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कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:

भागवत गीता का सार हमारे जीवन को एक पल में बदल सकता है। महाभारत काल में दिया गया गीता का उपदेश आज भी प्रासंगिक है। गीता का उपदेश समस्त जगत के लिए है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में बताया है कि कोई भी व्यक्ति कर्म नहीं छोड़ सकता। प्रकृति व्यक्ति को कर्म करने के लिए बाध्य करती है। जो व्यक्ति कर्म से बचना चाहता है वह ऊपर से तो कर्म छोड़ देता है पर मन ही मन उसमें डूबा रहता है। मनुष्य का स्वार्थ उसे नकारात्मकता की ओर धकेलता है। अगर इस जीवन में खुश रहना चाहते हैं तो स्वार्थ को कभी अपने पास आने मत दो। जो इंसान अपने नजरिए को सही प्रकार से इस्तेमाल नहीं करता है वह अंधकार में धंसता जाता है। मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है जैसा वो विश्वास करता है वैसा वह बन जाता है। जो मनुष्य मन को वश में कर लेता है, उसका मन ही उसका सबसे अच्छा मित्र बन जाता है। जो मनुष्य मन को वश में नहीं कर पाता है, उसके लिए वह मन ही उसका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।
योगस्थ: कुरु कर्माणि संग
त्यक्तवा धनंजय।
सिद्धय-सिद्धयो: समो भूत्वा
समत्वं योग उच्यते।।
यानी हे धनंजय (अर्जुन), कर्म न करने का आग्रह त्यागकर, यश-अपयश के विषय में समबुद्धि होकर योगयुक्त होकर, कर्म कर, (क्योंकि) समत्व को ही योग कहते हैं। मनुष्य के द्वारा किया गया हर कर्म भगवान के खाते में लिखता है जो जैसा कर्म करता है उसे वैसे ही फल की प्राप्ति होती है। मानव देह दुर्लभ है और दुर्लभ होने पर भी क्षण भंगुर है, इसीलिए मानव जीवन की सार्थकता तभी है जब हम भगवान के चरणों में आश्रय करें। जिंदगी की परीक्षा
पास करने के लिए भागवत गीता सबसे अच्छा ग्रंथ है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयत: शांतिरशांतस्य कृत: सुखम।।
यानी योगरहित पुरुष में निश्चय करने की बुद्धि नहीं होती और उसके मन में भावना भी नहीं होती। ऐसे भावनारहित पुरुष को शांति नहीं मिलती और जिसे शांति नहीं, उसे सुख कहां से मिलेगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में कई निर्णय लेने पड़ते हैं। ये निर्णय हमारे जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। सही निर्णय हमें सफलता की बुलंदियों तक पहुंचा सकते हैं। वहीं गलत निर्णय सफलता की ऊंचाइयों से हमें जमीन पर भी ला सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत गीता में निर्णय लेने कुछ नियम बताए हैं। जिन्हें अपनाकर हर कोई अपने जीवन में बेहतर निर्णय ले सकता है। श्रीमद्भगवत गीता एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो हर इंसान के जीवन को एक सही दिशा दे सकती है। तो आगे जानते हैं कि भगवत गीता की वो सात बातें कौन-कौन सी हैं, जिसे अपनाकर हम जीवन के हर मोड़ पर सही निर्णय ले सकते हैं।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत।
कार्यते ह्यश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:।।
यानी कोई भी मनुष्य क्षण भर भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता। सभी प्राणी प्रकृति के अधीन हैं और प्रकृति अपने अनुसार हर
प्राणी से कर्म करवाती है और उसके परिणाम भी देती है।
आमतौर पर यह देखा जाता है कि जो चीज हमें अच्छी अनुभूति देती हैं हम उसे ही पसंद करते हैं। गीता के अनुसार अर्जुन युद्ध नहीं लडऩा चाहते थे, क्योंकि उसे अपने गुरु और भाइयों को युद्ध खोने का डर था। परंतु श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध लडऩे का मार्ग दिखाया। इसलिए व्यक्ति को भावना में बहकर कोई भी निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्योंकि भावनाएं तात्कालिक होती हैं। श्रीमद्भगवत गीता के छठे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं कि हमें अपने मस्तिष्क को संतुलित करके चलना चाहिए। इसलिए कोई भी निर्णय तब नहीं लेना चाहिए जब हम बहुत ज्यादा खुश या दुखी हैं। ज्यादा खुश या दुखी की स्थिति में लिया गया निर्णय गलत ही साबित होगा।
जीवन में कोई भी निर्णय लेने से पहले खुद से पूछना चाहिए, कहीं ये निर्णय गुस्से में या किसी से अधिक लगाव के चलते तो नहीं ले रहे। क्योंकि ऐसी परिस्थिति में लिए गए निर्णय आगे पछतावा दिला सकते हैं। भगवत में एक शब्द बार-बार दोहराया गया है, जो है निष्काम कर्म। इसका मतलब होता है बिना फल की इच्छा किए कर्म करते रहना। इसलिए हमें कोई भी निर्णय लेने से पहले फल का लालच नहीं करना चाहिए।
भगवत गीता में कहा गया है कि मनुष्य को जो भी काम करना है उस पर पूरा भरोसा करना चाहिए। वरना सफलता कभी नहीं मिलती है। कोई भी निर्णय लेने या काम करने से पहले उस पर पूरा विश्वास कर लेना चाहिए। अगर मन में किसी भी तरह की कोई शंका हो तो इस काम को न करें। अपने निर्णय के बारे में दोबारा सोचें। जो भी चीज समाज या बड़े समूह के लिए अच्छी न हो वो चीजें आपके लिए भी कभी फायदेमंद नहीं हो सकती। इसलिए कभी ऐसा कोई निर्णय न लें। गीता में साफ तौर पर कहा गया है कि जो भी व्यक्ति परमात्मा में विश्वास रखता है, उनका स्मरण करता है, वह हमेशा सही निर्णय लेता है। साथ ही उसकी हार कभी नहीं होती है।
-ओम