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आशियाना बचाने की लड़ाई

मुख्यधारा से कटी भारत के वनों पर आश्रित एक बड़ी आबादी को देश के सर्वोच्च न्यायालय में अपना आशियाना बचाने की लड़ाई लडऩी पड़ रही है। हाल में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी (वनाधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 (वनाधिकार कानून) की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने वनों पर आश्रित आदिवासी समुदायों को अतिक्रमणकारी घोषित करते हुए वन-भूमि से बेदखल करने का फैसला सुनाया था। इसके तहत इक्कीस राज्यों के मुख्य सचिवों को उन सभी मामलों में जिनके भूमि-स्वामित्व के दावे खारिज कर दिए गए हैं, वन-भूमि से बेदखल करने और देहरादून स्थित भारतीय वन सर्वे को हटाए गए कब्जाधारियों से संबंधित उपग्रह-छवि आधारित रिपोर्ट पेश करने को कहा गया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे मामलों में जहां सत्यापन, पुनर्सत्यापन या पुनर्विचार की प्रक्रिया लंबित है वहां राज्यों को प्रक्रिया पूरी कर एक रिपोर्ट पेश करने को भी कहा था। फिर एक अन्य याचिका दायर होने पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पहले के आदेश पर रोक लगाते हुए केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों को फटकार लगाई और कहा कि उन्होंने अभी तक आदिवासियों की इस समस्या को क्यों नहीं सुलझाया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंतरिम राहत दिए जाने के बाद भी आदिवासियों की चिंता बरकरार है क्योंकि सही कानून की गैर-मौजूदगी में यह राहत स्थायी नहीं है और उनका आशियाना उजडऩे का खतरा बना हुआ है। आदिवासियों के दावों की ज्यादातर अस्वीकृतियां ग्रामसभा स्तर पर ही की गई हैं।
वनाधिकार कानून के तहत इसके बाद दावे उपखंड स्तरीय समिति और फिर जिला स्तरीय समिति में जाते हैं। दावा इन तीनों में से किसी भी स्तर पर खारिज हो सकता है। दावे के किसी भी स्तर पर खारिज होने के बाद अगले स्तर पर अपील की जा सकती है। दावे के जिला स्तरीय समिति में खारिज होने के बाद फैसले को न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन ज्यादातर मामले न्यायालय तक नहीं पहुंचते क्योंकि एक तो आदिवासियों में अशिक्षा के कारण जागरूकता की कमी है और दूसरे इन लोगों की आर्थिक स्थिति भी ठीक नहीं है। दावों की ज्यादातर अस्वीकृतियां सबूतों की कमी के कारण होती हैं जिन्हें आदिवासी जुटा नहीं पाते। इस तरह से व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकार के दावे सही छानबीन के बगैर ही खारिज कर दिए जाते हैं।
ज्यादातर यह देखने में आया है कि पर्यावरण व वन्य संरक्षण के नाम पर वनों पर आश्रित आदिवासी और गैर-आदिवासी गरीब लोगों को ऐसी वन-भूमि से बेदखल कर दिया जाता है जिस पर वे सदियों से रहते आए हैं। ऐसा करना निश्चित रूप से वनाधिकार कानून के प्रावधानों के खिलाफ है जिससे इनके अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। वास्तविकता तो यह है कि आदिवासी पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं और कभी भी जरूरत से ज्यादा प्रकृति या प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं करते।
संसद में 18 दिसंबर, 2006 को अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 सर्वसम्मति से पारित किया गया था। एक साल बाद 31 दिसंबर, 2007 को इसे लागू करने की अधिसूचना जारी की गई। इससे पहले भारत में वनों के संबंध में साल 1876 से साल 1927 के बीच पारित किए गए भारतीय वन कानूनों के प्रावधानों को ही लागू किया जाता था। एक लंबे वक्त तक साल 1927 का वन कानून ही भारत का वन कानून रहा। हालांकि ऐसे किसी भी कानून का पर्यावरण और वन संरक्षण से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन फिर भी पर्यावरण और वन संरक्षण के नाम पर जहां-तहां इसका बेजा इस्तेमाल किया जाता रहा। भारत सरकार की टाइगर टास्क फोर्स ने भी यह माना है कि वन संरक्षण के नाम पर अवैध और असंवैधानिक रूप से भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है। ऐसे में निश्चित रूप से वर्ष 2006 में पारित वनाधिकार कानून की जरूरत और उपयोगिता समझी जा सकती है। आदिवासियों की सबसे ज्यादा संख्या मध्यप्रदेश में है जहां इक्कीस फीसदी आदिवासी हैं। संथाल देश की सबसे बड़ी जनजाति है। मध्यप्रदेश में विधानसभा की कुल दो सौ तीस सीटों में से सैंतालीस सीटें जनजातीय श्रेणी के लिए आरक्षित हैं जिनमें तकरीबन आधा हिस्सा पश्चिमी जिलों मालवा और निमाड़ का है।
– धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया