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करंसी वॉर

चीन और अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध ने अब अघोषित मुद्रा युद्ध का रूप ले लिया है। चीन के सेंट्रल बैंक ने डॉलर के मुकाबले युआन की कीमत 7 के रेकॉर्ड स्तर तक गिर जाने दी। इससे दुनिया भर के मुद्रा बाजार में उथल-पुथल मच गई है। जाहिर है, चीन ने एकतरफा व्यापार युद्ध वाले अमेरिकी रवैये से तंग आकर मुद्रा को अपना हथियार बनाया है। साथ ही उसकी कंपनियों ने अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद भी रोक दी है। ये कदम चीन ने तब उठाए जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने व्यापार वार्ता की दिशा ही गलत बताते हुए चीन से आयातित 300 अरब डॉलर के उत्पादों पर दस फीसदी शुल्क लगाने की घोषणा की। ये दरें 1 सितंबर से लागू हो जाएंगी। चीन मुख्यत: एक निर्यातक देश है इसलिए युआन की कीमत गिरने का उस पर कम प्रभाव पड़ेगा लेकिन चीनी माल का आयात करने वाले तमाम मुल्क चीनी माल और भी सस्ता हो जाने से परेशानी में पड़ेंगे।
विगत दिनों चीन की मुद्रा युआन में करीब एक दशक की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई। अगस्त 2010 के बाद का यह सबसे निचला स्तर है। इस कदम से अमेरिका बौखला गया और उसने कहा कि व्यापार में अनुचित लाभ लेने के लिए चीन अपनी मुद्रा की कीमतों में हेराफेरी कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप पहले भी चीन पर अपने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए युआन का अवमूल्यन करने का आरोप लगाते रहे हैं जबकि चीन इन आरोपों को खारिज करता रहा है। अभी एक बात तो साफ है कि व्यापारिक टकराव में अपने हितों की हिफाजत के लिए चीन किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दुनिया की नंबर 1 और नंबर 2 अर्थव्यवस्थाओं के बीच जारी इस टकराव का असर संसार की हर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। युआन के रेकॉर्ड लो लेवल पर पहुंचने के बाद भारत सहित सभी विकासशील देशों की करंसी में गिरावट देखी गई।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था के लिए ये व्यापार युद्ध घातक साबित हो रहा है। नेशनल सिक्योरिटी कॉर्पोरेशन के चीन मार्केट स्ट्रैटेजिस्ट आर्ट होगन का कहना है कि ये पता लगाना नामुमकिन है कि ये (व्यापार युद्ध) कितना बुरा है। होगन ने कहा कि व्यापार युद्ध जितना खराब होता है, उतनी ही तेजी से अमेरिका में मंदी आ सकती है। कई निवेशक और व्यापारी मोटे तौर पर चीन को व्यापार पर निष्पक्ष रहने के लिए ट्रंप प्रशासन की इच्छा से सहमत हैं। बीजिंग के गैर-टैरिफ व्यापार बाधाओं, जबरन प्रौद्योगिकी हस्तांतरण सहित कई अन्य चीजों ने अमेरिकी व्यवसायों को लंबे समय तक चोट पहुंचाई है। हालांकि अब सभी की चिंता बढ़ती जा रही है। एक सितंबर से नए शुल्क लागू होने से इलेक्ट्रोनिक सामान से लेकर जूते-चप्पल तक सब प्रभावित होंगे। इसका प्रभाव अमेरिकी परिवारों पर पड़ेगा। चैंबर ऑफ कॉमर्स ने बीते हफ्ते चेतावनी दी थी कि ये नए शुल्क केवल अमेरिकी व्यवसायों, किसानों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं को अधिक से अधिक परेशान करेंगे और एक मजबूत अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कमजोर कर देंगे। वहीं चीन के अमेरिकी कृषि उत्पाद ना खरीदने के कदम से अमेरिकी किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ेगा।
दक्षिण कोरिया के वॉन, इंडोनेशिया के रुपिया और मलयेशिया के रिंगिट पर इसका सीधा असर देखने को मिला। भारत के लिए तो मामला दोहरी मार पडऩे जैसा है। एक तो वैसे ही यहां ग्रोथ की रफ्तार सुस्त है। इंडस्ट्री के जून तिमाही के नतीजे खराब रहे हैं। विदेशी निवेशक बजट के बाद से ही बाजार से पैसा निकालने में जुटे हैं लेकिन इस उथल-पुथल से बेखबर ट्रंप का अकेला अजेंडा चीन को सबक सिखाने का है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चीन के खिलाफ उठाए जा रहे अमेरिकी कदमों से अमेरिका के व्यवसायियों, श्रमिकों और उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ेगी और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ेगा लेकिन ट्रंप और उनके समर्थकों को लगता है कि थोड़ा नुकसान सहकर भी अगर चीन को कुछ जरूरी मामलों में पीछे हटने पर राजी किया जा सका तो आगे चलकर अमेरिका को इसका फायदा मिलेगा। खतरा यह है कि दोनों बड़ी ताकतों की यह लड़ाई आगे चलकर कहीं एक नई वैश्विक मंदी का सबब न बन जाए।
– अक्स ब्यूरो