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गढ़बो नवा छत्तीसगढ़

ग्रामीण अर्थव्यवस्था एक प्रकार से धराशायी हो चुकी है। आजीविका की तलाश में लोग न चाहते हुए भी शहरों की ओर पलायन कर रहें हैं लेकिन बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी ने आम लोगों का जीवन वहां भी नारकीय बना दिया है। भारत की शहरी अर्थव्यवस्था एवं कानून, अराजकता की चपेट में हैं। एक बार फिर से गांधीयन अर्थव्यवस्था की आवश्यकता महसूस होने लगी है। महात्मा गांधी ने कई बार विकास के संदर्भ में कहा था कि- अगर गांव पिसेगा तो भारत भी पिसेगा और भारत वो भारत नहीं रह पाएगा जैसा भारत हम चाहते हैं। हमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करनी होगी।
इस संबंध में पहल करते हुए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार ने छत्तीसगढ़ में – नरवा, गरवा, घुरवा अउ बाड़ी के नाम की योजना की शुरूआत की। प्रदेश में हो रहे इस प्रयोग की चर्चा मुख्यमंत्री बघेल ने नीति आयोग की हालिया बैठक में भी की थी और जल्द ही इस मॉडल का प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर करने की बात कही। छत्तीसगढ़ में हो रहे इस प्रयोग की सराहना अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों के अलावा स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की।
ज्यादा से ज्यादा लोगों की इस योजना में भागीदारी हो इसके लिए मुख्यमंत्री विशेष तौर पर इस योजना की मॉनिटरिंग कर रहें हैं, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के सबसे तेज तर्रार एडिशनल चीफ सेक्रेटरी आईएएस आर.पी. मंडल को कमान सौंपी गई है। वर्तमान में प्रथम चरण में – यह योजना राज्य के 15 प्रतिशत (1665) ग्राम पंचायतों में लागू की जा रही है तथा संचालन की जिम्मेदारी ग्राम समितियों को सौंपी गयी है। राज्य बनने के बाद से अब तक 18 से अधिक वर्ष बीत गए। प्रदेश सर्वाधिक तेजी से विकसित होने वाले राज्यों की सूचि में शामिल रहा लेकिन इसके बावजूद यहां के मूल निवासी एवं रहवासियों को विकास का वो लाभ नहीं मिल सका जिसके वे हकदार थे। गिरता हुआ भू-जल स्तर, खेती में लागत की बढ़ोत्तरी, मवेशी के लिए चारा संकट, महंगाई आदि ने स्थिति को और भयावह बना दिया।
कांग्रेस प्रवक्ता धनंजय सिंह कहते हैं कि भाजपा सरकार को पता था कि छत्तीसगढ़ की 85 प्रतिशत आबादी गांव में रहती है, उसके बावजूद सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं कृषि को अनदेखा किया। पिछले 15 वर्षों में विकास उन्हीं क्षेत्रों में किया गया जहां ज्यादा कमीशन मिलता था जैसे कि अधोसंरचना (भवन, फ्लाईओवर, सड़कों का जाल बिछाना) निर्माण, खनन क्षेत्र विस्तार आदि। इससे गैरबराबरी के विकास से समाज में असंतुलन पैदा हुआ, खेती चौपट हुई और अधिकांश लोग किसान से खेतीहर मजदूर बन गए और कर्ज में दबे कई किसानों को आत्महत्या तक करनी पड़ी। छत्तीसगढिय़ों की अधिकांश बस्तियां, मजदूरों की कॉलोनी तक में सीमित रही। ऐसे में आम छत्तीसगढिय़ा का विकास के नाम पर ठगा सा महशूस होना लाजमी है।
जनगणना 2011 के आंकड़े बताते है कि रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले लोगों में 56 फीसदी लोग गांवों से आते हैं। प्रदेश में कांग्रेस इस स्थिति के लिए पूर्व सरकार के अव्यवहारिक एवं अदूरदर्शी नीतियों को जिम्मेदार ठहराती है। अत: ऐसे में जरूरत थी एक ऐसी योजना एवं नीति की जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फिर से मजबूती प्रदान करें। नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी योजना के नोडल अधिकारी बताते हैं कि रायपुर में इस योजना के तहत 21 ग्राम पंचायत में मॉडल गौठान तथा 97 गांवों में गौठानों का निर्माण किया गया है। गौठान में चरवाहों को नियुक्ति के साथ-साथ महिला स्वयं सहायता समूहों को भी जोड़ा गया है। वर्मी कंपोस्ट का उत्पादन करने के लिए उन्हें वर्मी किट प्रदान किए गए हैं। वर्मी कम्पोस्ट पहले किसानों को प्राथमिकता से दिया जाएगा, उसके बाद वन विभाग, तथा कृषि विभाग को सेरिकल्चर, फ्लोरिकल्चर जैसी गतिविधियों को चलाने के लिए बेचने की योजना है। इस पूरी योजना से एक गांव में 10-15 परिवारों को आसानी से काम मिल जाएगा। पेड़ लगाने एवं संरक्षित रखने पर एक निश्चित रकम का भुगतान किया जाता है, इससे भी रोजगार मिलेगा। चूंकि यह योजना पूरे प्रदेश भर में लागू है अत: जिले के कलेक्टरों को विशेष निर्देश है कि योजना की सफलता सुनिश्चित करें तथा यथोचित सहयोग प्रदान करें।
-रायपुर से टीपी सिंह