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कांग्रेस का भविष्य

देश की सबसे पुरानी पार्टी, कांग्रेस के शीर्ष पद से राहुल गांधी का इस्तीफा एक अध्याय की समाप्ति है। उनकी मां सोनिया गांधी 1998 में सीताराम केसरी की जगह पार्टी अध्यक्ष बनी थीं। वे 19 साल तक इस पद पर रहीं। सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने दो आम चुनाव जीते, लेकिन 2014 की हार के बाद यह स्पष्ट हो गया कि लंबे समय से जारी पार्टी के कमजोर होने का सिलसिला रुका नहीं है। सवाल सिर्फ यह नहीं कि गलती कहां हुई, यह भी है कि आगे क्या होगा। पिछले दो चुनावों में हर पांच में से एक (20 फीसदी) वोटर ने कांग्रेस का साथ दिया। 2014 के चुनाव में पार्टी को 44 सीटें मिली थीं, इस बार 52 सीटें मिली हैं।
भौगोलिक रूप से कांग्रेस का सिकुडऩा लंबे समय से जारी है। तमिलनाडु में कांग्रेस ने आखिरी बार 1962 में विधानसभा चुनाव जीता था। 1972 में पश्चिम बंगाल में भी उसे आखिरी बार जीत मिली थी। उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात में 1985 में आखिरी बार कांग्रेस सरकार बनी थी। महाराष्ट्र में अपने दम पर उसकी सरकार 1990 में बनी थी।
1960 के दशक के अंत में गैर-कांग्रेस मोर्चे का उभरना पार्टी के लिए बुरा साबित हुआ। खासकर जनसंघ और समाजवादियों के साथ आने से। लेकिन 1971-72 तक इंदिरा गांधी ने उनकी जमीन कमजोर कर दी। उनके ‘गरीबी हटाओÓ नारे ने वोटरों को काफी आकर्षित किया। प्रिवीपर्स खत्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे कदमों से लोगों को उनके ‘रोटी, कपड़ा और मकानÓ नारे पर भरोसा होने लगा। बांग्लादेश युद्ध में पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाली इंदिरा गांधी को अटल बिहारी वाजपेयी ने ‘दुर्गाÓ कहा था। 1977 में बुरी तरह हार के बावजूद कांग्रेस जल्दी ही सत्ता में लौट आई। इस बार उसे ऐसी जीत मिली मानो गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों पर उसकी पकड़ कभी ढीली पड़ी ही नहीं थी।
1984 में सिख विरोधी दंगे के बाद तो कहा जा रहा था कि सिर्फ कांग्रेस ही भारत को एकजुट रख सकती है। लेकिन अयोध्या और शाहबानो जैसे समुदाय विशेष के मुद्दों के उभरने और सांप्रदायिक फिजा बढऩे के बाद तो कांग्रेस अपने विरोधियों के हिसाब से चलने लगी। शायद यही वजह है कि 1984 के बाद कांग्रेस को कभी बहुमत नहीं मिला। 1991-96 के दौरान आर्थिक और विदेश नीति के मोर्चे पर बड़े बदलाव हुए, लेकिन उत्तर भारत में पार्टी की लोकप्रियता तेजी से घटी। उत्तर प्रदेश में इसने दलित नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी की सहयोगी के रूप में कुल 400 से अधिक सीटों में से 100 से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ा। 2004 में इसके नेतृत्व में गठबंधन की सरकार बनी तो एक बात साफ थी कि कांग्रेस को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए लंबा सफर तय करना होगा।
2009 में गठबंधन की सरकार दोबारा बनी, लेकिन कांग्रेस को भाजपा विरोधी पार्टियों को अपने साथ जोडऩे में लगातार जद्दोजहद करनी पड़ी। जब तक अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी थी, लोगों को नौकरियां मिल रही थीं और किसानों को फसल के अच्छे दाम मिल रहे थे, तब तक यह रणनीति काम आई। लेकिन विकास दर धीमी होने के साथ कांग्रेस की स्थिति भी कमजोर होने लगी। 2012 में प्रियंका गांधी तीन हफ्ते तक अमेठी और रायबरेली में रहीं। इसके बावजूद इन दोनों संसदीय क्षेत्रों की 10 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस सिर्फ दो जीतने में कामयाब रही।
कांग्रेस को 1967 तक आजादी के संघर्ष का फायदा मिला। कस्बों-छोटे शहरों से लेकर जंगल और खेत तक इसके कार्यकर्ता और नेता सामाजिक कार्य और राजनीतिक संघर्ष करते नजर आते थे। पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने अपनी किताब द इनसाइडर में इन बातों का जिक्र किया है। आज इन्हीं बातों का अभाव दिखता है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के ज्यादातर सदस्य ऐसे हैं जो लोकसभा चुनाव नहीं जीत सकते। डॉ. मनमोहन सिंह 10 साल तक प्रधानमंत्री रहे, लेकिन वे राज्यसभा सदस्य थे। किसान, आदिवासी, दलित या ओबीसी वर्ग से पार्टी के पास राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता नहीं है। जिस पार्टी के पास 1980 के दशक तक हर स्तर पर बड़े नेताओं की भरमार थी, आज उसके पास इस कद का कोई नेता नहीं है।
इंदिरा गांधी ने 1969-71 के दौरान क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ लड़ा था। इन नेताओं का गुट सिंडिकेट कहलाता था। 1976 में गुवाहाटी में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक हुई। उस बैठक में इंदिरा ने अपने बेटे संजय गांधी की परोक्ष रूप से तारीफ की थी। दुर्घटना में संजय की मौत हो जाने के बाद उनके बड़े भाई राजीव गांधी पहले सांसद, फिर पार्टी महासचिव और अंतत: पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गांधी की तरह परिवार की बाद की पीढिय़ों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया था। उन्हें विशेषाधिकार विरासत में मिला था। 1980 के दशक में वैसे तो पार्टी काफी मजबूत स्थिति में थी, लेकिन जमीनी स्तर पर वह धीरे-धीरे कमजोर हो रही थी।
1985 में मुंबई में कांग्रेस के शताब्दी वर्ष समारोह में राजीव गांधी ने काफी सख्त भाषण दिया। उन्होंने सत्ता के दलालों पर सीधा हमला किया। लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं बदला। मंदिर आंदोलन उन पर भारी साबित हुआ और मंडल आंदोलन को भी वे नियंत्रित नहीं कर सके। उनके बाद पार्टी प्रमुख बने नरसिंह राव और सोनिया गांधी की कोशिश क्षेत्रीय दलों और मंडल-दलित समूहों को साथ लेने की रही। जब तक यूपीए सफल थी, हिंदुत्व की उभरती चुनौती से निपटने में उसकी नाकामी छिपी हुई थी। वाजपेयी थोड़े संकोची थे, लेकिन नरेंद्र मोदी की चुनौती सीधी थी। उन्होंने सत्तारूढ़ गठबंधन के घोटालों और पॉलिसी पैरालिसिस को लेकर हमला बोल दिया। कांग्रेस इस बात को समझने में नाकाम रही कि इंदिरा सिर्फ अपने उपनाम की वजह से मजबूत नहीं थीं, बल्कि उनका रिकॉर्ड एक राष्ट्रवादी और जुझारू नेता का था। आखिरी दिनों में वे 1977 की तरह अजेय तो नहीं थीं, लेकिन जैसा 1984 में दिखा, उन्हें खत्म नहीं किया जा सकता था। अपनी मौत के बाद भी उन्होंने देश को पार्टी के साथ खड़ा कर दिया था।
द्य दिल्ली से रेणु आगाल