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सूखा है सदा के लिए

भीषण धूप और गर्मी में तपकर पत्थर जैसे बन चुके खेत, इन्हीं खेतों में चारा और पानी की आस में दूर-दूर तक भटकते मवेशी, सिर पर घड़े रखकर पानी की तलाश में निकली महिलाएं, सूखे हुए जलस्रोत और तमाम घरों पर लटके हुए ताले सूखे बुंदेलखंड की कहानी और यहां के लोगों की जिजीविषा को बताने के लिए काफी हैं। लंबे समय से लगातार सूखे का सामना करते-करते पूरे बुंदेलखंड की जैसे यही पहचान हो गई हो।
बुंदेलखंड का टीकमगढ़ इलाका सदी का सबसे भयानक सूखा झेल रहा है। गांव के गांव खाली हैं। करीब पचास फीसदी आबादी यहां से पलायन कर चुकी है। हालांकि यहां जल संकट दशकों से रहा है और बरसात दगा देती रही है। लेकिन पानी की कमी के कारण इतने बड़े पैमाने पर पलायन की शुरुआत दो-तीन दशक पहले से ही हुई। जिले के सौ से अधिक गांवों में तो एक भी आदमी नहीं बचा है। गांव के गांव वीरान पड़े हैं। निर्बल बूढ़े मवेशी अपने हाल पर छोड़ दिए गए हैं। विडंबना तो यह है कि पानी के कारण पलायन की यह तस्वीर उस क्षेत्र की है जहां तालाबों की एक पुरानी परंपरा रही है। क्षेत्र की तीन चौथाई आबादी के जीविकोपार्जन का जरिया खेती-किसानी है। लेकिन अब अधिकतर खेत सूखे पड़े हैं। इतने तालाब होने के बावजूद यहां जल संकट रहता है।
जब कहीं से पानी की मांग होती है तो सरकार वहां जमीन खोद कर ट्यूबवेल लगाती है। जबकि इस क्षेत्र में भूगर्भ उत्खनन को सही नहीं माना जाता। यह वह इलाका है जहां अ_ारह हजार करोड़ की लागत से केन बेतवा नदी को जोड़ कर सूखा दूर करने का सपना दिखाया जा रहा है। जबकि टीकमगढ़ जिले में जामनी नदी को तालाबों से जोड़ कर सैकड़ों एकड़ की सिंचाई का प्रयोग सफल रहा है। वह भी बगैर किसी विस्थापन व पर्यावरणीय संकट के। नदी जोडऩे के कुल बजट का एक फीसदी खर्च करके यहां के हर खेत को पानी व हर कंठ को जल का सपना सहजता से साकार हो सकता है, वह भी छह महीने से कम समय में।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के जिलों में फैले बुंदेलखंड क्षेत्र के समग्र विकास के लिए 19 नवंबर, 2009 को हुई कैबिनेट बैठक में 7,266 करोड़ रुपए स्वीकृत किए गए। 3,606 करोड़ उत्तर प्रदेश के लिए और 3,760 करोड़ रुपए मध्य प्रदेश के लिए जारी किए गए। बुंदेलखंड के भारी भरकम पैकेज के क्रियान्वयन नहीं होने की गूंज संसद में भी बीते साल गूंजी। संसद के मानसून सत्र (2016) के दौरान 28 जुलाई, 2016 को लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में योजना राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने यह माना कि यूपीए सरकार ने बुंदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निपटने के लिए स्वीकृत धनराशि में भारी अनियमितताएं बरती।
शिवराज सिंह ने 2012 में जल निगम बनाया जिसने 6 सालों में सिर्फ 700 गांवों तक पानी पहुंचाया। सरकार अब पता कर रही है कि कौन सा जल स्त्रोत कब बना, कितना खर्च रहा। ऐसे मामलों की जांच की जाएगी जहां भारी खर्च के बावजूद स्थिति खराब है। पीएचई मंत्री सुखदेव पांसे का कहना है कि बीजेपी ने केवल भाषण दिया 15 साल में। धरातल पर शून्य हैं, आज हालात ग्रामीण अंचल में 15 साल में जो काम हुआ वो भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया। 2003 में जब छोड़ा था कांग्रेस ने 6 परसेंट घरों में नलजल योजना के जरिए पानी सप्लाई थी 15 साल बीत गए केवल 12 परसेंट पर लाए जबकि करोड़ों रुपये हर साल खर्चे।
-सिद्धार्थ पाण्डे