देख भाई देख मंत्रालय

लंबे समय से एक अदद प्रमोशन के लिए तरस रहे राकेश अग्रवाल को मंत्रालय की पांचवीं मंजिल पर आखिर मंजिल मिल ही गई। यह पांच का आंकड़ा उनके लिए बड़ा शुभ साबित हुआ क्योंकि उनसे पहले के पांच अफसर पहले ही एसईएस बन गए थे और राकेश अग्रवाल पीछे रह गए थे। बहरहाल इस पिछडऩे के पीछे एक लंबी दास्तान है। हुआ कुछ यूं कि जब अग्रवाल आवास एवं पर्यावरण विभाग के प्रमुख सचिव हुआ करते थे उस समय पर्यावरण को लेकर कुछ ज्यादा ही जागरुक थे और इस ‘जागरुकताÓ का परिचय उन्हें जेपी सीमेंट को लीज दिए जाने संबंधी एक मामले में तब दिया था जब उन्हें पता चला कि लीज नियमानुसार नहीं है। मंत्रालय के गलियारे में चर्चा है कि जेपी सीमेंट का मालिक किसी से कम नहीं है। उन्होंने इस मामले के लिए अग्रवाल को उचित तिलक करने की घोषणा कर दी। परंतु ईमानदार अफसर को यह बात जमी नहीं। इसको लेकर बात मुख्यमंत्री तक पहुंची फिर क्या था सइया भए कोतवाल तो डर काहे का। इसी तर्ज पर तत्कालीन मुख्य सचिव राकेश साहनी ने भी अग्रवाल की लू झाडऩे में कोई कसर नहीं छोड़ी और फिर क्या मुख्य सचिव तो मुख्य सचिव हैं उसने उनकी सीआर पर पलीता लगा दिया और उन्हें वहां से उन्हें मंत्रालय से रुख्सत कर दिया गया। नई जगह पर फिर अग्रवाल का झगड़ा मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष के साथ हो गया इसका फिर खामियाजा उन्हें अपने अपर मुख्य सचिव बनने की सीढ़ी पर भोगना पड़ा। इस तरह राकेश अग्रवाल अपने पूरे कॅरियर में भिड़ते रहे और उनके वरिष्ठ उनकी सीआर के साथ होली खेलते रहे। अब जाकर उन्हें अपने से नीचे वालों के बाद प्रमोशन मिल पाया। मुख्यमंत्री से सुलह से फायदा तो मिला, परंतु उनके साथ एक और अफसर नवाजे गए। इन महाशय की गलती सिर्फ इतनी है कि इनके विरुद्ध आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने 2004 में मुकदमा दर्ज कर लिया था। तब से इनके प्रमोशन को लेकर ग्रहण लगे हुए हैं। इसी तरह 1982 बैच के एक और अफसर जो सामान्य प्रशासन विभाग में प्रमुख सचिव ही रह गए हैं। वह महाशय प्रतिनियुक्ति पर जब थे तब उस समय उनके खिलाफ सीबीआई ने एक मामला दर्ज कर लिया था। इस कारण उन्हें इस प्रमोशन से वंचित रखा गया है, परंतु दूसरे महाशय को सशर्त प्रमोशन दे दिया। सीबीआई के मामले में फंसे अफसर की फाइल तो राज्य और दिल्ली के बीच झूल रही है। राज्य सरकार ने अपने हाथ खड़े करते हुए यह कह दिया कि उक्त अधिकारी भारत सरकार की प्रतिनियुक्ति पर थे इसलिए उस समय के मामले को वही डील करें। वहीं भारत सरकार ने प्रतिनियुक्ति से अप्रैल माह से लौटने वाली 1980 बैच की स्वर्ण माला रावला के आने पर जो अभी राज्य सरकार ने अपर मुख्य सचिव बनाए हैं उनमें से एक की बली तय हैं। यह बलिदान संभवत: 1982 बैच की सुरंजना-रे को ही देना पड़ेगा।
आईएएस नहीं महाप्रभु हैं
प्रशासनिक अफसरों खासकर आईएएस की प्रतिरक्षा प्रणाली इतनी मजबूत होती है कि छोटे-मोटे हमले तो ऐसे ही झेल लेते हैं। अब देखिए न 1980 बैच की अजिता वाजपेयी पाण्डे के खिलाफ चालान तो लग गया है, लेकिन उनका बाल बांका नहीं हुआ। अब अन्य सेवाओं के अधिकारी और कर्मचारी चिल्ला रहे हैं कि यदि किसी डिप्टी कलेक्टर या छोटे-मोटे कर्मचारी के खिलाफ चालान लगता तो नियमों के मुताबिक उसे निलंबित कर दिया जाता और जिंदगीभर उसको इस अपराध की सजा भोगनी पड़ती। लेकिन भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर तो महाप्रभु हैं उनके खिलाफ भला कोई जांच कैसे हो सकती है, उन पर चालान नहीं लगता उन पर चालान लगाना हो तो मामला केंद्र को भेजा जाता है और उसके बाद भी निलंबनका कोई नियम नहीं है कि उन्हें निलंबित नहीं किया जाता है इसीलिए उन्हें एलायंस कहा जाता है।
जूते पड़े महंगे
खादी एवं ग्राम उद्योग की एमडी रहते हुए शिखा दुबे के मन में भी महिला उद्यमिता जाग उठी। लिहाजा उन्होंने  भी दो सोसाइटियां रजिस्टर्ड करा ली। यह सोसाइटी वह सब काम करती थी जो उनके कार्पोरेशन में होता है। परंतु इस सोसाइटी का काम जूते बनाने का नहीं था। यह काम तो चर्मकारों का ही है पर मजे की बात यह है कि इस सोसाइटी ने उसका भी काम छीन लिया और आगरा से जूते लाकर कहीं नहीं तो उनके श्रीमानजी के निगम में ही सप्लाई कर दिए। भला घर की बात तो माननी ही पड़ेगी और उन्होंने भी सप्लाई अच्छे दामों पर ले ली। बाद में दूसरे दिलजलों ने छानबीन की तो पता चला कि मैडम के ही बनाए हुए एनजीओ ने फारेस्ट विभाग को जूते पिना दिए। फिर क्या था शिकवा शिकायत में तो हम मशहूर हैं। इस शिकायत की गंभीरता को देखते हुए सरकार ने उन्हें मंत्रालय से खो कर दिया। जबकि जुम्मे-जुम्मे आए हुए दिन ही कितने हुए थे। भला वो तो अपने कमरे का इंटीरियल करा रही थी। उसी शाम लिस्ट में उनका नाम आ गया।

अब ये देश संभालेंगे
हाल ही में मध्यप्रदेश के एक आईएएस अफसर  1995 बैच के सचिन सिन्हा का ज्वाइंट सेके्रटरी के लिए एमपेनलमेंट हुआ है। मध्यप्रदेश से वे केवल एकमात्र अफसर हैं जिनका एम्पेनलमेंट हुआ। सिन्हा के अतिरिक्त मध्यप्रदेश काडर के दो और अधिकारी भारत सरकार में डेपुटेशन पर जाएंगे जिनमें पंकज राग, नीरज मंडलोई का नाम प्रमुख है। पंकज राग संस्कृति में पहले रह चुके हैं और दिल्ली में भी वे इसी विभाग में जा रहे हैं। जहां तक नीरज मंडलोई का प्रश्न है। उनका विभाग अभी तय नहीं है।