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साहूकार के कर्ज से मुक्ति

आदिवासी बहुल मप्र में अभी तक अगर कोई सबसे उपेक्षित और शोषित है तो वे हैं आदिवासी। लेकिन लगता है अब इस वर्ग के दुख दूर होने का समय आ गया है। प्रदेश सरकार के प्रयासों को देखकर तो यही लगता है। दरअसल, सरकार ने आदिवासियों को साहूकारी कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए अध्यादेश लाने का निर्णय लिया है। यह एक ऐसा मसला है, जिसे लेकर विपक्ष सरकार की आलोचना नहीं कर पा रहा है। प्रदेश के आदिवासियों के लिए साहूकारी कर्ज एक बड़ी समस्या है। आकस्मिक जरूरत के समय वे साहूकारों के पास जाते हैं और फिर उस कर्ज से उबरना उनके लिए संभव नहीं हो पाता। यदि साहूकारी कर्ज से वास्तव में उन्हें मुक्ति मिल जाए, तो आजादी का एक छोटा अनुभव उनके जीवन के हिस्से में आ सकता है।
पूरे देश की तुलना में मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा आदिवासी रहते हैं। जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 8.6 फीसदी आबादी (लगभग 11 करोड़ लोग) आदिवासियों की है। देश के कुल आदिवासियों में 153.16 लाख यानी 14.7 फीसदी आदिवासी मध्यप्रदेश में रहते हैं। मध्यप्रदेश की कुल जनसंख्या में आदिवासियों की हिस्सेदारी 21.10 फीसदी हैं। जनगणना एवं अन्य कई सरकारी व गैर सरकारी रिपोट्र्स को देखा जाए, तो इन आदिवासी परिवारों की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति बहुत ही कमजोर है। विस्थापन, जंगलों से बेदखली, मजबूरी का पलायन, बेहतर शिक्षा व बेहतर स्वास्थ्य
सेवाओं तक पहुंच का अभाव, कुपोषण, कर्ज सहित कई समस्याओं से जूझते इन समुदायों के लिए जीवन पर संकट है। आदिवासियों के साथ भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया में अन्याय होता आया है। लेकिन संघर्षों एवं आंदोलनों की बदौलत सरकारों से कुछ अधिकार लेने में ये कामयाब रहे।
मुख्यमंत्री कमलनाथ का कहना है कि भविष्य में कोई साहूकार अनुसूचित क्षेत्र में यदि साहूकारी करेगा, तो उसे लाइसेंस लेकर नियमानुसार व्यापार करना होगा। सरकार के इस फैसले का जो मजबूत पक्ष है, वह यह है कि बैंकों द्वारा आदिवासियों को रूपए डेबिट कार्ड दिए जाएंगे और जिनके खाते नहीं है, उनके खाते खोले जाएंगे। इस काम में सरकार उनकी मदद करेगी। इस कार्ड का व्यापक महत्व होगा। जरूरत के वक्त इस कार्ड के जरिए आदिवासी बैंकों से 10 हजार रुपए तक की क्रेडिट निकासी कर सकेंगे, जिसे उन्हें बाद में लौटाना होगा। इसकी वजह से आकस्मिक जरूरत के समय आदिवासियों को साहूकार से कर्ज नहीं लेना पड़ेगा।
आदिवासियों को आगे कर्ज नहीं लेना पड़े, इसके लिए आदिवासी परिवार के यहां बच्चे के जन्म पर भोज के लिए राशन दुकान से 50 किलो चावल या गेहूं नि:शुल्क देने एवं आदिवासी परिवार में मृत्यु होने पर मृत्यु भोज के लिए 100 किलो चावल या गेहूं राशन दुकान से नि:शुल्क देने की योजना भी सरकार ने बनाई है। सामुदायिक भोज के लिए हर आदिवासी गांव में बर्तन खरीदने के लिए 25 हजार रुपए दिए जाएंगे। आदिवासी लोगों के कर्ज का सबसे बड़ा कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्या या किसी आयोजन में दिए जाने वाला भोज ही होता है। इसके लिए उन्हें साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता है, जिसके दुश्चक्र से निकलना उनके लिए संभव नहीं होता। ऐसे में सरकार का यह कदम उनके लिए बहुत राहत भरा हो सकता है। इस कानून और इसके नियमों को बनाने में सरकार को व्यापक नजरिया रखने की जरूरत होगी। यदि कोई आदिवासी गैर अनुसूचित क्षेत्र में रहता है, तो उसके कर्ज को भी इसके दायरे में लाने की जरूरत है, लेकिन अभी तक इस पर कोई निर्णय नहीं हुआ है। इसके साथ ही साहूकार आदिवासियों पर परोक्ष दबाव न बना पाए, इसके पुख्ता इंतजाम करने होंगे।
– धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया