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राजे युग का अंत?

हाल में सम्पन्न विधानसभा सत्र के दौरान एक और खास बात भी चर्चा में रही। यह थी पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया का इससे नदारद रहना। चर्चा थी कि वे विदेश यात्रा पर हैं। वसुंधरा राजे की इस गैरमौजूदगी ने राजस्थान में कई तरह के कयासों को हवा दे दी है। इसकी वजह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री व भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से उनका पुराना टकराव।
वसुंधरा राजे और नरेंद्र मोदी के बीच अनबन सबसे पहले 2008 में राजस्थान-गुजरात की संयुक्त नर्मदा नहर परियोजना के उद्घाटन के समय सामने आयी थी। तब एक ही पार्टी से होने के बावजूद इन दोनों मुख्यमंत्रियों ने एक-दूसरे के कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं लिया था। उनकी यह अदावत राजस्थान में पिछली वसुंधरा सरकार (2013-18) के दौरान चरम पर नजर आई। इस दौरान अध्यक्ष अमित शाह और वसुंधरा राजे भी कई बार आमने-सामने देखे गए। तब शायद ही ऐसी कोई छमाही गुजरी जब सियासी गलियारों में वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की चर्चा ने जोर न पकड़ा हो। लेकिन अपने विधायकों पर उनकी जबरदस्त पकड़ के चलते उन्हें टस से मस नहीं किया जा सका।
लेकिन छह महीने पहले भारतीय जनता पार्टी की राजस्थान विधानसभा चुनाव में शिकस्त के बाद से पार्टी स्तर पर वसुंधरा राजे को प्रभावहीन करने की कोशिशों में खासी तेजी आई है। इसकी शुरुआत भाजपा हाईकमान ने वसुंधरा राजे की बजाय प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया को नेता प्रतिपक्ष बनाकर की, जबकि कहा जा रहा था कि पूर्व मुख्यमंत्री खुद इस पद को संभालना चाहती हैं। कटारिया और राजे के संबंध सामान्य नहीं माने जाते। 2012 में जब राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी विपक्ष में थी तब वसुंधरा राजे ने कटारिया की एक चुनावी यात्रा के विरोध में पार्टी छोडऩे की धमकी तक दे दी थी। नतीजतन उनको अपनी यात्रा स्थगित करनी पड़ी।
फिर इस लोकसभा चुनाव में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने राजस्थान के कद्दावर जाट नेता हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के साथ गठबंधन कर वसुंधरा राजे को असहज करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सूबे में बेनीवाल की छवि घोर राजे विरोधी के तौर पर स्थापित है। बाद में केंद्रीय कैबिनेट में जिन गजेंद्र सिंह शेखावत, अर्जुनराम मेघवाल और कैलाश चौधरी को शामिल किया गया, उन्हें भी राजे विरोधियों के तौर पर ही पहचाना जाता है। हाल ही में लोकसभा अध्यक्ष बनाए गए ओम बिरला से भी पूर्व मुख्यमंत्री की तनातनी की खबरें किसी से छिपी नहीं हैं।
फिलहाल वसुंधरा राजे भारतीय जनता पार्टी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी निभा रही हैं। कई राजनीतिकारों का कयास है कि चूंकि उनकी बगावती फितरत आगे चलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खास तौर पर अमित शाह के लिए मुश्किल पेश कर सकती है, इसलिए उन्हें राजस्थान से दिल्ली बुलाकर धीरे-धीरे हाशिए पर धकेलने की दिशा में काम शुरु हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अध्यक्ष अमित शाह की राजनीति के अंदाज और लोकसभा चुनावों के बाद संगठन में उनके बढ़े कद को देखते हुए विशेषज्ञों का मानना है कि अब वसुंधरा राजे को संभलने का मौका मुश्किल ही दिया जाएगा। इस पूरे घटनाक्रम को कुछ पत्रकार राजनीति और खासतौर पर राजस्थान में वसुंधरा राजे युग के अंत के तौर पर देखते हैं। उनके अनुसार राजे भी इस बात को समझ गई हैं, इसलिए सक्रिय रहकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की बजाय वे रण छोड़कर जा चुकी हैं। लेकिन ऐसे विश्लेषकों की भी कमी नहीं जो यह कहना जल्दबाजी मानते हैं। उनके मुताबिक जिस तरह वसुंधरा राजे अब तक शांत दिखी हैं, यह उनका सामान्य व्यवहार नहीं है। उनकी राजनीति को करीब से जानने वाले बताते हैं कि जितनी बखूबी से उन्हें अपनी अहमियत और कद का अहसास है, उतनी ही महारत उन्हें मौके पर चौका मारने में भी हासिल है। उनका राजनीतिक इतिहास इस बात की गवाही जोर-शोर से देता है।
-जयपुर से आर.के. बिन्नानी