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सिंधू का तूफान

पुसरला वेंकटा सिंधू के पास इतिहास रचने की क्षमता तो हमेशा से रही है लेकिन 25 अगस्त को स्विटजरलैंड के शहर बासेल में उन्होंने अपनी पुरानी प्रतिद्वंद्वी जापान की नोजोमी ओकुहारा को हरा कर अपने इस संकल्प को हकीकत में बदल डाला और भारत के इतिहास में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल कर इतिहास रच दिया। पदक हासिल करने से ज्यादा बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह देखने की है कि वे पूरे टूर्नामेंट में किस तरह से खेलीं और पिछले टूर्नामेंट के मुकाबले इस बार किस तरह की रणनीति अपनाई। सिंधू ने यह साबित कर दिखाया है कि उनमें कोर्ट पर आलराउंड प्रदर्शन करने की गजब की काबिलियत है। अपने गेम में शुरू से ही हमलावर रुख अपनाते हुए उन्होंने मैच पर पकड़ बनाए रखी और ओकुहारा को एक बार भी हावी नहीं होने दिया। सिंधू ने इस टूर्नामेंट के हर मैच में शीर्ष रैंक वाले प्रतिद्वंद्विंयों- बी वैन जैंग (अमेरिका), ताई जू यिंग (ताइवान) और चेन यू फी (चीन) को हरा कर अपना लोहा मनवाया।
सिंधू की कभी हार न मानने वाली सोच और कोर्ट पर कड़ी मेहनत से सामने वाले को चित करने की क्षमता ने ही उनको यह पदक दिलवाया। 2017 में ओकुहारा ने ही ग्लासगो में हुई विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के फाइनल में सिंधू को हराया था। इसी जीत के साथ सिंधू ने अब चीन की जेंग निंग की बराबरी कर ली है जिन्होंने छह बार खेल में भागीदारी कर पांच मैडल जीते थे। विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के इस रेकार्ड के साथ ही सिंधू के खाते में एक और बड़ी उपलब्धि यह दर्ज हो गई कि विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप के सारे पदक जीतने वाली वे चौथी एकल महिला खिलाड़ी बन गई हैं। हालांकि पूर्व में विश्व बैडमिंटन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक से चूक जाने की पीड़ा सिंधू को हमेशा रही और इसके लिए उन्हें आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा था। प्रेस कॉन्फ्रेंसों और इंटरव्यू में इसे लेकर उन पर सवाल भी दागे जाते रहे। पर रविवार को हम सबने सिंधू को उनके करिश्माई खेल से एक नए रूप में स्थापित होते देखा है। किसी खिलाड़ी के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है कि वह अपनी मां के जन्मदिन पर उन्हें स्वर्ण पदक जीतने का तोहफा दे! इसीलिए सिंधू के लिए रविवार का दिन बेहद खास रहा।
आखिर सिंधू ने ऐसा क्या नया किया कि हर बार की तरह वे फाइनल में डगमगाए बिना सफलतापूर्वक अपने दबाव को काबू में रख पाईं! काफी हद तक इसका श्रेय उनकी फिटनेस को जाता है। उनके भीतर की इसी ताकत ने उन्हें क्वार्टर फाइनल में कड़े मुकाबले का सामना करने और एक मुश्किल मैच को काबू में करने की हिम्मत दी। सिंधू ने अपने खेल में बदलाव करते हुए तौर तरीके बदले हैं और सुरक्षित खेलने की प्रवृत्ति से अलग हटते हुए मैच में शुरू से ही सामने वाले पर आक्रामक रुख अपनाने की शैली विकसित की है। इसके अलावा उन्होंने पिछली गलतियों से काफी कुछ सीखा भी है। इस बार सिंधू ने शुरू से ही अपनी नई रणनीति अपनाई थी और उनका जोर शटल को कोर्ट के पीछे तक पहुंचाने पर ही बना रहा। इस रणनीति ने काफी हद तक उन्हें स्वर्ण पदक तक पहुंचाने में मदद की। अर्जुन अवार्ड और पद्मश्री से सम्मानित सिंधू ने 2016 के रियो ओलंपिक में रजत पदक जीतने के बाद से अब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा है। 2017 के आखिर में उन्होंने अपनी अच्छी फॉर्म बरकरार रखते हुए इंडियन ओपन सुपर सीरीज भी अपने नाम की थी। सिंधु की यह उपलब्धि भारतीय बैडमिंटन के लिए एक नए युग की शुरुआत है।
-आशीष नेमा