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बीमार तंत्र

बिहार में इस बार एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) जिसे स्थानीय बोलचाल में चमकी बुखार भी कहते हैं, से बड़ी संख्या में बच्चों की मौत और उस पर शोर-शराबा एक मुद्दा है और मौत के कारण तथा उन्हें दूर करने की कोशिशें या उससे निपटने के सरकारी प्रयास बिल्कुल अलग मसले हैं। दो साल पहले उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला भले ही गैस सप्लाई बंद होने के कारण सुर्खियों में आया था, पर सच्चाई यही है कि ये मौतें गर्मी और लू के कारण लगभग ऐसी ही स्थितियों और लक्षणों के साथ हुई थीं। बिहार और उत्तर प्रदेश के इन इलाकों में गर्मी के दौरान मूल रूप से लू लगने से मौत के मामले आम हैं। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने पहले के वर्षों में हुई मौतों का हवाला देते हुए कह दिया था कि बीआरडी मेडिकल कॉलेज में अगस्त महीने में रोजाना औसतन अठारह से बाईस बच्चों की मौत पिछले सालों में भी हो चुकी है।
हकीकत तो यह है कि मौतें गर्मी के मौसम में लू और ज्यादा तापमान के कारण ही होती हैं। ऐसे में मौजूदा संसाधनों के भीतर अगर मरीजों की संख्या कम होती है तो बच्चे बच जाते हैं और मरीजों की संख्या तेजी से बढऩे लगती है तो बचाना मुश्किल हो जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे में बिहार और उत्तर प्रदेश के अस्पतालों में छपरा, मुजफ्फरपुर, गोरखपुर आदि जिलों के अलावा नेपाल के भी मरीज आते हैं। बीमारी से हालत खराब होने से पहले और सही चिकित्सा मिलने से कुछ बच्चे बच जाते हैं। कुछ इतने भाग्यशाली नहीं होते हैं कि बच सकें। इसका कारण न तो सिर्फ लीची खाना है, न ही ऑक्सीजन की सप्लाई बंद होना। इतनी सारी मौतें किसी एक कारण से हो रही होतीं तो उन्हें दूर कर दिया गया होता। पर अभी वह भी स्पष्ट नहीं है।
असल में मरने वाले बच्चे बहुत ही गरीब परिवारों के होते हैं। उनकी आवाज न सत्ता सुनती है, न मीडिया। वैसे भी, बीमारी अगर बता कर आती होती तो शायद स्थिति दूसरी होती। जो रोज खाने-पहनने जैसी जरूरतें पूरी करने में लगा है, वह बिना बीमार हुए बीमार होने की क्यों सोचे? और जब बीमार हो जाता है तो न कोई उसकी सुनने वाला होता है और न वह खुद कुछ कर सकता है। सरकारी अस्पताल और मुफ्त में मिलने वाली सुविधा के भरोसे रहने वाले लोग अपने ऐसे अधिकार के लिए भी कहां लड़ पाते हैं!
बड़ी संख्या में मौत का कारण कुपोषित बच्चों का प्रतिरक्षण कम होना है। गर्मी में लू लगने या खाली पेट लीची खा लेने से मुमकिन है, समस्या गंभीर हो जाती हो। इससे बचने के उपाय सरकार को करने हैं। लोगों को यह बताया जाना चाहिए कि बच्चे को गर्मी से बचाएं, खाली पेट न रहने दें और अगर लू लग जाए तो कौन-सी दवाई तुरंत शुरू करें, इलेक्ट्रॉल का घोल पिलाएं और जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास जाएं। लेकिन सरकार इतना भर भी नहीं करती। गरीब, लगभग अनपढ़ लोग अगर बच्चों को धूप में नहीं निकलने दें और पीने के पानी का पर्याप्त बंदोबस्त हो तो बहुत-से लोग लू का शिकार होने से बच सकते हैं। पर अस्पताल में ज्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं दी गई। जानकारी नहीं दिए जाने और जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचने के अपने कारण हैं। पर इतना तो स्पष्ट है कि इस बुनियादी और बहुत कम खर्चीले उपाय से जो बचाव हो सकता था, वह भी नहीं किया गया।
मुख्य रूप से इसका कारण सरकारी या राजनीतिक स्तर पर स्वास्थ्य को दी जाने वाली प्राथमिकता है। प्राथमिकता नहीं दी जाती है, यह तो साफ है और इस कारण बजट नहीं है और जब पैसे ही नहीं हैं तो कोई काम हो भी कैसे। इस तरह सब कुछ पैसे पर आकर रुक जाता है। अगर मीडिया में शोर न हो तो सरकार पर कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ता है, इसलिए सरकार वोट बटोरू काम में लगी रहती है और खर्च भी ऐसे ही काम में किए जाते हैं।
द्य विनोद बक्सरी