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गठबंधन टिकेगा या टूटेगा

सिर मुंडाते ही ओले पड़े-कुछ ऐसा ही हुआ है। जबरदस्त बहुमत पाने वाली मोदी सरकार के साथ। जिस दिन मोदी मंत्रिमंडल ने शपथ ली, उसी दिन बिहार की उसकी सहयोगी पार्टी जनता दल ने फैसला किया कि वह केंद्र सरकार में शामिल नहीं होगी। उत्तर प्रदेश का अपना दल भी शामिल नहीं हुआ। उसके बाद राजग की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना ने फिर पुराना विवाद उछाल दिया कि विधानसभा चुनावों के बाद महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री किसका होगा शिवसेना या भाजपा का। मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना और बीजेपी में लंबे समय से मनमुटाव है। राज्य में इसी साल अक्टूबर में विधानसभा चुनाव होने वाले है। दोनों पार्टियां यहां अपना-अपना मुख्यमंत्री चाहती हैं। शिवसेना ढाई साल का फॉर्मूला चाहती है, वहीं अमित शाह महाराष्ट्र में बीजेपी का मुख्यमंत्री चाहते हैं।
फरवरी में लोकसभा चुनाव से पहले हुए समझौते के बाद सबकुछ ठीक ठाक चल रहा था था। दरअसल भाजपा और शिवसेना दोनों ही हिन्दुत्ववादी पार्टियां है। इसलिए वे एक-दूसरे को वैचारिक साथी मानते हैं। मगर पिछले काफी समय से उनमें भारी मनमुटाव चल रहा है। इस कारण शिवसेना केंद्र और राज्य में सत्ता में भागीदार रहने के बावजूद भाजपा का विपक्षी पार्टियों से ज्यादा विरोध करती रही। यहां तक कि उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को नहीं बख्शा। उसने यह भी फैसला किया था कि वह आगे के चुनाव अपने बल पर लड़ेगी। भाजपा के काफी मानमनौव्वल के बाद वह तैयार हुई।
इसका नतीजा भी अच्छा हुआ। भाजपा शिवसेना के केसरिया गठबंधन को राज्य में जबरदस्त सफलता मिली। उसे राज्य की 48 लोकसभा सीटों में से 41 पर विजय मिली। इनमें से 23 पर भाजपा और 18 पर शिवसेना जीती। इसके बाद से शिवसेना के सुर बदले हुए है। हर मुद्दे पर भाजपा नेताओं का विरोध करने वाली शिवसेना अब तारीफ भी करने लगी है। इसका यह मतलब नहीं है कि शिवसेना की शिकायतें खत्म हो गई हैं। वह शिवसेना को केंद्र सरकार में भारी उद्योग मंत्रालय दिए जाने से नाराज है। उसका मानना है कि इस मंत्रालय में करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है। वह कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय चाहती है। इसके अलावा कुछ और मंत्री पद चाहती है। शिवसेना की एक मांग यह भी थी उसे लोकसभा का उपसभापति का पद दिया जाए। जबकि भाजपा यह पद वायएसआर कांग्रेस को देना चाहती है।
शिवसेना को केंद्र सरकार में ज्यादा मंत्री और महत्वपूर्ण मंत्रालय चाहिए। मगर शिवसेना की मुख्य शिकायत राज्य को लेकर है। वही मनमुटाव का सबसे बड़ा मुद्दा है और भाजपा के एक मंत्री के बयान के बाद ऐन विधानसभा चुनाव से पहले वह मुद्दा उभर कर आया है। यह बता दे कि महाराष्ट्र में अक्टूबर में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे समय मंत्री ने बर्र के छत्ते में हाथ डाल दिया। हाल ही में महाराष्ट्र के वित्त मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधीर मुंगंटीवार ने दावा किया है कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री उनकी पार्टी का होगा। उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा और गठबंधन सहयोगी शिवसेना इस साल के अंत में होने वाले राज्य विधानसभा चुनाव के लिए जल्द ही सीटों के बंटवारे के लिये एक समझौते पर पहुंचेगी। मुंगंटीवार ने कहा, ‘अगला मुख्यमंत्री भाजपा से होगा। इसे लेकर भाजपा-शिवसेना गठबंधन में कोई असंतोष नहीं है। इस बार हम 288 सदस्यीय विधानसभा में 220 से अधिक सीटें जीतेंगे।Ó उन्होंने कहा कि भाजपा और शिवसेना के नेता राज्य विधानसभा चुनाव के लिए सीटों के बंटवारे के लिए एक समझौते पर काम कर रहे हैं। ‘सीटों के बंटवारे को लेकर अंतिम निर्णय जल्द लिया जाएगा। हम अपने गठबंधन की जीत सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे।Ó
इस बयान के बाद पुराना विवाद फिर उभर आया है। शिवसेना में इस बयान पर तीखी प्रतिक्रिया हुई है मगर उसने सार्वजनिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। क्योंकि अब तक वह मान रही थी कि विवाद सुलझ चुका है। शिवसेना के नेता फरवरी में दोनों दलों के बीच गठबंधन की घोषणा करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की उपस्थिति में राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने घोषणा की थी कि विधानसभा चुनाव के बाद हम सत्ता और पदों में समान भागीदारी करेंगे। इसका मतलब शिवसेना ने यह लगाया कि दोनों दलों के बीच मुख्यमंत्री का भी बंटवारा होगा। ढाई साल शिवसेना और ढाई साल भाजपा का मुख्यमंत्री रहेगा। मगर भाजपा मंत्री के बयान ने शिवसेना की उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
-बिन्दु माथुर