा की सुरक्षा भी एक बड़ा प्रश्न है। पिछली बार एक नकली विधायक सदन में बैठ गया था बाद में उसे हटवाया गया। यदि कल को कोई पिस्तोल निकालकर गोली चला देगा तो इसका क्या हल है। सिर्फ जो गेस्ट आते हैं उनकी तलाशी होती है मीडिया और विधायकों की तलाशी नहीं होती। क्या यह एक जोखिम नहीं है।
आपका कहना ठीक है। यह बड़ा दुर्भाग्य है इस देश के अंदर नियमों को अपमान समझ लिया जाता है और यहां भी यही समस्या है पर इसके लिए कोई व्यवस्था हम करेंगे सबकी सहमति से। सुरक्षा तो होनी ही चाहिए। परिचय पत्र जैसी कोर्ई व्यवस्था की जाएगी।
अमेरिका में एयरपोर्ट पर तलाशी होती है, लेकिन संसद, विधानसभाओं में तलाशी नहीं होती। क्या उनका तलाशी लेना सही है या हमारा तलाशी नहीं लेना सही है।
दोनों ही सही हैं। यह सदन उन्हीं का है जो सदन में मिर्च पाउडर लेकर आ रहे हैं। सदन की मर्यादा सबको रखनी पड़ेगी। लोकतंत्र की यह विशेषता है कि यह अपनी समस्याओं का समाधान स्वत: ही तलाश लेता है। इस समस्या का भी हल निकल आएगा या तो ऐसे लोग दोबारा आ नहीं पाएंगे और या ये खुद सुधर जाएंगे या दूसरे सदस्य सुधार देंगे।
मध्यप्रदेश के कई विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां चुनाव के दौरान हिंसा हुई। एक विधायक की तो हत्या भी कर दी गई। वे ही लोग चुनकर विधानसभा में आते हैं और आपसी विद्वेष रखते हैं तो सदन में भी घटनाएं हो सकती हैं। इसलिए मेरा एक लाइन में प्रश्न है कि क्या विधायकों की तलाशी होनी चाहिए।
नहीं तलाशी नहीं होनी चाहिए।