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सूखे की मार!

मानसूनी सीजन का पहला महीना बीत चुका है, लेकिन अभी भी देशभर में बारिश सामान्य से 34 फीसदी कम हुई है जिस कारण देश के 29 राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेशों के किसान प्रभावित हुए हैं। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार जून में केवल 6 राज्यों में ही सामान्य बारिश दर्ज की गई है जबकि इस दौरान केवल एक राज्य में सामान्य से ज्यादा बारिश हुई है। इसका असर खरीफ की बुवाई से लेकर सिंचाई, पेयजल आदि पर भी पड़ा है। कम बारिश होने के कारण देशभर में सूखे के हालात निर्मित हो रहे हैं। मौसम विभाग के अनुसार पहली जून से 30 जून तक देशभर में सामान्यत: 159 फीसदी बारिश होती है लेकिन चालू खरीफ में इस दौरान केवल 104.3 फीसदी बारिश ही हुई है। इस कारण खरीफ की बुवाई तो पिछड़ी ही हैं, नदी, तालाब, बांध, नहरें और खेत सूखे पड़े हैं। इस कारण देश के कई राज्यों में जलसंकट के हालात बने हुए हैं।
कमजोर मानसून के कारण इस साल देश में खरीफ फसलों की बुवाई में सुस्ती छाई है और इसका रकबा सामान्य के मुकाबले 25.45 प्रतिशत कम रहा है। कृषि मंत्रालय से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा खरीफ मौसम में 30 जून तक देश में कुल 146.61 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी है। सामान्यतया इस समय तक 196.66 लाख हेक्टेयर में बुवाई होती थी। इस प्रकार इसमें 25.45 प्रतिशत की कमी रही है। पिछले साल के मुकाबले यह आंकड़ा 9.54 प्रतिशत कम है। पिछले साल इसी अवधि तक 162.07 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुवाई हुई थी।
लक्ष्य 132 लाख हेक्टेयर का
बात मप्र की करें तो यहां मानसून की केमिस्ट्री ने किसानों का गणित बिगाड़ दिया है। इस साल कृषि विभाग ने मप्र में खरीफ की खेती का लक्ष्य 132 लाख हेक्टेयर रखा है। वहीं पीले सोने के लिए मशहूर मप्र में सोयाबीन का रकबा 46 लाख हेक्टेयर रहेगा। बाकी रकबा अन्य उपज का है। लेकिन इस बार कमजोर मानसून के हालात देखकर ऐसा नहीं लगता है कि इतनी बुवाई हो सकेगी। सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सोपा) के चेयरमैन दाविश जैन कहते हैं कि खरीफ की फसल बारिश पर आश्रित है। जो इस वर्ष आधा अषाढ़ बीतने को है फिर भी खेतों को अब तक की बारिश भिगा नहीं पाई है। खरीफ सीजन के लिए खेत तो तैयार हो गए हैं लेकिन बारिश नहीं होने के कारण किसान सोयाबीन की फसल की बुवाई नहीं कर पा रहे हैं। वह कहते हैं कि सोयाबीन मप्र की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार है। लेकिन मौसम आधारित यह खेती दिन पर दिन कम होती जा रही है।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, मप्र में मानसून लेट हो गया है। इससे सोयाबीन के उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पडऩे की आशंका व्यक्त की जाने लगी है। प्रदेश में भीषण गर्मी से जलस्त्रोत सूख चुके हैं। तेज गर्मी से खेतों की नमी में कमी हो गई है। जोरदार वर्षा के बाद ही सोयाबीन की बोवनी संभव हो सकेगी। बोवनी में देरी होने से सोयाबीन की फसल को कम दिन मिलेंगे। इससे उत्पादन पर असर पड़ेगा ही। आगामी मानसून की भविष्यवाणी को देखते हुए कम समय में उत्पादन होने वाले बीज का उपयोग करना पड़ेगा। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार प्रदेश में सोयाबीन ही नहीं अन्य खरीफ फसलों की बुवाई भी पिछड़ रही है। इनमें धान की खेती सबसे अधिक प्रभावित है। प्रदेश में 45 फीसदी रोपा के लिए किसान नर्सरी लगा चुके हैं। जबकि कुल रकबे का 83 फीसदी धान रोपाई के माध्यम से लगाया जाता है। लेकिन मानसून में हुई देरी से खरीफ सीजन की फसल पर संकट गहराता जा रहा है।
छह साल से पिछड़ रहा मानसून
मौसम विभाग के अनुसार मानसून पिछले छह साल से पिछड़ रहा हैै। मप्र में मानसून का आगमन 15 जून तक होता है। साल 2014 से ही लगातार मानसून में देरी होती चली जा रही है, जिसमें 2014 में 19 जून को मानसून ने दस्तक दी थी। इसके अलावा 2015 में 18 जून, 2016 में 17 जून, 2017 में 21 जून, 2018 में 18 जून और 2017 में 22 जून तक मानसून पहुंचा था। इससे पहले 2013 में 9 जून को मानसून आ गई था। फसलों के लिए किसान समय पर खेतों को बोवाई के लिए तैयार कर लेते हैं, लेकिन मानसून की देरी से बोवनी पिछड़ गई है। कृषि विभाग के अनुसार धान की बोवाई 15 जून से 20 जुलाई तक हो जानी चाहिए। ऐसे में किसान हल्की बारिश में धान की बोवनी शुरू कर देते हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश नहीं होने से पैदावार उम्मीद के मुताबिक नहीं हो पाती। दाना कमजोर रहने से वजन ठीक नहीं होता। मानसून में देरी होने से अधिकतर किसानों को बोरवेल के सहारे बोवनी करनी पड़ती है।
400 जिलों में खेती संकट
राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (एनआरएए) के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) अशोक दलवाई के अनुसार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीआर) की एक रिपार्ट आई थी, जिसमें खेती संकट की बात कही गई है। खेती संकट देश के करीब 400 जिलों में अलग-अलग है। कहीं कम है तो कहीं ज्यादा है। उन्होंने कहा कि देश में 140.1 मिलियन हेक्टेयर में खेती होती है, उसमें 52 फीसदी क्षेत्रफल असिंचित है तथा केवल 48 फीसदी ही सिंचित क्षेत्रफल है। सिंचित क्षेत्र में प्रति हैक्टेयर उत्पादकता औसतन 2.8 टन प्रति हेक्टेयर होती है जबकि असिंचित क्षेत्रफल में औसत उत्पादकता प्रति हेक्टेयर 1.1 टन हेक्टेयर की है। अत: जो अंतर है दोनों में वह 1.7 टन प्रति हेक्टेयर का है।
कृषि मंत्रालय के तीसरे आरंभिक अनुमान के अनुसार फसल सीजन 2018-19 में खाद्यान्ना उत्पादन घटकर 28.33 करोड़ टन ही होने का अनुमान है जबकि इसके पिछले साल 28.50 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ था। इस दौरान गेहूं और चावल का तो रिकार्ड उत्पादन होने का अनुमान है लेकिन दलहन और तिलहन के उत्पादन में कमी आने की आशंका है। दलहन और तिलहन का उत्पादन कम होने से आयात पर निर्भरता बढ़ेगी।
लोग पलायन करने को मजबूर
स्वाभिमान शेतकारी संगठन के नेता और पूर्व लोकसभा सदस्य राजू शेट्टी ने बताया कि महाराष्ट्र में 1972 से अब तक का सबसे भीषण सूखा पड़ा है। पानी की ऐसी कमी है कि गांवों की महिलाओं को कई-कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। राज्य की 358 तहसीलों में से 151 तहसील सूखा प्रभावित घोषित हुई हैं। राज्य के 13 हजार से ज्यादा गांव-बस्तियों में पानी का संकट है, पशुओं को चारा नहीं मिल रहा है। सूखा प्रभावित इलाकों से लोग पलायन करने को मजबूर हैं। मराठवाड़ा और विदर्भ में हालात ज्यादा खराब है, तथा राज्य के इन क्षेत्रों में हर साल सूखे के कारण हजारों किसान आत्महत्या जैसा कदम उठाते हैं। आईआईटी, गांधीनगर द्वारा चलाए जा रहे सूखा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के अनुसार देश के 40 फीसदी से अधिक क्षेत्र में सूखे का सामना करना पड़ सकता है। इसमें से लगभग आधे क्षेत्र गंभीर से असाधारण सूखे की स्थिति का सामना कर रहे हंै। केंद्र सरकार ने पत्र लिखकर महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु को सलाह दी है कि वो समझदारी से पानी का इस्तेमाल करें। चालू मानसूनी सीजन में मानसून का आगमन ही 8 दिन की देरी से हुआ है। साथ ही कई राज्यों में प्री-मानसून की बारिश भी सामान्य से काफी कम हुई है। वायु चक्रवात ने भी मानसून की चाल को रोक दिया है इसलिए जल्द ही इस संकट से राहत मिलने की उम्मीद भी न के बराबर है।
40 फीसदी आबादी पर संकट
देश के लगभग हर भाग में लगातार बढ़ते जा रहे जल संकट से निपटने के लिए जल स्रोतों और जलाशयों, भूजल तथा सिंचाई संसाधनों का विवेकपूर्ण और उचित उपयोग सीखना होगा। बीते दशक में जनसंख्या वृद्धि, आर्थिक गतिविधियों और उपभोग की बदलती आदतों से वैश्विक स्तर पर जल की खपत हर साल एक फीसदी की दर से बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन और औसत तापमान में बढ़ोतरी की वजह से भी कई क्षेत्रों में सूखापन बढ़ रहा है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, अगले एक वर्ष में जलसंकट की इस समस्या से 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे, वहीं 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी इस गंभीर समस्या की चपेट में होगी। इस आसन्न संकट से निपटने के लिए ठोस पहल की जरुरत है।
पेयजल के मामले में मप्र बेहतर
पेयजल के मामले में मप्र की स्थिति में सुधार हुआ है। भले ही पूरे देश में पानी के लिए हाहाकार मचा है मगर नीति आयोग ने मप्र को ओवरआल परफारमेंस में देश में दूसरे नंबर पर रखा है। हालांकि सालाना सुधार के मामले में प्रदेश पांचवे नंबर पर है। इस सूची में सबसे पीछे हरियाणा है तो सबसे ऊपर गुजरात। नीति आयोग की यह रिपोर्ट वर्ष 2015-16 और 2016-17 के तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित है। ओवरआल रैकिंग में मप्र को 2015-16 में 63.54 प्रतिशत और तीसरा स्थान मिला था। वर्ष 2016-17 में 68.57 फीसदी के साथ दूसरा स्थान हासिल हुआ था। सबसे खराब स्थिति हरियाणा की रही 2015-16 में 30.06 फीसदी के साथ और 2016-17 में भी 37.76 फीसदी के साथ 16वें स्थान पर रहा।
इंक्रीमेंटल परफारमेंस यानी सुधार के
लिहाज से मप्र इन दो सालों में प्रगति के लिहाज से 5.13 फीसदी के साथ पांचवे नंबर पर रहा है। इस श्रेणी में 8.35 फीसदी के साथ राजस्थान पहले जबकि 5.19 प्रतिशत के साथ गुजरात चौथे पायदान पर रहा। प्रदेश के 34 फीसदी इलाकों के पानी में खारेपन, भारीपन और फ्लोराइड, नाइट्रेट, लैड जैसे घातक तत्वों की मौजूदगी से समस्याएं हैं।